दोहे : जयप्रकाश मिश्र

सोने जैसी बेटियाँ, भिखमंगें हैं लोग। आया कभी न भूल कर, मधुर-मांगलिक योग।। 11 लिपट तितलियाँ पुष्प से , करती हैं मनुहार। रंगों का दरिया बहे, बरसे अमृतधार।।12 चेहरे से चेहरे मिले, बजे हृदय में तार। तंग नजर है पारखी, उसपर यह शृंगार।। 13 सपनों की अट्टालिका, अनुपम तेरा चित्र। तेरे -मेरे प्यार में, तप है छिपा विचित्र।।14 गंध उड़ी ,मधुकर उड़े, लगे भटकने ध्यान। कोयल कूके बाग में, मोहित सकल जहान।।15 बच्चे भी पढ़ने लगे, तीर, धनुष, तलवार। दिल मेरा जलता रहा, देख हजारों बार ।।16 नित-नित बढ़ते जा…

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विशिष्ट कवि : संतोष श्रेयांस

पुनरावृति एक दुसरे के एहसासों से लदे हम लौट आते हैं हर बार एक दुसरे के पास पहले से लड़ी बड़ी लडाइयों के बावजूद कई दिनों की मुह फुलाई के अल्प विराम के बाद कुछ समझौता कुछ संधियों में लिए वादे और शांति प्रस्ताव के साथ कई पुनरावृतियों के बाद हालाँकि हम जान जाते हैं हर बार की तरह इस समझौते का भी जल्द ही हम कर जायेंगे अतिक्रमण और अतीत के अनुभवों से समृद्ध लड़ेंगें पहले से कहीं भयानक लड़ाई क्योकि समय के साथ हम जान जाते हैं एक…

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पुस्तक समीक्षा

हिंदी ग़ज़ल का प्रभुत्व यानी हिंदी ग़ज़ल का नया पक्ष – लेखक – अनिरुद्ध सिन्हा/ समीक्षक  – शहंशाह आलम हिंदी ग़ज़ल की आलोचना मेरे ख़्याल से हिंदी साहित्य में उतनी व्यापक अथवा विकसित नहीं भी दिखाई देती है, तब भी हिंदी ग़ज़ल ने हिंदी साहित्य में अपना उचित स्थान पा लिया है, ऐसा कहने में ग़ज़ल के आलोचकों को परहेज़ नहीं करना चाहिए। यह सच है कि हिंदी ग़ज़ल में अपने समय की ग़ज़ल लिखी जानी बाक़ी है। तब भी उस लिखे जाने के इंतज़ार में हिंदी ग़ज़ल का सारा इतिहास छोड़ देना…

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