भटकाव में इंसानियत से मुलाकात :: रूबी भूषण

भटकाव में इंसानियत से मुलाकात

  • रूबी भूषण

 

जाने से पहले थोड़ा ठहरो तो,

भीगी आँखों से आज बोलो तो…

इस यात्रा का क्या नाम दूँ, आज तक नहीं समझ पाई और न ही इसे भूल पाई हूँ। हमारी बड़ी बुआ का देहांत कानपुर में हो गया था और हम पति-पत्नी कार से ही कानपुर निकल गए।

बुआ के जाने का ग़म और तन की थकान के बावजूद यह सोचकर मन खुश था कि उन्हें कितनी अच्छी मौत मिली। नतनी की शादी में बारात आने वाली थी। नाच-गाना चल रहा था कि अचानक वे ऐसी गिरीं कि फिर उठीं ही नहीं। मैं बुआ की बड़ी लाडली थी। खबर मिलते ही मैं कानपुर के लिए चल पड़ी। दो दिन वहाँ रुकी और फिर वापस चल दी।

यात्रा अपनी सहज गति से आगे बढ़ रही थी। दो दिन की थकान के बाद मन कुछ बदला-बदला-सा था। हम दोनों गाड़ी से आगे बढ़ते जा रहे थे। बदलते दृश्य और पश्चिम की ओर तेजी से ढलता सूरज मन को मोह रहा था। हल्के नारंगी और लाल रंग से चमकता क्षितिज बहुत सुंदर लग रहा था कि अचानक हम लंबे जाम में फँस गए।

आगे लंबी गाड़ियों की कतार थी। हॉर्न की पीं-पीं और गाड़ियों से निकलते धुएँ से तबीयत घबराने लगी थी। मेरे पति ने शीशा खोलकर विपरीत दिशा से आ रहे एक साइकिल सवार से पूछा,

“कितना लंबा जाम है?”

साइकिल सवार ने सहज भाव से कहा,

“अरे भइया, का बताईं! एक घंटा से जादा होइ गवा, गाड़ी हिलतै नाहीं है। एक किलोमीटर से भी लंबी लाइन लग गवा है गड़ियन की। आप ई पतली वाली गली पकड़ ल्यो, आगे से निकल जइयो। सीधा रास्ता मिल जइहै।”

 

उसी ने गाड़ी को आगे-पीछे करवाकर हमारी गाड़ी को पतली गली में उतरवा दिया। उस समय वह व्यक्ति किसी दूत से कम नहीं लग रहा था, क्योंकि सड़क हमारे लिए अनजानी थी और रात होने वाली थी। कुछ दूर चलकर हम एन.एच.-25 पकड़ लेंगे—यही सोचकर हम आगे बढ़े।

पर हम चाहे कितना भी सोच लें, कितनी भी योजना बना लें, कभी-कभी ऐसा घट जाता है जिसकी कल्पना भी नहीं की होती।

शुरू में सड़क एकदम ठीक थी। इक्का-दुक्का घर भी दिखाई दे रहे थे। छोटे-छोटे बाज़ार सजे थे। लोग साइकिल और बाइक से आ-जा रहे थे, इसलिए हमें कोई चिंता भी नहीं हुई।

मैंने कहा,

“ठीक किया न, मैंने गाड़ी घुमा ली।”

“मौका मिला नहीं कि अपनी पीठ थपथपा लेते हैं।”

कहकर मैं हँस पड़ी। उन्होंने मेरी ओर मुस्कुराकर देखा।

“रास्ते की ओर देखो, मुझे नहीं।”

हम मुस्कुराते हुए आगे बढ़ते रहे। धीरे-धीरे बस्तियाँ कम होने लगीं। चारों ओर बस खेत ही खेत दिखाई देने लगे। सड़क और संकरी तथा गड्ढों से भरी थी। सूरज की अंतिम किरण भी विदा हो चुकी थी।

मैंने पूछा,

“रास्ता तो मालूम है न…?”

उन्होंने मेरी ओर देखा और कहा,

“मिल तो जाना चाहिए।”

मुझे घबराहट होने लगी थी।

“ऐसा तो नहीं कि हम गलत रास्ते पर चले आए हैं?”

उनके माथे पर शिकन पड़ने लगी थी, जिससे मैं समझ गई कि वे भी घबरा रहे हैं। फिर उन्होंने विश्वास भरे शब्दों में कहा,

“लग रहा है कि रास्ता भटक गए हैं, पर घबराओ मत। हम गाड़ी वापस लेते हैं।”

लेकिन गाड़ी घुमाने का भी रास्ता नहीं था। एक तरफ नहर थी तो दूसरी तरफ बहुत नीचा खेत। कोई दूसरा वाहन भी दिखाई नहीं दे रहा था और न ही कहीं कोई रोड लाइट थी। केवल हमारी गाड़ी की हेडलाइट ही हमें रास्ता दिखा रही थी।

मैं मन ही मन हनुमान चालीसा का पाठ कर रही थी।

उस संकरी सड़क पर करीब एक घंटा चलने के बाद कुछ लोग सिर पर पगड़ी बाँधे हुए दिखाई दिए। उनमें से दो की मूँछें भी बड़ी थीं। उनके देखने का अंदाज़ ऐसा था कि मैंने भूषण का हाथ कसकर पकड़ लिया। मैंने अपना सिर झुका लिया। न जाने कौन थे, लेकिन वे बिना कुछ बोले आगे बढ़ गए।

आगे फिर वही सुनसान रास्ता मुँह फाड़े खड़ा था। हमारी हालत खराब हो रही थी।

अचानक एक ऊँचा स्पीड ब्रेकर-सा आ गया और हमारी गाड़ी उछल पड़ी। गाड़ी सँभालते-सँभालते एक चक्का सड़क से नीचे उतर गया। भूषण ने गाड़ी रोक ली।

अब तो भइया, मेरी हालत और खराब हो गई। डर के मारे पेट में दर्द होने लगा और उल्टी-सी होने लगी। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ।

भूषण ने मुझसे कहा,

“नीचे उतरो और मुझे गाड़ी सड़क पर लाने दो।”

मैं डरते-डरते नीचे उतरी और क्या बताऊँ, पेट में जो कुछ था, वहीं पर निकाल दिया। पर हाँ, वहाँ बहती ठंडी हवा से थोड़ी राहत जरूर मिली।

गाड़ी अभी ऊपर नहीं आ पाई थी। भूषण ने एक्सिलरेटर जोर से दबाया और मुझसे कहा,

“जोर से धक्का दो।”

मैंने परमपिता को हाथ जोड़े और पूरी ताकत से गाड़ी में धक्का लगाया। गाड़ी ऊपर आ गई और मैं बंदर की तरह उछलकर एक सेकंड के अंदर गाड़ी के भीतर बैठ गई तथा शीशा चढ़ा दिया।

पानी की बोतल में पानी भी कम था। एक ही घूँट में समाप्त हो गया और मैं भूषण का चेहरा देखती रही कि वे कुछ तो छोड़ देते!

उस समय पानी की कीमत समझ में आई। हम न जाने कितना पानी व्यर्थ बहा देते हैं और उस समय मैं एक घूँट पानी के लिए तरस रही थी।

डैशबोर्ड खोला तो उसमें च्युइंगम रखी थी। मैंने एक खोलकर अपने मुँह में डाली और दूसरी इन्हें दे दी। वह उस समय किसी अमृत से कम नहीं लगी।

थोड़ी दूर ही गए थे कि एक मिट्टी का घर दिखाई दिया। सड़क भी कुछ चौड़ी हुई। गाड़ी जैसे ही उसके पास पहुँची, वहाँ दो-तीन लोग बैठे दिखाई दिए। भूषण ने गाड़ी धीमी की तो उनमें से एक व्यक्ति ने पूछा,

“कहाँ जाना है? इतनी रात हो गई है।”

इन्होंने कहा,

“जाना तो पटना है।”

“आप गलत रास्ते पर आ गए हैं।”

मैंने मन ही मन राहत की साँस ली। हम सचमुच रास्ता भटक गए थे।

उस व्यक्ति ने बड़े इत्मीनान से रास्ता समझाया और हैंडपंप का ठंडा-ठंडा पानी पिलाया। मैंने जल्दी से अपनी पानी की बोतल भर ली।

उसने एक लड़के को आवाज़ दी,

“रमेश! जा, साइकिल से इन्हें मुख्य रास्ते तक छोड़ आओ।”

उन लोगों ने हमारी गाड़ी मुड़वाई और रमेश साइकिल पर ऐसे सवार हुआ, जैसे चेतक पर सवार कोई वीर योद्धा हो। वह आगे-आगे और हम पीछे-पीछे उसकी साइकिल के।

 

पाँच-दस मिनट में ही हम मुख्य सड़क पर आ गए। रमेश ने साइकिल रोकी और कहा,

“भइया, अब सीधे चले जइयो।”

भूषण ने जेब से कुछ रुपये निकालकर उसे देने चाहे तो वह मुस्कुराकर बोला,

“ई तो हम नहीं लेब। हमारी जगह आप होतें तो का करतें?”

कहकर उसने हाथ हिलाया और वापस चला गया।

दूर से गाड़ियों की रोशनी दिखाई देने लगी। मन का डर धीरे-धीरे समाप्त होने लगा। मैंने चहककर कहा,

“लगता है, हम मेन सड़क पर आ गए!”

चारों ओर रोशनी थी, लोग थे। वह अनजाना रास्ता अँधेरे में कहीं खो चुका था।

उस क्षण मन में एक अजीब-सी अनुभूति हुई। जहाँ कुछ देर पहले अनजान लोगों से डर लग रहा था, कुछ ही पल बाद वही अनजान लोग हमारे लिए फ़रिश्ता बनकर आए। कभी डर, कभी घबराहट, कभी आशंका और उसके बीच किसी अजनबी का अपनापन!

जिससे डर रही थी, उसी ने रास्ता दिखाया।

आज भी वह शाम और रात याद आती है तो चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाती है, लेकिन रोंगटे भी सिहर उठते हैं। सच है, कभी भी शॉर्टकट लेना सही नहीं होता।

पर हाँ, इस यात्रा ने मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया था। ज़िंदगी में चाहो या न चाहो, कई बार परिस्थितियाँ ऐसी आती हैं, जो कुछ पल के लिए मनुष्य को भीतर तक हिला देती हैं। और कभी-कभी उन्हीं कठिन रास्तों पर हमें ऐसे लोग मिल जाते हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के हमारे लिए मदद का हाथ बढ़ा देते हैं।

शायद यही इस यात्रा की सबसे बड़ी सीख थी—हर अनजान चेहरा डरावना नहीं होता और हर कठिन रास्ता केवल डर ही नहीं देता; कभी-कभी वही रास्ता इंसानियत पर हमारा विश्वास भी लौटा देता है।

उस रात मैंने यह भी महसूस किया कि रास्ते केवल मंज़िल तक नहीं ले जाते, वे हमें जीवन के कुछ अनमोल अनुभव भी दे जाते हैं। कभी कोई अजनबी एक पल में अपना बन जाता है और कभी एक छोटी-सी मदद जीवन भर की स्मृति बन जाती है। उस रात रमेश की साइकिल की रोशनी मेरे लिए केवल रास्ता नहीं दिखा रही थी,

बल्कि भय से विश्वास की ओर ले जा रही थी।

आज इतने वर्षों बाद भी जब उस यात्रा को याद करती हूँ तो लगता है—हम रास्ता जरूर भटक गए थे, लेकिन शायद उसी भटकाव में हमें इंसानियत का सही रास्ता मिल गया था।

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परिचय :  रूबी भूषण की कई कहानियां विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं.

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