खास कलम : अंजनी कुमार सुमन

1 ये है मेरा ये है तेरा को किनारा रखना मेरा भारत तो हमारा था हमारा रखना कहा इकबाल ने सारे जहाँ से अच्छा था हमारे देश को वैसा ही दुबारा रखना किसी भी मुल्क में होता नहीं ऐसा यारों सभी जातों सभी धर्मों को दुलारा रखना हटा दो देश के ऊपर घिरे सितारों को जरूरी क्या है सितारे को सितारा रखना यहाँ सापों को भी मेहमान हम बनाते हैं हमें आता है सपेरे सा पिटारा रखना 2 हवा पर गर हवा दोगे तो फुग्गा फूट जाता है कई सपनों…

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विशिष्ट कहानीकार :: चाँदनी समर

कब्र की मिट्टी – चाँदनी समर सर्दी और बढ़ गई थी। मैने लिहाफ़ खींच खुद को उसमे लपेट लिया कि आज देर तक सोऊंगी । वैसे भी रविवार है। मगर तभी फ़ोन की घंटी बजी और मुझे उठ के बैठ जाना पड़ा। सारी सर्दी अचानक गायब हो गई। मुझे जैकेट पहनने का भी ध्यान न रहा। सिर्फ शॉल लपेट निकल गई। मुहिब के घर के बाहर मीडिया वालों की भीड़ जमा थी। मैं किसी तरह भीड़ को चीड़ते हुए घर मे घुसी तो सामने का दृश्य देख कर एक क्षण…

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सामाजिक दायित्व के बोध की ग़ज़लें :: चुप्पियों के बीच

  सामाजिक दायित्व के बोध की ग़ज़लें :: चुप्पियों के बीच मुकेश कुमार सिन्हा वो विज्ञान की विद्यार्थी रहीं हैं। रसायन शास्त्र पसंदीदा विषय है। फिर भी साहित्य में गहरी पैठ है। वो गज़ल कहती हैं, वो कविता रचती हैं। आलेख और समीक्षा में भी उनकी गहरी अभिरुचि है। जी हाँ, डॉ भावना एक ऐसी ही कलमकार हैं, जो रसायन शास्त्र की प्राध्यापिका हैं, फिर भी हिन्दी के प्रति समर्पण है। डॉ. भावना की ‘रसायनी’ का हिन्दी साहित्य से मेल-जोल वाकई काबिल-ए-तारीफ है। अक्स कोई तुम सा (2012) और शब्दां…

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लघुकथा :: ज्वाला सांध्यपुष्प

मां का आशीर्वाद – ज्वाला सांध्यपुष्प आज शहर के युवा चिकित्सक अमितशंकर के प्रथम पुत्र की छट्ठी की रस्म थी और वे खुद अनुपस्थित थे।शहर के सभी गणमान्य व्यक्ति पधारे और भोज खाकर चले भी गए। उपहारों से अमित का घर भर गया है मगर उनकी पत्नी अस्मिता के चेहरे पर मायूसी-सी छाई है, पति के पुश्तैनी घर से न लौट पाने को लेकर।रात के ग्यारह बज रहे हैं और डा अमित अभी तक न लौटे हैं। शहर से तक़रीबन बीस किलोमीटर दूर देहात में मकान होने से तो ऐसा…

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विशिष्ट ग़ज़लकार :: स्वदेश भटनागर

1 वक्त ने कैसी तल्खियां दे दी कब्र के नाम चिट्ठियां दे दी ले के लम्हों ने हमसे आवाजें बात करने को चुप्पियां दे दी छुप गये हर्फ जाके लफ्जों में किसने कागज को बर्छियां दे दी ऊंघते हैं ये क्यों हसीं मंजर सुबह को किसने लोरियां दे दी हमने बच्चों से छीनकर तितली याद करने को गिनतियां दे दी 2 किरनों की तरह हंस पड़ा अंदर कौन सूरज-सा यह उगा अंदर ये जो उठकर गया है इक लम्हा देर तक शाख-सा हिला अंदर रास्ते खुद में जब उलझ जाये…

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विशिष्ट गीतकार :: अवनीश सिंह चौहान

देवी धरती की दूब देख लगता यह सच्ची कामगार धरती की मेड़ों को साध रही है खेतों को बाँध रही है कटी-फटी भू को अपनी- ही जड़ से नाथ रही है कोख हरी करती है सूनी पड़ी हुई परती की दबकर खुद तलवों से यह तलवों को गुदगुदा रही ग्रास दुधरू गैया का परस रहा है दूध-दही बीज बिना उगती है देवी है देवी धरती की चिड़िया और चिरौटे घर-मकान में क्या बदला है, गौरेया रूठ गई भाँप रहे बदले मौसम को चिड़िया और चिरौटे झाँक रहे रोशनदानों से कभी…

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संस्मरण :: बाघ की गुर्राहट सुन पेड़ पर कटी रात

बाघ की गुर्राहट सुन पेड़ पर कटी रात! – बिभेष त्रिवेदी, वरीय पत्रकार यह बनौली फारेस्ट गेस्टहाऊस है। वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के बड़े परिसर में बेतिया राज का गेस्टहाऊस। यहां शिकार के लिए आने वाले अंग्रेज अधिकारियों की मेजबानी की जाती थी। आजादी के बाद बेतिया राज का जंगल वन विभाग को सौंपा गया। इसी कैंपस में डीएफओ और रेंजर के भी आवास हैं। कैंपस में घुप अंधेरा पसरा है। बीच-बीच में अलग-अलग प्रजातियों के चिड़ियों की आवाज। शायद वे एक-दूसरे से कह रही हैं- तू इत्मीनान से सो जा,…

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विशिष्ट कवि : अभिजीत

रोटी की बात मत करो रोटी की बात मत करो रोटी पर सवाल मत करो बात करनी हो तो करो सिर्फ मेरी मेरे आगे रोटी क्या है मात्र गूंधे हुए आटे का सिका हुआ एक टुकड़ा पर मैं वो हूँ जिसमें समाया है सब कुछ देखो मेरी ओर देखो और बताओ तुम्हें किसकी है ज्यादा जरूरत रोटी की या मेरी ? देखो भूल रहे हो तुम रोटी का रंग-रूप, उसका आकार देखते रहो मेरी तरफ मिट रही है तुम्हारी भूख ‘मिट रही कि नहीं’ मिट रही है ना…’ बस देखते…

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