समकालीन कविता में रश्मिरेखा ने बनायी थी विशिष्ट पहचान :: चितरंजन

समकालीन कविता में रश्मिरेखा ने बनायी थी विशिष्ट पहचान :: चितरंजन एकांत में जीवन की तलाश जोखिम भरा कार्य है. यह तलाश तब और कठिन हो जाती है, जब हमारी संवेदनशीलता मनुष्यता के रक्षार्थ खड़ी होती है. इंसान के न्याय के लिए यूं तो कई लोग मिलें परंतु रश्मिरेखा का मिलना विशिष्ट था. एक ऐसी बुद्धिजीवी जो बिना किसी लाग लपेट के यथार्थ व्यक्त कर देती थीं. उनकी शालीनता दिखावा नहीं थी, वे स्वाभाविक रूप से शालीन थीं. वास्तव में वे एक कवयित्री, एक कुशल आलोचक से आगे बढ़ कर…

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रचनाकार स्मरणः ‘अंधेरे में रोशनी की सेंध’ की कवयित्री :: डॉ रमेश ऋतंभर

रचनाकार स्मरणः ‘अंधेरे में रोशनी की सेंध’ की कवयित्री “रश्मिरेखा का नाम समकालीन साहित्य के पाठकों के लिए अपरिचित नहीं है। उनकी टिप्पणियाँ और कविताएँ लगातार पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं और मेरे जैसे पाठकों का उन्होंने ध्यान आकृष्ट किया है।लम्बे समय से रचनारत इस युवा कवयित्री का यह पहला संग्रह है ‘सीढ़ियों का दुख’। अपने नाम की व्यंजना की तरह संग्रह की अधिकांश कविताओं में भी एक स्त्रीसुलभ गहरा विषाद देखा जा सकता है, परंतु यदि इतना ही होता तो कोई खास बात न थी। मुझे जो विशेष…

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विशिष्ट कवयित्री :: स्मृति शेष रश्मिरेखा

समय के निशान एक अर्से बाद जब तुम्हारे अक्षरों से मुलाक़ात हुई वे वैसे नहीं लगे जैसे वे मेरे पास हैं भविष्य के सपने देखते मेरे अक्षर भी तो रोशनी के अँधेरे से जूझ रहे हैं अब तो ख़ुद से मिलना भी अपने को बहुत दुखी करना है यह सब जानते हुए भी एक ख़त अपने दोस्त को लिखा और उसे बहुत उदास कर दिया पत्र पाने की खुशी के बावजूद सचमुच समय चाहे जितनी तेजी से नाप ले डगर अमिट ही रह जाते हैं उसके क़दमों के निशान 2…

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मनोरंजन : ध्वनि और छवियों का बाजार और मीडिया :: संजीव जैन

मनोरंजन : ध्वनि और छवियों का बाजार और मीडिया आज मनोरंजन एक उद्योग है जो हम तक ध्वनि और आभासी छवियों के बाजार के रूप में पहुंचता है। अब हम तकनीकी मनोरंजन के दौर में हैं। एक कृत्रिम, आभासी और बिना सहभागिता के मनोरंजन के द्वारा निर्मित समाज का निर्माण कर रहे हैं। आज की किशोर और युवा पीढ़ी अस्वस्थ मनोरंजन के नशे में चूर है। मनोरंजन जो चौबीसों घंटे उपलब्ध है, पर जो चित्तवृत्तियों और तन को स्वस्थ (हेल्दी)नहीं बना रहा बल्कि बीमार, तनावपूर्ण और मोटा बना रहा है।…

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लघुकथा :: डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

सब्ज़ी मेकर इस दीपावली वह पहली बार अकेली खाना बना रही थी। सब्ज़ी बिगड़ जाने के डर से मध्यम आंच पर कड़ाही में रखे तेल की गर्माहट के साथ उसके हृदय की गति भी बढ रही थी। उसी समय मिक्सर-ग्राइंडर जैसी आवाज़ निकालते हुए मिनी स्कूटर पर सवार उसके छोटे भाई ने रसोई में आकर उसकी तंद्रा भंग की। वह उसे देखकर नाक-मुंह सिकोड़कर चिल्लाया, “ममा… दीदी बना रही है… मैं नहीं खाऊंगा आज खाना!” सुनते ही वह खीज गयी और तीखे स्वर में बोली, “चुप कर पोल्यूशन मेकर, शाम…

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विशिष्ट कहानीकार :: गोपाल मोहन मिश्र

ऐसी ही होती हैं माँ… एक दंपत्ति दीपावली की ख़रीदारी करने को हड़बड़ी में था। पति ने पत्नी से कहा, ज़ल्दी करो, मेरे पास टाईम नहीं है। कह कर कमरे से बाहर निकल गया। तभी बाहर लॉन में बैठी माँ पर उसकी नज़र पड़ी। कुछ सोचते हुए वापस कमरे में आया और अपनी पत्नी से बोला, शालू, तुमने माँ से भी पूछा कि उनको दिवाली पर क्या चाहिए? शालिनी बोली, नहीं पूछा। अब उनको इस उम्र में क्या चाहिए होगा यार, दो वक्त की रोटी और दो जोड़ी कपड़े……. इसमें…

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पुस्तक समीक्षा :: के.पी.अनमोल

समालोचना के निकष पर ग्यारह ग़ज़लकार: विमर्श के बहाने – के. पी. अनमोल पिछले अनेक सालों से ज़हीर क़ुरैशी हिन्दी ग़ज़ल के प्रवक्ता ग़ज़लकार रहे हैं, इस बात पर कोई सन्देह नहीं। उन्होंने हिन्दी ग़ज़ल की भाषिक संरचना में बड़ा योगदान दिया है। इधर कुछ समय से उनका गद्य लेखन भी लगातार प्रकाशित हो रहा है। उनका संस्मरण संग्रह ‘कुछ भूला कुछ याद रहा’ वर्ष 2016 में प्रकाशित हुआ है। साथ ही कुछ पत्रिकाओं के लिए लिखे गये उनके लेख, जो हिन्दी-उर्दू के ऐसे शायरों पर केन्द्रित रहे हैं, जिनके लेखन…

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विशिष्ट ग़ज़लकार :: डॉ. राकेश जोशी

1 इन ग़रीबों के लिए घर कब बनेंगे तोड़ दें शीशे, वो पत्थर कब बनेंगे कब बनेंगे ख़्वाब जो सच हो सकें और चिड़ियों के लिए पर कब बनेंगे बन गए सुंदर हमारे शहर सारे पर, हमारे गाँव सुंदर कब बनेंगे शर्म से झुकते हुए सर हैं हज़ारों गर्व से उठते हुए सर कब बनेंगे योजनाओं को चलाने को तुम्हारे वो बड़े बंगले, वो दफ़्तर कब बनेंगे आज तो संजीदगी से बात की है अब ये सारे लोग जोकर कब बनेंगे कब तलक कचरा रहेंगे बीनते यूं तुम कहो, बच्चे…

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खास कलम :: ज़फर अहमद

मेरे मन में कौंधते हैं  मेरे मन में कौंधते हैं कुछ सवाल कि लोग क्या सोचते हैं? मेरे बारे में! मुझसे क्या अपेक्षाएं क्या आशाएं हैं उनको क्यों समझ नहीं आती मेरी बेचैनी और मेरे चुप रहने का कारण क्या चाहता हूं में लोगों से ये मेरी समझ में भी नहीं आता क्या कारण है कि इन उलझनों में उलझ जाता हूँ कभी कभी अपनी बात रख नहीं पाता दूसरों के सामने और वक्त बीत जाने पर अफसोस क्यों होता है? कौंधता है ये सवाल कि इन सवालों का जवाब…

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विशिष्ट गीतकार :: गरिमा सक्सेना

(1) प्रिये तुम्हारी आँखों ने कल दिल का हर पन्ना खोला था दिल से दिल के संदेशे सब होठों से तुमने लौटाये प्रेम सिंधु में उठी लहर जो कब तक रोके से रुक पाये लेकिन मुझसे छिपा न पाये रंग प्यार ने जो घोला था उल्टी पुस्तक के पीछे से खेली लुका-छिपी आँखों ने पल में कई उड़ानें भर लीं चंचल सी मन की पाँखों ने मैने भी तुमको मन ही मन अपनी आँखों से तोला था नज़रों के टकराने भर से चेहरे का जयपुर बन जाना बहुत क्यूट था…

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