दूर की कौड़ी
- सुरेश सौरभ
ठाकुर दीनानाथ बड़े कृपालु स्वभाव वाले आदमी थे। उनके दरवाजे कोई भी याचक पहुंचता, तो कुछ न कुछ जरुर उसे देकर सान्त्वना देते। किसी को खाली लौटाना उनकी फितरत में न था। बाप-दादाओं की हज़ारों लाखों की सम्पत्ति से उन्हें खूब यश मिल रहा था।
उस दिन झबुआ ठाकुर की देहरी पर पहुंचा सदा लगाई-सरकार बीवी बीमार है। चार दिन से मजूरी नहीं लगी। घर में खाने को एक दाना नहीं, फिर इलाज कहां से करुं। मालिक कुछ दाना-पानी, रुपिया-पैसा मिल मिल जाए तो बड़ी मेहरबानी होगी।
ठाकुर ने दो पसेरी गेहूं और सौ रुपया देकर कहा-अब ज्यादा हाथ-पैर न जोड़ कल भोर पहर कुछ लकड़ियां-पकड़ियां चीर जाना।
’जी हुजूर’ झबुआ अपनी मटमैली आंखें नचाते हुए खुशी से बोला। गेहूं और रुपया पाकऱ उसकी रगों में खून की दौड़ान जो बढ़़ चुकी थी।
झबुआ के जाते ही ठाकुर के पास बैठे लेखपाल सागर सिंह बोले-सरकार आप इन्हें नहीं जानते और ये तो एक नम्बर का कामचोर और उठाईगीर टाइप का आदमी है इस पर कैसे आप ने विश्वास कर लिया। अभी चलिए आप मेरे साथ, आप को दिखाऊं चल के ये शराब के ठेके पर ही मिलेगा।’
’मैं जानता हूं सब, हो सकता है कल यह लकड़ी चीरने भी न आए। दरअसल मैं चाहता हूं कि गांव के सारे गरीब और दलित ऐसे ही शराब पी-पी कर मर जाएं।
’और जो शराब न पीए-लेखपाल ने चुटकी ली।
’ताड़ी पीएं, भांग खाए, जुआ खेले, रंडीबाजी करें। इनके हर ऐब के लिए मेरे पास पैसा है।
’तभी आप बाप-दादों की दौलत इन पर लुटा रहे हैं।’
’लुटा नहीं रहें, इन्हें मिटा रहें हैं। इन्हें मिटाना फिर इनकी सम्पत्ति पर कब्जा करना ही हमारा पुश्तैनी काम हैं।
‘ओह! क्या दूर कौडी लाएं है आप।’
’अब पहले वाला जमाना नहीं रहा, कि डरा-धमका कर, मारपीट कर इनका शोषण कर लें, अब तो इतने मीडिया वाले हैं कि जरा सी हरकत पर पिल पडेंगे। इसलिए मुझे यह फंडा बहुत पसंद है।
’इसलिए मैं भी इन अनपढ़ जाहिलों को खूब चूसता हूं।-लेखपाल ने अपना कोरस जोड़ा।
’मैं तो नीबू जैसा निचोड़ता हूं।-ठाकुर ने ताल मिलाई।
हा हा हा हा……. फिर दोनाें की दानवी अट्टहास से धरती दरकने लगी। आसमान फटने लगा, पर दोनों दुष्टों की छाती में तमाम संतोष के कंवल खिल रहे थे।
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संपर्क – निर्मल नगर लखीमपुर-खीरी उत्तर प्रदेश
