‘तुझे हो यकीं कि न हो यकीं’ में समय, समाज और प्रतिरोध की चेतना
- विजय वेदांत
समकालीन हिन्दी ग़ज़ल आज केवल प्रेम, विरह और निजी भावनाओं की अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रह गई है। उसने अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जटिलताओं को भी गंभीरता से स्वर दिया है। इस संदर्भ में संजीव प्रभाकर का नवीन ग़ज़ल-संग्रह ‘तुझे हो यकीं कि न हो यकीं’ अत्यंत महत्वपूर्ण कृति के रूप में सामने आया है। श्वेतवर्णा प्रकाशन से प्रकाशित यह संग्रह समकालीन समाज की बेचैनियों, विडंबनाओं और प्रतिरोध की चेतना का सशक्त दस्तावेज़ है।
मूलतः बिहार के निवासी संजीव प्रभाकर वर्तमान में गुजरात में रहते हैं। भारतीय वायुसेना से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने साहित्य साधना को अपना जीवन कर्म बना लिया। इससे पहले उनका ग़ज़ल संग्रह ‘ये और बात है’ भी चर्चित रहा है। वर्तमान की लगभग सभी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में उनकी ग़ज़लों को देखने से यह प्रमाणित होता है कि वे समकालीन हिन्दी ग़ज़ल के गंभीर और सक्रिय हस्ताक्षरों में शामिल हैं।
संग्रह का एक-एक शेर हमारे समय की बड़ी विडंबना की ओर संकेत करता है
“दलील पर दलील बहसबाज़ियाँ बहुत हुई
सुनाओ कोई फ़ैसला गवाहियाँ बहुत हुई”
यह शेर केवल न्यायिक या राजनीतिक संदर्भ का बयान नहीं है, बल्कि पूरे सामाजिक वातावरण की थकान को अभिव्यक्त करता है। आज का समाज बहसों, आरोपों और अंतहीन तर्कों में उलझा हुआ है, जबकि आम आदमी निर्णय और समाधान चाहता है। ग़ज़लकार यहाँ जनता की सामूहिक अधीरता और व्यवस्था से मोहभंग को स्वर देता है। यह शेर अपने समय के लोकतांत्रिक ढाँचे पर तीखा प्रश्नचिह्न भी है।
संजीव प्रभाकर की ग़ज़लों का एक बड़ा सरोकार सांप्रदायिकता और सामाजिक विभाजन है,
“मुआमला हो धर्म का कि मज़हबी तनाव का,
रही हो वजह कोई भी तबाहियाँ बहुत हुई”
यहाँ ग़ज़लकार किसी एक समुदाय या विचारधारा को लक्ष्य नहीं बनाता, बल्कि वह मनुष्यता के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है। धर्म और मज़हब के नाम पर होने वाली हिंसा अंततः मानव सभ्यता को ही क्षति पहुँचाती है। “तबाहियाँ बहुत हुई” जैसी अभिव्यक्ति में गहरी पीड़ा और चेतावनी दोनों निहित हैं। यह शेर आज के भारतीय सामाजिक परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक बन गया है।
आज समाज में एक ऐसा वर्ग उभरकर सामने आया है जो सिर्फ और सिर्फ विरोध करना जानता है। आज समाज में वस्तुनिष्ठ होने का रास्ता नहीं बच गया है। ग़ज़लकार इस ओर इशारा करता है। राजनीतिक और सामाजिक व्यवहार पर तीखा व्यंग्य करते हुए कहता है,
“हरेक बात का करना विरोध आदत है,
अजीब हाल है, उनकी अजीब हरकत है।”
इन पंक्तियों में ग़ज़लकार ने समकालीन राजनीति की नकारात्मक प्रवृत्ति को उजागर किया है, जहाँ रचनात्मक संवाद के स्थान पर केवल विरोध को ही राजनीति का आधार बना लिया गया है। यह व्यंग्य केवल पक्ष और विपक्ष पर नहीं है बल्कि उस मानसिकता पर है जो समाज को संवादहीन बनाती जा रही है।
इसी संदर्भ में अगला शेर और अधिक अर्थवान नज़र आता है,
“सदन में रोज़ वे करने लगे हैं हंगामा,
दरअसल काम न करने की उनकी नीयत है।”
यह शेर संसद और लोकतांत्रिक संस्थाओं के गिरते स्तर की ओर संकेत करता है। ग़ज़लकार ने अत्यंत सरल भाषा में जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता और राजनीतिक अवसरवाद पर करारा प्रहार किया है। यहाँ व्यंग्य के भीतर एक नागरिक होने की चिंता मौजूद है।
संजीव प्रभाकर केवल स्थानीय या राष्ट्रीय प्रश्नों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनकी दृष्टि वैश्विक परिदृश्य पर भी जाती है,
“इस समय दुनिया खड़ी है जिस मुहाने पर,
एकदम है सिरफिरों के यह निशाने पर।”
यह शेर वर्तमान विश्व की असुरक्षा और भयावह राजनीतिक परिस्थितियों का सटीक चित्रण करता है। “सिरफिरों” शब्द यहाँ उन शक्तियों की ओर संकेत करता है जो सत्ता, हथियार और हिंसा के बल पर दुनिया को नियंत्रित करना चाहती हैं। ग़ज़लकार इस भाव को और स्पष्ट शब्दों में लिखता है,
“इससे उसकी उससे इसकी जंग करवा के,
राज करना चाहता है वह ज़माने पर।”
यहाँ विश्व राजनीति की कूटनीतिक चालों और युद्ध आधारित सत्ता व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य है। ग़ज़लकार समझता है कि युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते, बल्कि उन्हें योजनाबद्ध ढंग से आम जनता पर थोपा जा रहा है। जिससे सत्ता का संतुलन कायम रखा जा सके। व्यापार को बढ़ाया जा सके। आम जनता को ज़रूरी मुद्दों से भटकाया जा सके।
इसी चिंता का चरम रूप अगले शेर में दिखाई देता है,
“एक दिन फट जाएगी दुनिया धमाकों से,
इन दिनों सारे लगे हैं बम बनाने पर।”
यह शेर आधुनिक सभ्यता की भयावह विडंबना को उजागर करता है। विज्ञान और तकनीक का उपयोग जहाँ मानव कल्याण के लिए होना चाहिए था, वहीं वह विनाश के उपकरण तैयार करने में व्यस्त है। यह शेर अपने भीतर गहरी मानवीय संवेदना और भविष्य की चिंता समेटे हुए है।
संजीव प्रभाकर सामाजिक नैतिकता के ह्रास को भी गंभीरता से दर्ज करते हैं,
“हर एक को मालूम है, बट्टा लगा ईमान पर,
फिर भी सभी चुपचाप हैं इतने बड़े नुक़सान पर!”
यहाँ ग़ज़लकार समाज की उस निष्क्रियता पर प्रश्न उठाता है जहाँ लोग सत्य को जानते हुए भी मौन बने रहते हैं। यह मौन ही व्यवस्था की सबसे बड़ी शक्ति बन जाता है। शेर में “ईमान” शब्द केवल धार्मिक अर्थ में नहीं है बल्कि नैतिक मूल्यों के रूप में प्रयुक्त हुआ है। आज वो समय नहीं है जब कोई आत्मा की आवाज़ सुन रहा हो। सबने अपनी आत्मा बेच दी है।
आज के डिजिटल और मीडिया प्रधान समय में अफ़वाहें किस प्रकार समाज को हिंसा की ओर धकेलती हैं, इस पर ग़ज़लकार की पैनी दृष्टि है,
“उन्माद न फैलेगा, दंगे नहीं भड़केंगे,
अफ़वाह का मुँह पकड़ो, लटकाओ बड़ा ताला।”
यह शेर केवल काव्यात्मक कथन नहीं है बल्कि सामाजिक संदेश भी है। ग़ज़लकार समझता है कि दंगों और हिंसा की जड़ में अक्सर अफ़वाहें और झूठी सूचनाएँ होती हैं। इसलिए वह समाज को सजग और जिम्मेदार बनने का आह्वान करता है। यह शेर समकालीन मीडिया की कार्यशैली पर भी अप्रत्यक्ष टिप्पणी करता है।
संग्रह का एक महत्वपूर्ण पक्ष पर्यावरण की चेतना भी है। आज अगर विश्व युद्ध से बड़ी चिंता अगर मानव समाज के सामने है तो वो है पर्यावरण की समस्या। इस समस्या से कोई भी रचनाकार नज़र नहीं चुरा सकता है। उदाहरण देखिये,
“न सोये-जगे हैं पहाड़ और जंगल,
तड़पने लगे हैं पहाड़ और जंगल।”
यहाँ प्रकृति का मानवीकरण अत्यंत प्रभावशाली ढंग से हुआ है। पहाड़ और जंगल केवल भौगोलिक इकाइयाँ नहीं रह जाते हैं बल्कि वे पीड़ा अनुभव करने वाले जीवंत अस्तित्व बनकर सामने आते हैं।
इस संदर्भ में एक और शेर देखिये,
“ख़ुदाई चली है महीनों महीनों,
किये रतजगे हैं पहाड़ और जंगल।”
यह शेर तथाकथित विकास की अंधी दौड़ पर तीखा प्रश्न उठाता है। निरंतर खनन, कटाई और निर्माण कार्यों से प्रकृति की संतुलित संरचना नष्ट हो रही है। “रतजगे” शब्द प्रकृति की बेचैनी और असुरक्षा को अत्यंत मार्मिक रूप में व्यक्त करता है।
संजीव प्रभाकर की ग़ज़लों में प्रतिरोध केवल नारा नहीं है बल्कि नैतिक जिम्मेदारी के रूप में उपस्थित है। इसका उदाहरण इस शेर में देख सकते हैं,
“हाँ, नहीं तो बताओ क्या करता,
क्या कहा, मैं भी चुप रहा करता!”
यह शेर ग़ज़लकार के अंतर्मन की बेचैनी को व्यक्त करता है। यहाँ चुप्पी को अपराध माना गया है। अन्याय, हिंसा और असमानता के बीच बोलना ग़ज़लकार की नैतिक अनिवार्यता बन जाता है। यही स्वर उनकी ग़ज़लों को जनपक्षधर बनाता है।
संजीव प्रभाकर की भाषा सहज, संप्रेषणीय और संवादधर्मी है। वे दुरूह प्रतीकों और कृत्रिम बौद्धिकता से बचते हैं। उनकी ग़ज़लों की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वे सीधे पाठक के अनुभव संसार से जुड़ जाती हैं। और उनके सामने एक जीवंत तस्वीर उपस्थित करती है।
इनकी अभिव्यक्ति में जनवादी चेतना की हल्की गूँज अवश्य महसूस होती है, किंतु वे अपने स्वतंत्र स्वर और समकालीन दृष्टि के कारण अलग पहचान बनाते हुए नज़र आते हैं। शिल्प की दृष्टि से भी उनकी ग़ज़लें संतुलित हैं। बहर, काफ़िया और रदीफ़ का निर्वाह स्वाभाविक रूप में हुआ है तथा कथ्य और शिल्प के बीच संतुलन बना रहता है। जिससे संग्रह बोझिल होने से बच जाता है। और पाठक को प्रवाह में बहाता हुआ चला जाता है।
‘तुझे हो यकीं कि न हो यकीं’ समकालीन हिन्दी ग़ज़ल का एक महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक संग्रह है। इसमें राजनीति, सांप्रदायिकता, युद्ध, नैतिक पतन, अफ़वाह, लोकतांत्रिक विडंबना और पर्यावरणीय संकट जैसे विषयों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया गया है। संजीव प्रभाकर की ग़ज़लें केवल समय का बयान नहीं करतीं हैं बल्कि उसके विरुद्ध प्रतिरोध की चेतना भी निर्मित करती हैं।
यह संग्रह इस बात का प्रमाण है कि हिन्दी ग़ज़ल आज भी अपने समय के सबसे ज्वलंत प्रश्नों से संवाद करने की क्षमता रखती है। संजीव प्रभाकर की यह कृति निश्चय ही समकालीन हिन्दी ग़ज़ल की उल्लेखनीय उपलब्धियों में गिनी जाएगी।
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संग्रह का नाम : तुझे हो यकीं कि यकीं न हो हो यकीं
ग़ज़लकार : संजीव प्रभाकर
प्रकाशन : श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली
पृष्ठ : 104
क़ीमत : 299
समीक्षक : विजय वेदांत
