विशिष्ट गीतकार :: गरिमा सक्सेना

1.

फूल-फलों की चाहत वाली इस दुनिया में

हम पत्ते हैं हमें कौन पूछेगा साहब

 

रंग-बिरंगे फूलों जैसा

हमने भी पाया है इक मन

लेकिन नहीं भाग्य में जैसे

नेह भरे भ्रमरों का गुंजन

 

हरियाली में भी पीलापन झेल रहे हम

चटक रंग कुछ हममें कौन भरेगा साहब

 

सीख लिया सबके पोषण हित

हमने अपना जीवन-जीना

औरों को शीतल छाया दी

हिस्से आया जेठ महीना

 

श्रेय अभी तक वृक्षों को ही मिलता आया

हमें हमारा हक़ कोई क्या देगा साहब

 

रहे गृहणियों के जैसे हम

हमको उनसा भाग्य मिला है

सुख की चाहत और प्रयत्नों

के बदले वैराग्य मिला है

 

अपने मन की यह पीड़ा किसको बतलाएँ

‘जो तन लागे’ केवल वह समझेगा साहब

2.

प्रश्नों की समिधाओं से

जीवन का यज्ञ सफल होगा

उत्तर खोजेंगे तो निश्चित

बेहतर अपना कल होगा

 

चिंता में उलझे -उलझे हम

चिंतन करना भूल गये

पाना था अमृत लेकिन हम

मंथन करना भूल गये

मन तक पहुँचेंगी किरणें तो

सारा पंथ धवल होगा

 

जल में उतरे बिन जल की

गहराई नाप नहीं सकते

बिन विमर्श के भावों की

ऊँचाई माप नहीं सकते

सतत किये अभ्यासों से ही

जो है कठिन, सरल होगा

 

आँख मूँद विश्वास करेंगे

निश्चित ही जड़ होंगे हम

दूर बहुत रह जायेगा

हमसे विचार का तब उद्गम

ज्ञान प्रवाहित होगा तब

जब उसका रूप तरल होगा

3.

कुहरे के घूँघट से कैसे

झाँक रही है भोर

 

धुँधलाये चेहरे लगते हैं

कितने नये-नये

पत्तों पर, शाखों पर

बिखरे मोती कहाँ गये

 

दिवस-दिहाड़े चोरी इनकी

कौन कर गया चोर

 

शीतलहर के अश्वमेध का

घोड़ा रोका है

भरी ठंड में कुहरे को

यह किसने टोका है

 

बलज़ोरी करने आया है

कौन भला मुँहज़ोर

 

आयी जो संक्रांति

नया उत्साह लिए आई

सोई हुई धरा ने फिर से

ली है अँगड़ाई

 

चला रश्मियों का रथ फिर से

अब उत्तर की ओर

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गरिमा सक्सेना

ए-212, सेंचुरी सरस अपार्टमेंट, अनंतपुरा रोड, बंगलुरु, कर्नाटक

पिन – 560064

मो.-7694928448

 

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