‘चिड़ियों की दावेदारी” गजल की दुनिया की एक बहुमूल्य कृति
- जयप्रकाश मिश्र

डॉ भावना साहित्य जगत में एक सुपरिचित एवं सम्मानित नाम है। इनकी सद्य प्रकाशित गजल संग्रह ” चिड़ियों की दावेदारी” गजल की दुनिया की एक बहुमूल्य कृति है। इस गजल संग्रह का शीर्षक एक सारगर्भित अर्थ लिए पाठकों को सोचने पर विवश करता है। यहाँ चिड़ियाँ निर्बलता का प्रतीक है। भले बलवान अपने रूतबा से सबको बेचैन कर दे लेकिन इस दुनिया में निर्बलों की भी अपनी दावेदारी है । शीर्षक की महत्ता डॉ भावना के निम्नलिखित शेर में निहित है –
बाज भले अपने डैनों पर इतराये
चिड़ियों की भी अपनी दावेदारी है
इस संग्रह में आधी आबादी की हकीकत भी देखने को मिलता है तो जीवन के विविध रंग भी शामिल हैं। वे कहती हैं – मरीजों को भला वो किस तरह कर पायेंगी चंगा / चिकित्सक बन के बिटिया जब सुरक्षित रह नहीं पाती । इस संग्रह की अधिकांश ग़ज़लें जीवन के सुख -दुख के बीच झूलती प्रतीत होती है तथा हमारे मन को एक नयी सोच और उत्साह से भर देती है । उनकी गजलों में दर्द है प्रेम है यानि नाजुक अनुभूतियां भी शामिल हैं। डाॅ भावना की गजलें दुष्यंत की परंपरा का निर्वहन करती चलती है। अतः इनकी गजलों में समाजिकता के स्वर प्रबल रूप में मुखरित दिखाई देते हैं ।वे कहती हैं- उसका भी घर जलेगा ही बस्ती अगर जली/ पछता रहा है आग लगाने के बाद फिर। संग्रह में ऐसे सैकड़ों शेर हैं जो निश्चित ही संवेदनशील हृदय को झकझोरने का सामर्थ्य रखते हैं। । डाॅ भावना का यह छठा गजल- संग्रह है । वे अपनी गजलों में कथ्य के स्तर पर खूब प्रयोग करती हैं । उदाहरण के तौर पर यह शेर देखिए- यम का दिया निकाल के वे खुश हुए बहुत / मजबूत जिनके भाग्य के तारे हैं आजकल। यहां’ यम का दिया’ का प्रयोग ग़ज़ल की दुनिया में पहली बार हुआ है।बिहार में दीपावली से एक दिन पूर्व यम का दिया परिवार को सुरक्षित रखने की चाहत से निकाला जाता है।डाॅ भावना एक गम्भीर व समर्थ गजलकार हैं ।इनकी गजलों में तराशे हुए कथ्य तथा सधे हुए शिल्प के साथ मन को मोहने वाले भाव का जवाब नहीं । जीवन के न जाने कितने ही रंगों को अपनी गजलों में डॉ भावना ने बहुत ही खूबसूरती से पिरोया है । कथ्य के प्रवाह के साथ भाषा भावानुकूल है । इन गजलों से गुजरते हुए हमारा निश्चित ही एक अति संवेदनशील गजलकार से परिचय होता है, जिसका नाम डॉ भावना है ।
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पुस्तक का नाम – चिड़ियों की दावेदारी
लेखिका – डॉ भावना
प्रकाशन – श्वेतवर्णा प्रकाशन
समीक्षक – जयप्रकाश मिश्र ,
शिवहर
मूल्य-299
