खास कलम : मनोज अहसास

मनोज अहसास की कविताएं एक कुछ जिंदगियां होती हैं सीलन भरे अंधेरे कमरों की तरह जिनके खिड़की दरवाज़े मुद्दत से बंद हैं वहां कोई भी नही जाता वहाँ घूमते हैं कुंठाओं के कॉकरोच उदासियों की छिपकलियां वेदनाओं की चीटियां और कश्मकश की मकड़ियां जो बुनती रहती हैं सदा एक जाल जिससे कभी हल्की सी भी दरार होने पर दरवाजे में अगर आ जाये कोई तितली उल्लास की तो उलझकर घुटकर मर जाये कुछ जिंदगियां….. धीरे धीरे ये सब चीज़े मिलकर निगल जाती हैं नैतिकता का प्लास्टर उखड़ जाता है संस्कारों…

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संत ब्रह्मानन्द सरस्वती और उनका जीवन दर्शन : डॉ मुकेश कुमार

संत ब्रह्मानन्द सरस्वती और उनका जीवन दर्शन – डॉ मुकेश कुमार जब सूर्य का उदय होता है तो अन्धकार का विनाश निश्चित ही होता है। कस्तूरी अपनी सुगन्ध वातावरण में फैलाकर सारे पर्यावरण को सुगन्धित बना देती है। उसी प्रकार विश्व कल्याण के लिए व अज्ञान के अन्धकार को समाप्त करने के लिए इस पवित्र धरा पर भगवान किसी न किसी महापुरुषों, सन्तों के रूप में अवतार लेता है। क्योंकि जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि का स्वरूप मनुष्यों पर नास्तिक, पापी, दुराचारी और बलवान मनुष्यों का अत्याचार बढ़ जाना तथा लोगों में सद्गुण-सदाचारों की अत्यधिक कमी और दुर्गुण-दुराचारों की अत्यधिक वृद्धि हो जाना। तभी किसी न किसी अवतार रूप की आवश्यकता पड़ती है। तब भगवान किसी अवतार रूप में जन्म लेता है। इसी प्रकार से गीता में भी बताया गया है- ”यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानि र्भवति भारत। अभ्युत्थान धर्मस्य तदात्माने सृजाम्यहम्।।“1 अर्थात् (भारत)-हे भारत वंशी अर्जुन, (यदा,-यदा धर्मस्य (जब जब धर्म की), (ग्लानिः)-हानि और (अधर्मस्य)-अधर्म की, (अभ्युत्थानम्)-वृद्धि, (भवति)-होती है, (तदा)-तब-तब, (हि)-ही, (अहम्)-मैं, (आत्मानम्)-अपने-आपको (सृजामि), साकार रूप से प्रकट करता हूँ। तो इसी प्रकार की पुण्य आत्मा जो दयायुक्त हृदय वाली, यज्ञमय जीवन धारण करने वाली, श्रेष्ठ योगी व जिसके हृदय में पशु, पक्षी, वृक्ष, पर्वत, मनुष्य, देवता, पितर, ऋषि, मुनि आदि सबका हित भरा रहता हो वो योगी आत्मा है एवं शिरोमणि, जगद्गुरु ब्रह्मानंद सरस्वती जी। आपका जन्म 24 दिसम्बर सन् 1908 पौष शुक्ल प्रतिपदा को हरियाणा में जिला कैथल के ग्राम चूहड़माजरा में किसान परिवार (क्षत्रिय रोड़ वंश) में हुआ। आपके पिता चैधरी बदामाराम व माता श्रीमती रामी देवी धार्मिक सरल स्वभाव वाले व ईश्वर के पूजारी थे। आप एक योगी तपस्वी, जिसका अन्तःकरण शुद्ध हो, जिसने इन्द्रियों को जीत लिया हो, जिसका शरीर अपने वश में हो, जिसको गर्मी-सर्दी, दुःख, सुख समान भाव से दिखाई देते हो आप ऐसे योग महापुरुष है। तभी आप जगद्गुरु कहलाए। ”योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।।“2 अर्थात्-(जितेन्द्रियः)-जिसकी इन्द्रियाँ अपने वश में हैं, (विशुद्धात्मा)-जिसका अन्तःकरण निर्मल है, (विजितात्मा)-जिसका शरीर अपने वश में है और (सर्वभूतात्मभूतात्मा)-सम्पूर्ण प्राणियों की आत्मा ही जिसकी आत्मा है, ऐसा (योगयुक्तः)-कर्मयोगी, (कुर्वन्)-कर्म करते हुए (अपि)-भी, (न लिप्यते)-लिप्त नहीं होता। संत ब्रह्मानंद सरस्वती जी का जीवन दर्शन ब्रह्म, जीव और जगत् आदि पर विचारणीय है। ब्रह्म अकेला ही इस नाम स्वरूपात्मक जगत् का शासक है। सकल विश्व का व्यापार उसी आज्ञा से चल रहा है। एक अच्छे न्यायाधीश की तरह वह निष्पक्ष भाव से जीवों को कर्मानुसार फल देने वाला है, वह सच्चिादानंद स्वरूप है सब दुनिया को एक समान समझता है। ”सच्चिदानंद स्वरूप! सब दुनिया का एक है भूप। न्यायकारी है न्यायकत्र्ता! तेरे न्यायालय से सब जग डरता।।“3 आत्मा अजर है, अमर है, अविनाशी है। अर्थात् कहा गया है कि शरीर का नाश होने पर भी इस अविनाशी शरीर का नाश नहीं होता। संत ब्रह्मानंद सरस्वती जी ने ‘पचासा’ में लिखा है- ”अजर अमर अविनाशी, काटो जन्न मरण की फांसी। तेरे लिए है बात जरा सी। सब जीवों की कटे चैरासी।।“4 ओउम् ही सब परा-अपरा भगवान की प्रकृति का मूल है। शब्द ब्रह्म की दृष्टि से देखा जाए तो संत ब्रह्मानंद सरस्वती जी ने निर्गुण एवं सगुण सृष्टि का मूल ‘ओंकार’ शब्द से दर्शाया गया है। भगवान श्री कृष्ण ने गीता में ‘ओम्’ को सर्वोपरि मानकर साधना करने का निर्देश दिया है। विवेचन की दृष्टि से देखा जाए ‘ऊँ’ शब्द निर्गुण ब्रह्म का वाचक है। गुरु जी की द्वितीय दृष्टि से इसका सार तीनों लोकों में दर्शाया गया। अल्पज्ञ व जनसामान्य व्यक्ति ‘ओंकार’ की महिमा को समझकर सम्यक एवं योग मार्ग जीवन जी सके। ‘अ’ से भूः लोक, ‘उ’ से भुवः लोक और ‘म्’ से सब लोक का प्रतिपादन किया है अर्थात् ओंकार एक ऐसा शब्द है जो तीनों लोकों में विद्यमान है। संत ब्रह्मानंद सरस्वती जी ने तीनों वेदों में ‘ओंकार’ की महिमा दर्शायी है। चतुर्थवेद, अर्थर्वेद में चन्द्र एवं बिन्दु की महिमा का वर्णन किया है। यदि हम संत ब्रह्मानंद सरस्वती जी की त्रिगुणात्मक शक्ति को, जिसमें ‘अ’ को ब्रह्म ‘उ’ को विष्णु और ‘म’ को शंकर मान कर ‘चन्द्र’ को माया और ‘बिन्दु’ को आदि शक्ति ब्रह्म को ओंकार में दर्शाया गया है। संत ब्रह्मानंद सरस्वती जी की दृष्टि से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को ‘ओम्’ से प्रकट मान कर बिन्दु एवं अनुस्वार को चतुर्थ वर्ण दर्शाया गया है। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी, गिरस्ती, सत् रज और तम इनका वर्णन कर बिन्दु को अलग दर्शाया गया है। ओउम के प्रथम वर्णन से सृष्टि का विकास बताया ‘उ’ के अन्दर क्रिया ‘म’ के अन्दर ठहराव दर्शाया। इस प्रकार ‘ओंकार से ही पंचमहाभूत सृष्टि का प्रादुर्भाव दर्शाया गया है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि संत ब्रह्मानंद सरस्वती जी का जीवन निर्गुण साधकों की श्रेणी में रहा है। समस्त जीवन वेदों, उपनिषदों, दर्शनों गीता एवं पुराणों पर आधारित रहा है। सनातन धर्म का मूल ओंकार को मानकर सत् के लिए कर्म करने की प्रेरणा दी है। ”‘ओउम्’ सर्व संसार का है सब कारण मूल। शब्द सर्व संसार के, धातु मूल समूल।। ‘अ’ से भूः ‘उ’ से भुवः ‘म’ से स्वः जान। ऋण् ‘अ’ में ‘उ’ में यजुर ‘म’ में साम।।“5 संत ब्रह्मानंद जी ने इस एकमात्र सत्य ब्रह्म रूप की अनुभूति साधना द्वारा कर उसे निर्गुण रूप से निरूपित किया है तथा भावना के क्षेत्र में उसकी आधिदैविक सत्ता को स्वीकार कर उस पर गुणों का आरोपकर, उसे सगुण रूप में प्रतिष्ठित किया है। माया विशिष्ट ब्रह्म ही अपर अथवा सबल अथवा सगुण ब्रह्म है तथा उसका निर्विशेष, निर्विकार स्वरूप ही निराकार है- ”सबल ब्रह्म पार ब्रह्म है, दो रूप अपार। सबल ब्रह्म साकार है, पारब्रह्म निराकार।।“6 संत का मानना है कि निर्गुण-सगुण एक ही है। सगुण की व्यावहारिक सत्ता निर्गुण का ही रूपान्तर है। सन्तों ने अपनी-अपनी भावना-बुद्धि द्वारा उसके दिव्य और विराट स्वरूप की कल्पना की है। उस निर्गुण-सगुण पारब्रह्म स्वरूप का परमात्मा की साधना एवं उपासना द्वारा प्रत्यक्ष होने वाला बताया है- ”सबल ब्रह्म प्रत्यक्ष है, क्रिया नाड़ी सार। पारब्रह्म उगति दूर है योगी योगाधार।।“7…

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विशिष्ट कवि : प्रभात मिलिंद

मौसम की रंगरेज़ (गिरिजा कुमार माथुर की एक कविता को पढ़ते हुए) लोग कहते रहते हैं कि ख़्वाबों की बदौलत ज़िन्दगी के बरस नहीं कटते फिर भी बो लिया है मैंने अपनी शफ्फाक आँखों में अदद सा एक ख़्वाब … क्योंकि तुम्हें पता नहीं ख़ामोश-खाली आसमान में परिन्दे सी उड़ान भरता एक अकेला ख़्वाब कितना दिलफ़रेब लगता है ! तुमको शायद ख़बर नहीं तुम्हारे इस भीने-पके ख़ुर्शीद-बदन की गर्म-सोंधी भाप फ़ैज़ होती हुई कितनी दूर तक उड़ती है तुमको शायद ख़बर नहीं कि तुम्हारी आवाज़ की रेशम-अना से जो एक…

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‘नयी नारी’ – स्त्री–मुक्ति का नया प्रस्थान : डॉ पूनम सिंह

‘नयी नारी’ – स्त्री–मुक्ति का नया प्रस्थान – डॉ पूनम सिंह सामाजिक , राजनीतिक चेतना के चेतना के क्रांतिकारी सर्जक बेनीपुरी ने जिस समय ‘नयी–नारी’ की परिकल्पना की थी; उस समय देश में कोई स्त्री आंदोलन नहीं था। स्त्रियों की कोई संगठित आवाज नहीं थी। पश्चिम से उठने वाली ‘नारी मुक्ति आंदोलन’ की लहर भी बहुत बाद में आई। आज वह आंदोलन नारीवाद और स्त्री–विमर्श के रूप में कई पड़ावों को पार कर चुका है। परन्तु बेनीपुरी की ‘नयी नारी’ जिस समय अपने पुराने केंचुल उतार रही थी, वह समय…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : कमलेश भट्ट कमल

1 कई गलियाँ कई रस्ते कई मंज़र समेटे है ज़रा-सी याद पूरा गाँव पूरा घर समेटे है. तुम्हें भी हौसले का उसके अन्दाजा नहीं होगा परिन्दा जो अभी बैठा है अपने पर समेटे है. शराफ़त सादगी संवेदना सम्मान सच्चाई भलेपन में वो अपने कितने ही जेवर समेटे है. वो जो फुटपाथ है उसको हिकारत से नहीं देखो वो अपने साथ ही बेबस कई बेघर समेटे है. कभी कुछ देर बैठो पास तो ख़ुद जान जाओगे स्वयं में कितनी बेचैनी कोई सागर समेटे है. उसे केवल किसी की आस्था ही जान…

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विशिष्ट कवयित्री : भावना सिन्हा

स्कूटी चलाती बेटी एक दिन देखती हूँ क्या कि — सहेलियों को अपने पीछे बिठाकर फर्राटे से स्कूटी चलाती हुई चली आ रही है बेटी फटी की फटी रह गई मेरी आंखें कब- कहाँ – कैसे सीखा है बेटी ने स्कूटी चलाना घर – भर के लिए यह अचरज का विषय है और बहस का मुद्दा भी कम वय में अधिक छूट देने से बिगड़ जाते हैं बच्चे कहीं कुछ न कर बैठें ऐसा-वैसा भुनभुनाती हैं दादी जबकि रोक टोक से बच्चों में कुंठा घर कर जाती है — अपने…

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विशिष्ट गीतकार : अवनीश त्रिपाठी

दिन कटे हैं धूप चुनते रात कोरी कल्पना में दिन कटे हैं धूप चुनते। प्यास लेकर जी रहीं हैं आज समिधाएँ नई कुण्ड में पड़ने लगीं हैं क्षुब्ध आहुतियां कई भक्ति बैठी रो रही अब तक धुंए का मन्त्र सुनते । छाँव के भी पाँव में अब अनगिनत छाले पड़े धुन्ध-कुहरे धूप को फिर राह में घेरे खड़े देह की निष्ठा अभागिन जल उठी संकोच बुनते । सौंपकर थोथे मुखौटे और कोरी वेदना वस्त्र के झीने झरोखे टांकती अवहेलना दुःख हुए संतृप्त लेकिन सुख रहे हर रोज घुनते । मन्त्र…

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प्रसाद और बेनीपुरी के ऐतिहासिक नाटकों की चरित्र योजना :: डॉ शेखर शंकर मिश्र

प्रसाद और बेनीपुरी के ऐतिहासिक नाटकों की चरित्र योजना – डॉ शेखर शंकर मिश्र नाटक दृश्यकाव्य की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विधा है, जिसे ‘अवस्था की अनुकृति’ कहा गया गया है | नाटक की मुख्य संरचना नाट्य वस्तु पर ही निर्भर करती है, दूसरे शब्दों में नाट्य वस्तु विभिन्न घटनाओं के मध्य चरित्रों का कार्य व्यापार है | नाटक ऐतिहासिक हो या सामाजिक उसके मुख्य और सहयोगी चरित्र ही कथावस्तु को गति प्रदान करने के लिए उत्तरदायी होते हैं | ऐतिहासिक नाटकों की सर्जना इतिहास विश्रुत कथानक और उक्त कालखंड से सम्बद्ध…

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रामवृक्ष बेनीपुरी एक अद्भुत रचनाकार

रामवृक्ष बेनीपुरी एक अद्भुत रचनाकार – संजीव जैन हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के लेखकों में रामवृक्ष बेनीपुरी एक विशिष्ट स्थान के अधिकारी हैं, परंतु हिन्दी  साहित्य के इतिहास में उन्हें वह विशिष्ट स्थान प्राप्त नहीं हुआ। वे एक लेखक होने के साथ साथ महान विचारक, चिन्तक, क्रान्तिकारी, पत्रकार, और संपादक भी थे। वे हिन्दी साहित्य के शुक्लोत्तर युग के प्रसिद्ध रचनाकार थे।       आपका जन्म: 23 दिसंबर 1899, मुजफ्फरपुर जिले के वेनीपुर ग्राम के एक कृषक परिवार में हुआ था और  7 सितंबर 1968, को आपने पार्थिव…

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गेहूँ और गुलाब :: रामवृक्ष बेनीपुरी

गेहूँ और गुलाब गेहूँ हम खाते हैं, गुलाब सूँघते हैं। एक से शरीर की पुष्टि होती है, दूसरे से मानस तृप्‍त होता है। गेहूँ बड़ा या गुलाब? हम क्‍या चाहते हैं – पुष्‍ट शरीर या तृप्‍त मानस? या पुष्‍ट शरीर पर तृप्‍त मानस? जब मानव पृथ्‍वी पर आया, भूख लेकर। क्षुधा, क्षुधा, पिपासा, पिपासा। क्‍या खाए, क्‍या पिए? माँ के स्‍तनों को निचोड़ा, वृक्षों को झकझोरा, कीट-पतंग, पशु-पक्षी – कुछ न छुट पाए उससे ! गेहूँ – उसकी भूख का काफला आज गेहूँ पर टूट पड़ा है? गेहूँ उपजाओ, गेहूँ…

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