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सुभाष वसिष्ठ के पांच गीत
मन बहुत बीमार
आज
मन है
सच
बहुत बीमार
बेतरह ख़ामोश
बिस्तर
चाय
या
अख़बार
दोपहर
हो शाम
आई
सुबह छाई है अभी तक
क्षण
उबासी से टँगे हैं
नहीं कोई
कहीं दस्तक
उछलता सा
उल्लसित तन
सरासर मिस्मार
एक स्वाभाविक क्रिया का
हश्र
इतना अन्यथा सा!
नोंक नेज़े पर
सभी कुछ
प्रश्न काला
तर्क ख़ासा?
उम्र की पुख़्ता ऋचाएँ
दरकतीं इस बार!
पंख का नुचना
दूर तक फैले खुले आकाश में
फिर कबूतर झेलता है
पंख का नुचना !
एक तिर्यक रेख का
उष्मित अतल को
तर्क जुट हो काटना
स्वयं दीपित दूसरी का
छत्र नीला
चिंदियों में बाँटना
ताकती हैं फटी आँखें
ठगी कोकिल माथ अंकित
भाग्य का पुछना !
झील की गहराइयों को
बाज़-पंजों का
निरन्तर ताकना
सहमते ख़रगोश का
आवाज़ से भी
प्राण लेकर भागना
चीखते टुकड़े हवा के
शून्य की ऊँचाइयों तक
सागरों कुछ ना !
बना रह ज़ख़्म
बना रह ज़ख़्म
तू
ताज़ा !
हवा के सही जीने का हुआ कब ठोस अंदाज़ा !!
धरी है सान
फिर हथियार पर
कुछ और स्याही ने
भरे सुनसान ने घेरे हुए हैं
बिफर कर ज़ीने
इन्हीं सब बीच तृतिया दृष्टि थिरका जा !
टूट कर गिर न जाएँ
सहीपन के बिन्दु आकाशी
महज़ कुछ वक़्त के टुकड़े
न कर दें गन्ध को बासी
खुली आबादियों के मूल स्वर ! छा जा !!
नम्र….
नम्र होने का नहीं मतलब
बनो कमज़ोर
या तमस के हाथ में ख़ुद
सौंप दो तुम भोर
छिपे उसके किटकिटाते
दाँत होते हैं
सिलसिले जड़ कालिमा के
पाँत होते हैं
लिये उनचस पवन शातिर
ताँसता घनघोर
चाल शतरंजी रगों में
भरम पैदा कर
कुछ वज़ीरों,ऊँट,घोड़ों
से नपा कर घर
मारता है निरे पैदल
दाब
जुमलाखोर
शब्द में तिरते इरादों से
बचे रहना
‘अन्ततः’ के लक्ष्य ख़ातिर
‘तुरत’ को सहना
साथ है
आँसू ढले,
आवाज़-बिन,
का,
शोर !
मेहरारू का गीत
बुहरेंगे* काले दिन
एक दिन
ग़ायब हो जायेंगे सारे ‘लेकिन’।
पकी बाल गेहूँ सी
सुबहें घर आएँगी
ख़ुशी-गन्ध से
कोना-कोना भर जाएँगी
दूर कहीं भागेंगे दु:खों के जिन !
भीतर के कोठे की
कड़ी बदल जाएगी
बड़ी चारपाई पर
जाजम बिछ जाएगी
चुभेगी शिकायत की नहीं कहीं पिन ।
ताक में सजे होंगे
गुड़िया के गुड्डे
चौरे हँस खेलेंगे
छुटकू सँग बुड्ढे
रच-रस सब घूमेंगे मेला आसिन ।
सुरसतिया ओसारे
गीत नए गाएगी
ढोलक की थापों पर
रात बीत जाएगी
काटेंगे नहीं समय घड़ियाँ गिन-गिन ।
पटवारी बेमतलब
दाम नहीं माँगेगा
दरोगा मुकदमें में
नाम नहीं टाँकेगा
नहीं बड़बड़ाएगा लाला भिन-भिन ।
नेता हर एक साल
गाँव देख जाएँगे
मंत्री जी वचनों से
नहीं पलट जाएँगे
आएँगे
पर
कब
ये
श्वेत मधुर छिन ?
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* यह शब्द “बुहरेंगे” है. अर्थात् झाड़ू से बुहारने/साफ़ करने के अर्थ में; न कि बहुरेंगे,जिसका अर्थ लौटना होता है.
परिचय :: डाॅ सुभाष वसिष्ठ सुप्रसिद्ध,चर्चित और वरिष्ठ नवगीत कवि हैं. वह सुपरिचित रंगकर्मी भी हैं. बीसवीं सदी के आठवें दशक की शुरुआत में इनको नवगीत कवि के रूप में पहचान मिली थी.
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