पुस्तक समीक्षा : मुकेश दुबे

रूमानी कलेवर में गंभीर चिंतन सहेजती कहानियाँ डार्क चॉकलेटी आवरण पर रखा कप, कप से उठती भाप में नज़र आते दो दिल और सुर्ख गुलाब ! काफ़ी हैं महसूस कराने के लिए कि संग्रह कच्ची उम्र के जज्बातों की पनाहगार किसी कॉफ़ी हाउस में पनपती प्रेमकथाओं का लेखाजोखा है। जैसे-जैसे पृष्ठ पलटते जाते हैं, मन की भ्रांति उसी तरह दूर होती है जिस तरह ‘साकेत’ में लिखा है राष्ट्रकवि गुप्त जी ने- नाक का मोती अधर की कांति से बीज दाड़िम का समझकर भ्रांति से देखकर सहसा हुआ शुक मौन…

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आलेख : डॉ संजीव जैन

रागदरबारी : मानवीय संवेदना के भौथरेपन का प्रतिदर्श रागदरबारी मानवीय संवेदना के निरंतर भौंथरे होते जाने की कहानी है। इसको पढ़ते हुए पाठक के मन में किसी भी पात्र या स्थिति के प्रति कोई सकारात्मक संवेदना पैदा नहीं होती हम सिर्फ हंसते हैं, चौंकते हैं और खिन्न होते हैं, हर चरित्र पर हर स्थिति पर और प्रत्येक संबंधों पर। इसमें कोई कहानी नहीं है, चरित्रों का कोई विकास नहीं है, संबंधों की बुनावट नहीं है, सब कुछ चित्रों की तरह होता हुआ नजर आता है। दृश्य पटल पर संवाद, स्थितियाँ,…

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विशिष्ट कहानीकार : ऊमा झुनझुनवाला

पूनम का चाँद हम चाहे दुनिया के सामने जितने भी बहादुर बनते फिरें मगर असल जगह अपनी बहादुरी ना दिखा पाने का ग़म या फिर कहें कि हमारी कायरता मरते दम तक हमारा पीछा नहीं छोडतीl कुछ ऐसा ही हाल आयशा का था. जैसे ही नवम्बर का महीना शुरू होता है पूरे साल की टीस एक बिंदु पर केन्द्रित होकर ग्लानि भाव से त्रस्त आयशा को उसकी कायरता उसकी आत्मा कोंचने लगती है; लानत भेजती रहती उस पर. उसके मन में ये बात पैठ कर चुकी थी कि दोस्ती की…

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विशिष्ट कवयित्री : कोमल सोमरवाल

1 फासला- (स्त्री एकालाप) तुम चलते रहे पौराणिक कथाओं का ताज पहने मैं कसती रही अपने ऐबों के चोगे का फीता तुम अप्रैल की गोधूलियों में लहर बनकर बरसाते रहे आग के गोले मेरी जानिब मैं भटकती रही जंगलों में नीलापन उतारने वाली किसी नायाब जड़ी बूटी की तलाश में खरोंच कर मेरी रूह को नाखूनों से तैयार करते रहे तुम हर दिन नया खाँचा जिसमें समा जाने को मैं काटती रही स्वाभिमान अपना रोज़ थोड़ा थोड़ा तुम मुझे अपनी विहस्की में डुबोते रहे बर्फ के टुकड़ों की मानिन्द और…

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विशिष्ट गीतकार : डॉ. राम वल्लभ आचार्य

1 मन में इतनी उलझन मन में इतनी उलझन जितने सघन सतपुड़ा वाले वन, हल्दीघाटी हुई जि़ंदगी चेरापूंजी हुए नयन । जयपुर जैसे लाल गुलाबी रहे देखते हम सपने, लेकिन चम्बल के बीहड़ से रहे गुजरते दिन अपने, कब से प्यास संजोये बैठा बाढ़मेर सा व्याकुल मन दिल्ली जैसा दिल बेचारा जीवन प्रश्नों से जूझे, उत्तर किन्तु अबूझमाड़ से रहे अभी तक अनबूझे, पीड़ायें नित रास रचातीं समझ हृदय को वृन्दावन चाहा बहुत. मगर. अाशायें शांति निकेतन बनीं नहीं, चैन हृदय का हुआ. गोधरा जिसने खुशियाँ जनीं नहीं, इच्छाएँ हरसूद…

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खास कलम : अंजना बाजपेयी

1 तेजाब कुछ आवाजें उठीं कुछ कलम से दर्द बहा कुछ लोगों के मन पिघल गये .. एक माँ की आँखों से आँसू बहते रहे आग भरी थी आँखों में आज ईश्वर भी कहीं छुप गये इन आँखों के सामने आते तो जलकर भस्म हो जाते.. इन आँखों से गिरते आँसू तेजाब बनते रहे अंतर में ज्वालामुखी जो उफन रहा था न्याय की देहरी पर अन्याय होता रहा ईश्वर न जाने कहाँ सोता रहा … संवेदनाओं के छीटें से कुछ अखबार रंगे फिर शांति, तूफान से पहले जैसी कुछ दिन…

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विशिष्ट कवि : विजय सिंह

जंगल जी उठता है महुआ पेड़ के नीचे गांव की लड़कियों की हँसी में जंगल है जंगल अब भी जंगल है यहाँ गोला – बारूद फूटे गरजे आसमान से तोप जंगल अब भी जंगल है गांव की लड़कियां जानती हैं हँसती हैं – मुस्कुराती हैं टुकनी मुंड में उठाये जब भी निकलती हैं महुआ – टोरा बीनने जंगल की ओर तब जंगल का जंगल जी उठता है उनके स्वागत में… छानी में तोरई फूल लखमू के बाड़ी में खिल रहे हैं किसम – किसम के फूल जोंदरा (भुट्टा) अभी पका…

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आलेख : प्रसून लतांत

गांधी ने महिलाओं को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा महात्मा गांधी महिलाओं को रूढ़ियों और कुप्रथाओं से मुक्त करने और स्वतंत्र रूप से व्यक्तित्व विकास के हिमायती रहे। गांधी जी ने महिलाओं के हक में जोरदार ढंग से जब आवाज उठाई, जब भारत में महिलाओं की दयनीय स्थिति होने के बावजूद उनके हक में कोई आवाज नहीं उठाता था। कोई कल्पना भी नहीं करता कि स्त्रियां भी स्वतंत्र हो सकती हैं। लेकिन गांधी जी ने बिना किसी की परवाह किए स्त्रियों के उद्धार के लिए कई कदम उठाए। गांधी जी ने…

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विशिष्ट गजलकार : ज्ञान प्रकाश विवेक

1 तमाम घर को बयाबां बना के रखता था पता नहीं वो दिये क्यों बुझा के रखता था बुरे दिनों के लिए तुमने गुल्लकें भर लीं मैं दोस्तों की दुआएं बचा के रखता था मेरे फिसलने का कारण भी है यही शायद कि हर कदम मैं बहुत आजमा के रखता था वो जिस नदी पे उछाले हैं आपने पत्थर मैं उसपे कागजी कश्ती बना के रखता था वो तितलियों को सिखाता था व्याकरण यारों इसी बहाने गुलों को डरा के रखता था हमेशा बात वो करता था घर बनाने की…

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