विशिष्ट कवि : प्रभात मिलिंद
मौसम की रंगरेज़ (गिरिजा कुमार माथुर की एक कविता को पढ़ते हुए) लोग कहते रहते हैं कि ख़्वाबों की बदौलत ज़िन्दगी के बरस नहीं कटते फिर भी बो लिया है…
मौसम की रंगरेज़ (गिरिजा कुमार माथुर की एक कविता को पढ़ते हुए) लोग कहते रहते हैं कि ख़्वाबों की बदौलत ज़िन्दगी के बरस नहीं कटते फिर भी बो लिया है…
‘नयी नारी’ – स्त्री–मुक्ति का नया प्रस्थान – डॉ पूनम सिंह सामाजिक , राजनीतिक चेतना के चेतना के क्रांतिकारी सर्जक बेनीपुरी ने जिस समय ‘नयी–नारी’ की परिकल्पना की थी; उस…
1 कई गलियाँ कई रस्ते कई मंज़र समेटे है ज़रा-सी याद पूरा गाँव पूरा घर समेटे है. तुम्हें भी हौसले का उसके अन्दाजा नहीं होगा परिन्दा जो अभी बैठा है…
स्कूटी चलाती बेटी एक दिन देखती हूँ क्या कि — सहेलियों को अपने पीछे बिठाकर फर्राटे से स्कूटी चलाती हुई चली आ रही है बेटी फटी की फटी रह गई…
दिन कटे हैं धूप चुनते रात कोरी कल्पना में दिन कटे हैं धूप चुनते। प्यास लेकर जी रहीं हैं आज समिधाएँ नई कुण्ड में पड़ने लगीं हैं क्षुब्ध आहुतियां कई…
प्रसाद और बेनीपुरी के ऐतिहासिक नाटकों की चरित्र योजना – डॉ शेखर शंकर मिश्र नाटक दृश्यकाव्य की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विधा है, जिसे ‘अवस्था की अनुकृति’ कहा गया गया है |…
रामवृक्ष बेनीपुरी एक अद्भुत रचनाकार – संजीव जैन हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के लेखकों में रामवृक्ष बेनीपुरी एक विशिष्ट स्थान के अधिकारी हैं, परंतु हिन्दी साहित्य के इतिहास में…
गेहूँ और गुलाब गेहूँ हम खाते हैं, गुलाब सूँघते हैं। एक से शरीर की पुष्टि होती है, दूसरे से मानस तृप्त होता है। गेहूँ बड़ा या गुलाब? हम क्या चाहते…
संवेदना को झकझोरती ग़ज़लें – शिखरों के सोपान – डॉ.भावना ग़ज़ल की बात आती है तो बरबस ही प्रेम याद आता है, प्रेम में बीता पल याद आता है…
मेरे घर का कचरा आज बहुत ज्यादा परेशान थी मैं क्योंकि नहीं उठेगा आज मेरे घर का कचरा वाकई हैरान थी मैं।। कल ही तो आए थे गोधूलि बेला में…