विशिष्ट ग़ज़लकार :: डॉ. राकेश जोशी

1
इन ग़रीबों के लिए घर कब बनेंगे
तोड़ दें शीशे, वो पत्थर कब बनेंगे

कब बनेंगे ख़्वाब जो सच हो सकें
और चिड़ियों के लिए पर कब बनेंगे

बन गए सुंदर हमारे शहर सारे
पर, हमारे गाँव सुंदर कब बनेंगे

शर्म से झुकते हुए सर हैं हज़ारों
गर्व से उठते हुए सर कब बनेंगे

योजनाओं को चलाने को तुम्हारे
वो बड़े बंगले, वो दफ़्तर कब बनेंगे

आज तो संजीदगी से बात की है
अब ये सारे लोग जोकर कब बनेंगे

कब तलक कचरा रहेंगे बीनते यूं
तुम कहो, बच्चे ये अफ़सर कब बनेंगे

2
तेरी दावत में गर खाना नहीं था
तुझे तंबू भी लगवाना नहीं था

मेरा कुरता पुराना हो गया है
मुझे महफ़िल में यूं आना नहीं था

इमारत में लगा लेता उसे मैं
मुझे पत्थर से टकराना नहीं था

ये मेरा था सफ़र, मैंने चुना था
मुझे काँटों से घबराना नहीं था

समझ लेता मैं ख़ुद ही बात उसकी
मुझे उसको तो समझाना नहीं था

तुझे राजा बना देते कभी का
मगर अफ़सोस! तू काना नहीं था

छुपाते हम कहाँ पर आँसुओं को
वहाँ कोई भी तहख़ाना नहीं था

मुहब्बत तो इबादत थी किसी दिन
कभी ये जी का बहलाना नहीं था

जहाँ पर युद्ध में शामिल थे सारे
वहाँ तुमको भी घबराना नहीं था

3
दीवारों से कान लगाकर बैठे हो
पहरे पर दरबान लगाकर बैठे हो

इससे ज़्यादा क्या बेचोगे दुनिया को
सारा तो सामान लगाकर बैठे हो

दुःख में डूबी आवाज़ें न सुन पाए
ऐसा भी क्या ध्यान लगाकर बैठे हो

बेच रहा हूँ मैं तो अपने कुछ सपने
तुम तो संविधान लगाकर बैठे हो

हमने तो गिन डाले हैं टूटे वादे
तुम केवल अनुमान लगाकर बैठे हो

अपने घर के दरवाज़े की तख़्ती पर
अपनी झूठी शान लगाकर बैठे हो

ख़ूब अँधेरे में डूबे इन लोगों से
सूरज का अरमान लगाकर बैठे हो

जूझ रही है कठिन सवालों से दुनिया
तुम अब भी आसान लगाकर बैठे हो

कितने अच्छे हो तुम अपने बाहर से
अच्छा-सा इंसान लगाकर बैठे हो

4
कोई पानी नहीं रखता, कोई दाना नहीं रखता
मैं तेरी भूख के आगे, कोई खाना नहीं रखता

तुम्हारे कोसते रहने से दीवारें नहीं हिलतीं
तभी मैं भीड़ में लोगों का चिल्लाना नहीं रखता

मेरे भीतर की सारी आग बाहर से भी दिखती है
मैं अपने ख़ूब अंदर तक भी तहख़ाना नहीं रखता

मेरी ऊँची इमारत से नहीं है दोस्ती कोई
मैं इन कच्चे मकानों से भी याराना नहीं रखता

मुझे हारे हुए किरदार अब अच्छे नहीं लगते
तभी नाटक में उनका घाव सहलाना नहीं रखता

कहीं सूरज, कहीं चंदा, कहीं जुगनू, कहीं तारे
वो धरती के किसी कोने को वीराना नहीं रखता

तेरी-मेरी कहानी में जो फिर से लिख रहा हूँ मैं
तेरा आना तो रखता हूँ, तेरा जाना नहीं रखता

तुम्हें अब तो उदासी की ही धुन पर नाचना होगा
वो खुशियों से भरा कोई भी अब गाना नहीं रखता

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परिचय : रचनाकार की दो ग़ज़ल-संग्रह प्रकाशित है. पत्रिकाओं में निरंतर रचनाओं का प्रकाशन
संप्रत्ति : असिस्टेंट प्रोफेसर (अंग्रेज़ी)
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, डोईवाला
देहरादून, उत्तराखंड
ई-मेल: joshirpg@gmail.com

 

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