पावन तट पर आस्था और विसंगति का द्वंद्व
- देवेन्द्रराज सुथार

सुरेश सौरभ द्वारा संपादित ‘पावन तट पर’ साझा लघुकथा संग्रह आस्था और अंधविश्वास के मध्य विद्यमान सूक्ष्म विभाजक रेखा का अन्वेषण करता है। महाकुंभ 2025 को केंद्रबिंदु बनाकर देशभर के 41 लघुकथाकारों की रचनाएँ इस संकलन में समाहित हैं, जो धार्मिक आयोजनों की विसंगतियों और विद्रूपताओं को बेबाक शिल्प में प्रस्तुत करती हैं।
संपादक का दृष्टिकोण निर्भीक और निष्पक्ष है। वे मानवीय मूल्यों को धार्मिक आडंबर से सर्वोपरि स्थान देते हैं। रश्मि ‘लहर’ की ‘सेवा’ में सास द्वारा भगदड़ में बहू के जीवन-रक्षण का प्रयास, प्रो. रणजोध सिंह की ‘लिविंग गॉड’ में माता-पिता की सेवा-शुश्रूषा को प्रकृति प्रदत्त तीर्थ मानना, और सुरेश सौरभ की लघुकथा ‘साये में पुण्य’ आदि लघुकथाओं में गंगा-जमुनी तहज़ीब की सुगंध परिलक्षित होती हैं। संग्रह समस्त रचनाएँ मानवता को परम धर्म के रूप में प्रतिष्ठापित करती हैं।
संग्रह की सर्वाधिक उल्लेखनीय विशेषता इसकी साहसिकता और सामाजिक यथार्थ के प्रति प्रतिबद्धता है। डॉ. रशीद गौरी की ‘निपटारा’ में बहू द्वारा वृद्ध ससुर को कुंभ में परित्यक्त करने की कुत्सित योजना, चित्रगुप्त की ‘बंद दरवाजे की चीख’ में वृद्ध माता को कक्ष में बंद कर कुंभ-गमन का निर्मम निर्णय, और अरविंद असर की ‘मुफ्त का पुण्य’ में सरकारी आँकड़ों पर तीक्ष्ण व्यंग्य-यह सब रचनाएँ समकालीन समाज के कटु और वीभत्स सत्य को निर्ममता से उद्घाटित करती हैं।
अनेक कथाएँ भगदड़ की त्रासदी और उसकी मार्मिक परिणतियों को केंद्र में स्थापित करती हैं। गुलज़ार हुसैन की ‘भगदड़ में माँ’, मार्टिन जॉन की ‘पापमुक्ति’ और चित्तरंजन गोप की दोनों लघुकथाएँ कुंभ की भयावहता तथा अराजकता का मर्मस्पर्शी चित्रण प्रस्तुत करती हैं। राजेंद्र वर्मा की ‘पुण्य’ में पति द्वारा रुग्ण पत्नी को परित्यक्त न करने का निर्णय वास्तविक धर्म-पालन का श्रेष्ठ उदाहरण है।
कतिपय रचनाएँ आधुनिक तकनीकों के दुरुपयोग पर भी कठोर प्रहार करती हैं। चित्रगुप्त की ‘पावन तट पर’ में स्नानरत महिलाओं के अश्लील वीडियो निर्माण की घृणित घटना समकालीन युग की नैतिक विकृति और पतन को रेखांकित करती है।
संपादन अत्यंत कुशल और संतुलित है। प्रत्येक रचना स्वतंत्र इकाई के रूप में पूर्ण और प्रभावोत्पादक है। भाषा सहज, प्रवाहमय और संप्रेषणीय है, जो पाठक को सतत आबद्ध रखती है। विविध भौगोलिक क्षेत्रों से आगत रचनाकारों की उपस्थिति संग्रह को राष्ट्रीय व्यापकता और बहुआयामी दृष्टि प्रदान करती है।
सूर्यदीप कुशवाहा की ‘पुण्य फल’ और ‘सच्चा पुण्य’ दोनों कथाएँ मानवीय करुणा को धार्मिक कर्मकांड से श्रेष्ठ सिद्ध करती हैं। डॉ. पूरन सिंह की ‘ये माँ ही हो सकती हैं’ में मातृत्व की महत्ता, और सेवा सदन प्रसाद की ‘अनुतप्त’ में पश्चाताप का भाव-ये रचनाएँ गहन मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि प्रदर्शित करती हैं।
डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी की ‘कुंभी पाप’ में गरिमा-भंग की घटना, और नीना मंदिलवार की ‘विलुप्त’ में भगदड़ के पश्चात् आस्था का विलोपन – ये रचनाएँ धार्मिक आयोजनों की कुरूपता को उजागर करती हैं। हरीश कुमार ‘अमित’ की दोनों लघुकथाएँ सच्चे पुण्य की पुनर्व्याख्या प्रस्तुत करती हैं।
‘पावन तट पर’ केवल धार्मिक पाखंड और कर्मकांडों पर प्रहार नहीं करता, अपितु मानवीय संवेदनाओं को जागृत करने का सार्थक प्रयास है। यह संग्रह उन समस्त पाठकों और चिंतकों के लिए अनिवार्य है जो अंधविश्वास और आस्था, धर्म और धार्मिकता के मध्य विद्यमान सूक्ष्म भेद को समझना चाहते हैं।
संग्रह की सर्वाधिक सशक्त पक्ष यह है कि यह धर्म का विरोध नहीं करता, वरन् धर्म के नाम पर होने वाले शोषण, आडंबर और अमानवीयता का तीव्र प्रतिरोध करता है। सुरेश सौरभ ने संपादक के रूप में विलक्षण सूझबूझ और साहित्यिक विवेक का परिचय दिया है।
यह एक प्रगतिशील, विचारोत्तेजक और सामाजिक चेतना से ओतप्रोत संकलन है जो समकालीन हिंदी लघुकथा साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान के रूप में स्थापित होने की पूर्ण क्षमता रखता है। इस संग्रह का प्रत्येक पृष्ठ मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना का आह्वान करता है।
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पुस्तक – पावन तट पर ( कुंभ स्नान पर केंद्रित लघुकथाएं)
संपादक – सुरेश सौरभ
मूल्य -250
प्रकाशन वर्ष -2025
प्रकाशन – समृद्धि पब्लिकेशन, नई दिल्ली
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समीक्षक – देवेन्द्रराज सुथार
स्थानीय पता – गांधी चौक, आतमणावास, बागरा, जिला-जालोर, राजस्थान।
पिन – 343025, मोबाइल नंबर – 8107177196
