अनामिका सिंह की दस ग़ज़लें
(1)
बदनाम जो गली वहाँ जाते भले हैं लोग
सुनकर दबाते उँगलियाँ दाँतों तले हैं लोग
इक शख़्सियत महज़ जिन्हें है देह भर हुई,
किरचें वजूद की हुईं क्या मनचले हैं लोग
जो चुप रहे वे पच गए लेकिन मुखर हैं जो,
वे ही समाज को बड़े अकसर खले हैं लोग
हालात से दुखी हुए, दुख से बिखर गये,
छत से लटक गए कहीं ज़िंदा जले हैं लोग
बदलाव के लिए वे जो तनहा ही थे चले
उन बा-कमाल लोगों के पीछे चले हैं लोग
चलते तिराहे, चौक पे या बोगियों में देख,
रोज़ी की खोज़ में यहाँ कितने गले हैं लोग
कमरा तो एक ही था मगर जितने भी हुए
इक साथ ही सभी वहाँ खाए-पले हैं लोग
ढलते ही शाम घर में मिलें सारी लड़कियाँ,
यानी कि साफ है यहाँ कितने भले हैं लोग
(2)
चिमनियाँ, तीलियाँ, डोरियाँ चाहिए ।
दाहने, टाँगने बीवियाँ चाहिए ।
सेंकने रोटियाँ अपने घर की तुम्हे,
सिर्फ़ औरों के घर बेटियाँ चाहिए
जो सितम सह के भी बोलती कुछ न हों
बज़्म में वो हसीं तितलियाँ चाहिए
हुक्म जो रात-दिन उनका माना करें ,
उनको साथी नहीं दासियाँ चाहिए
रोकने को दमन जिस्म और रूह पर
खेलनी फाइनल पारियाँ चाहिए
आप इंसान तो हम भी इंसान हैं,
आत्मसम्मान संग झप्पियाँ चाहिए
वक़्त रहते ज़ुबां खोल दो लड़कियो!
ज़िन्दगी की हमें चाबियाँ चाहिए
(3)
मौसम की बेवफाई का ऐसा असर चढ़ा
पत्तों को पीलिया हुआ, फूलों को ज्वर चढ़ा
उतरा नहीं जो गोद से माँ की कभी वही
बेटा मजूर बन है कई फीट पर चढ़ा
दंगे हुए तो क्या हुआ, कुछ लोग मर गये
कुछ का महज है आग की ही भेंट घर चढ़ा
जूते भी घिस गये हैं जँवाई की खोज में
बेटी का बाप बिन रुके है इतने दर चढ़ा
है इक किताब ज़िंदगी इसमें न दाग़ हों
यानी कि बात साफ है अच्छा कवर चढ़ा
रंग-ए-वफ़ा तू घोल ले ऐसा इस इश्क़ में
उतरे नहीं वो उम्र भर हम पर अगर चढ़ा
इसमें गुज़र-बसर नहीं आसान है ‘अना’
ये जग तो है करेला कोई नीम पर चढ़ा
(4)
बीते पलों के फिर वही मौसम नहीं हुए
तुम भी नहीं हुए तो कभी हम नहीं हुए
कितनी कलाइयाँ कटीं कितने टँगे मिले,
बेरोज़गार फिर भी यहाँ कम नहीं हुए
गांधी, सुभाष और भगत को पढ़ा मगर,
उनकी तरह तो आज तलक हम नहीं हुए।
औरत पे ही तमाम लगीं बंदिशें वहाँ,
आदम के भेष में जहाँ आदम नहीं हुए
कितने ही गीत और ग़ज़ल कह चुके सभी,
आलोचकों की आँख में ऑसम नहीं हुए
चूल्हों में झोंक दी गईं ज़िंदा ही औरतें,
शौहर हुए जहाँ, कभी हमदम नहीं हुए
कितनी उदास हो के उठी होंगी सब ‘अना’,
लाशें वो जिन पे ठीक से मातम नहीं हुए
(5)
सैलून में खड़ीं जो सुबह-शाम लड़कियाँ
दिनभर में कितने करती हैं वो काम लड़कियाँ
हर कस्टमर को डील करे हैं वे जूझकर
पातीं नहीं हैं दो घड़ी आराम लड़कियाँ
हेयर कटिंग करे कोई तो कोई फेशियल
चमका रहीं हैं हर किसी का चाम लड़कियाँ
आई-ब्रो पे थ्रेड का तो ज़रा देखिए हुनर
देती हैं शक्ल को नये आयाम लड़कियाँ
मेंहदी रचा रहीं हैं दुल्हनों के ध्यानमग्न
साधक हैं,साधना को दें अंजाम लड़कियाँ
नाखून, पाँव, एड़ियाँ धोतीं रगड़-रगड़
टिप में न कुछ भी पातीं हैं ईनाम लड़कियाँ
लाती हैं लंच घर से मगर खा नहीं सकें
कर देतीं हैं सुबह से यूँ दिन,शाम लड़कियाँ
हो सोफ़िया सलोनी ही हो या हो आबिदा
करतीं न भेद देख मोनोग्राम लड़कियाँ
ये लकड़ियाँ नहीं हैं, हैं ये लड़कियाँ ‘अना’
घर को चलाया करती हैं गुलफ़ाम लड़कि
(6)
जो चंद लोग इन दिनों काफ़ी ख़बर में हैं।
किनकी लगी हैं जैक ये सबकी नज़र में हैं
करते थे मंच से अमन की बात रहनुमा,
पाए गए वही यहाँ शामिल गदर में हैं
जो बात कुछ ग़ज़ल में नहीं है तो क्या हुआ,
वो चैन में हैं शेर तो उनके बहर में हैं
अस्सी बरस की हों गईं उनका नहीं है घर,
सो साफ़ है कि औरतें कितनी कदर में हैं
है बात मेरे दोस्तो कितनी नज़र-नवाज़,
Manzarulमंज़र-सी नेक सीरतें मेरे शहर में हैं
कितनी अजीब बात है गाज़ा धुआँ-धुआँ,
हमको न कुछ हुआ वहाँ साँसें कहर में हैं
अब तक हुआ नहीं है बता क्लीन इंडिया,
कितनी ही पीढ़ियाँ ‘अना’ उतरीं गटर में हैं
(7)
नसीबों की हुई चर्चा जहाँ भी बात आयी
किसी के हिस्से दिन आया किसी के रात आयी
कभी जो भूल से होंठों पे हक़ की बात आयी
हथेली की दो गालों पर छपी सौगात आयी
कठिन ही था उसे जब प्यास लेकर और जीना
घड़े और आदमी के बीच फिर-फिर जात आयी
मुहब्बत किस तरह परवान चढ़ती ऐ ज़माने
कहीं मज़हब कहीं भौंहें सिकोड़े जात आयी
निवालों पर न रोज़ी पर हुई चर्चा अभी तक
मगर नागा बिना हाकिम के मन की बात आयी
जहाँ तुम भी न आये थे, जहाँ हम भी न आए
वहाँ पर भी हुए हैं दिन, वहाँ भी रात आयी
(8)
बातों की बात हो भले तो है ये बात और
पर रात को न दिन कहें और दिन को रात और
हमको लपेटने को तेरी सारी कोशिशें
कम हैं अभी कि जाके ज़रा सूत कात और
डाली ने हौसला दिया पतझड़ में पेड़ को
मत हो उदास आएँगे ख़ुशियों के पात और
हमको हँसाने और रुला पाने के कमाल
बस दोस्तों के हाथ हैं,किसकी बिसात और
ख़ाली पतीली देख तब आँसू ढुलक पड़े
बच्चों ने कहा माँ को परस थोड़ा भात और
वो है सुकून, नींद वो और वो ही ज़िंदगी
इक शख्स बाकमाल है किसमें ये बात और
कितने ही रंग आदमी के हैं यहाँ ‘अना‘
सारे दिखा दिए कि बचे कुछ हयात! और
(9)
जो कर रहे सवाल वे हैं सब रडार पर
हम आ गये हैं देख लो कैसे कगार पर
संगीन ज़ुर्म होते रहे जिसपे ही सदा
फोड़े गये हैं ठीकरे उसके कपार पर
जीते जी रो सकी न है अश्लील हर वो आँख
फिर झूठ-मूठ रोये जो जाकर मजार पर
बूँदें बिखर के भी ये बड़ा काम कर गयीं
रख दी तपी ज़मीन की सूरत सँवारकर
हमको लगा था होगा वो पक्का ज़ुबान का
अफ़सोस! वो भी आ गया चेहरा उतारकर
आँखें कभी जो हो गयीं नम फ्लैशबैक से
यादें हैं आ गिरीं मेरे मन के कछार पर
रोटी, ज़मीन, नौकरी सबकुछ निगल लिया
सत्तानशीन लेते नहीं हैं डकार पर
हासिल किसी को है यहाँ भरपूर तामझाम
कुछ जी रहे हैं आज भी रोटी-अचार पर
कोई तड़प रहा भी हो तो वीडियो बने
सम्वेदनाएँ मौन हैं क्यों चीत्कार पर
(19)
कुछ चीड़ हैं खड़े यहाँ कुछ देवदार हैं
अगवानी के लिए कई ऊँचे चिनार हैं
ये घाटियाँ धुआँ-धुआँ, हैं मोड़, मोड़ पर
हरियालियों में पल रहे क़िस्से हज़ार हैं
पत्थर हैं कितने राह में, घोड़ों को है पता
उन पर नहीं असर कि जो इन पर सवार हैं
अपने ही आप में जो थी, जानी मगर नहीं
इक शय ‘ख़ुशी’ के वास्ते लंबी कतार हैं
ओढ़े है ख़ूबसूरती सारी ज़मीन ये
आदम ही ढो रहे मगर आदम का भार हैं
गेंदे, गुलाब की तरह हैं सीरतें ग़ज़ब
कुदरत की गोद में पलीं पाईं दुलार हैं
तू ही ‘अना’ मुरीद नहीं घाटियों की है
नीरज के भी तो पड़ते क़दम बार-बार हैं
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संपर्क : अनामिका सिंह, स्टेशन रोड, गणेश नगर, शिकोहाबाद
पिन-383135, जिला-फिरोजाबाद( उत्तर प्रदेश)
