विशिष्ट कवि :: अनीता रश्मि

अनीता रश्मि की चार कविताएं –

सपने के भीतर 

उसके भीतर है सपना

सपने के अंदर वह

कभी सपनों में जागती

कभी सपनों से जागती

सपने में उसके है

वह बोलती चिरई

वो नन्हा सा पोखर

वह हँसता-बुंदियाता सावन

वो सावन का

बिछड़ गया झूला

वे हँसते-खिलखिलाते

आजा-आजी (दादा-दादी)

वे हरदम साथ देते बाबा-ताई

सपनों में उसने सबसे ऊपर

माँ को रखा है बिठा

लेकिन

रिश्तों से परे भी हैं

उसके कुछ भोले-मासूम सपने

जिसे हर पल तोड़ने को

है एक सैय्याद खड़ा

हरदम घात लगाए

ऐसे में कैसे देखे कोई

कोई भी बेख़ौफ सपना

लेकिन

सपने देखने की

उसकी उम्र है अभी

देखने दो उसे

पूरी उम्र का

बेहतरीन सपना।

 

ये बातें

नित्य ही क्यों

नखों से बिंधी

शिखा से जली

मन से टूटी

देह से छूट गई

प्यार की भूखी

प्यार से अछूती

स्त्री की व्यथा-कथा,

दर्द एवं तन्हाई की बातें

बलात्कार, शोषण हत्या

आती है उग

अखबार के मुखपृष्ठ से

अंदरूनी पन्नों तक

चैनलों को बदल-बदल देखो

उपजी रहतीं वर्षा की भरपूर

धान सी वे ही खबरें

औरत के अंदर छिपी

अद्मय जिजीविषा

स्नेह, संतोष, ईमानदारी, लगन

‘औ’

उसके उठते जाने

अपने श्रम बल से

उठकर व्योम छू लेने की बातें

क्यों नहीं की जातीं बारंबार

नित्य, हर पल, हर क्षण

प्रत्येक क्षणांश?

अभी नहीं तो फिर

कब करोगे

उसके अनवरत

प्रेम के लुटाने की

फूलों के मकरंद सा?

हर व्यक्ति पर माँ-सी ममता

न्यौछावर करने की बातें

अभी नहीं तो

फिर कब करोगे?

आख़िर कब ?

 

घर

वह घर छोटा सा

रिश्तों की आँच से भरा

हरा-भरा था

काँच का नहीं था

 

उस बड़े घर के सामने

उसकी कोई बिसात नहीं

लेकिन कहते हैं सभी

बड़े घर में इक चिंगारी न थी

रिश्तों की मिठास नहीं

ख़ुश्बुओं का वास न था

न थी चैन की

एक छोटी सी झपकी

बेख़ौफ़ जीने की कोई कोशिश

कुछ ही दिनों की बात

छोटा सा, प्यारा सा घर

बदल गया बड़े से

महल में एक दिन

और अब उसका चैन

खोया हुआ है

वह बरसों पहले सोया

अब तक सोया हुआ है

उसके रंगे यौवन में

उसका रंग उतरा हुआ है

आँच रिश्तों की

छोटी सी चिंगारी ढूँढती है

छटपटाती है ज़िंदगी

एक रात बेख़ौफ़ जीने के लिए

अजब उसके रंग हैं

अजब उसके ढंग है

खड़ा तो बड़े शान से है वह

उसका वह अपनापन खो गया है

खुलेआम गलबहिया डाल जो

ले आता था घर के अंदर

बड़े प्रेम से अजनबी को

अब अपनों को भी

दूर रखने के बहाने

ढूँढने में है व्यस्त

क्या बड़े होते ही लोग

इतने छोटे हो जाते हैं

इतनी खराब किस्मत है

उन व्यवस्थित घरों की

कि अपने अव्यवस्थित हो जाते

फिर तो हम और हमारा घर

छोटा ही ठीक

खाली बर्त्तन-भाड़े

खाली-खाली कमरे हैं

पर है हमारा मकां

बेहद आत्मीय उष्मा से भरपूर

चिंगारी नहीं,

आग की गर्माई से

चमक रहा है यह हमारा

नन्हा-मुन्ना सा आशियाना।

 

समझ 

उसने कहा अँधेरा !

अँधेरे को अँधेरा

तुमने रौशनी समझा

उसने कहा उजाला

अँधेरे को उजाला

तुमने उम्मीद समझ लिया

उसे याद आया जमीन से

चिपके बैठे जड़ की

तुमने गगनभेदी

परिंदे की याद दिला दी

उसने याद किया मौत को

तुमने उसे ज़िंदगी कह दी

उसने भूलने की बात की

तुमने मीठे संस्मरण की

उसने भरपूर जिक्र किया

घृणा का भी

तुमने कैसे अचानक

प्रेम कह दिया

वह कहता रहा कुछ

तुम समझते रहे कुछ

क्यों?

ये अपने-अपने

संस्कारों की बात थी।

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परिचय : अनीता रश्मि अनेक विधाओं में सृजन कर रही हैं. कविताओ के अलावा इनके उपन्यास और कहानियों की कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. बिहार सरकार के राजभाषा विभाग सहित अन्य हिंदी संस्थानों से पुरस्कृत हो चुकी हैं.

 

 

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