विशिष्ट कवि : अरविंद भट्ट

चारदीवारी तुम्हारे अपने शहर में, अतिव्यस्त मार्केट की चकाचौंध, और लोगों की रेलमपेल के सहारे आगे बढ़ते, जहाँ सड़क और फुटपाथ के अंतर की सीमा रेखा, शायद अपना अस्तित्व बचाते बचाते, कब का दम तोड़ चुकी थी. अब सब निर्बाध था, बिना किसी सीमा का मूल्यांकन किये, कोई कहीं से भी चल सकता था, किसी को भी धकिया सकता था. मैं बढ़ता जा रहा था धीरे-धीरे, इस धकापेल और अनचाहे शोर से , दूर जाने की छटपटाहट में, एक इमारत की तलाश में. पर इस अतिव्यस्त से दिखने वाले ,…

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खास कलम : आराधना शुक्ला

1 शातिर हैं अब हवा के झोंके, कातिल बड़ी बयार चिरैय्या खबरदार नहीं घोसला रहा सुरक्षित, पिंजड़े में भी खतरा कैसे जान सकेगी, किसका मन है कितना सुथरा खंजर नीड़ के तिनके, काँटे पिंजड़े की दीवारें हंसों के चेहरे में छिपती, नागों की फुफकारें बाज़ तेरे हमदर्द बने हैं, गिद्ध हैं पहरेदार चिरैय्या खबरदार आसमान है मात्र भरम, ये सभी उड़ानें छल हैं माना उड़ सकती है चिड़िया, पंखों में जो बल है पर क्या होगा, जब उड़ान में पर नोचे जायेंगे पीड़ित को ही नभ के स्वामी, दोषी बतलायेंगे…

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पुस्तक समीक्षा : अरविंद भट्ट

पुस्तक समीक्षा :: वह सांप सीढ़ी नहीं खेलता कविता लेखन एक साधना है. यह शब्दों का ताना-बाना भर ही नहीं होता. भावनाओं को व्यक्त करने के लिए शब्दों को साधना पड़ता है, परखना पड़ता है और फिर कल्पना की कसौटी पर कसते हुए एकाकार हो जाना होता है. यह सब कार्य एक साधक ही कर सकता है जिसके ह्रदय में भावनाएं शब्दों का स्पंदन कर ती हों. जब कोई साधक कल्पनाओं के भंवर में से अपने अतीत को निकाल कर वर्तमान में प्रत्यक्ष करता है और जब वह शब्दरूपों को…

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सर्दी, गर्मी और बारिश में भीगता हुआ शायर : भावना

सर्दी, गर्मी और बारिश में भीगता हुआ शायर लेखन की कोई अवस्था नहीं होती, लेकिन लेखन का संयोग अवश्य होता है। वह संयोग जो अकस्मात् ही  दरवाजे पर आकर भावनाओं और संवेदनाओं को दस्तक देने लगता है। वही संयोग कभी  दुखद होता है तो कभी सुखद।  दुखद संयोग लेखक की जिंदगी की एक मुकम्मल तस्वीर सामने रख देता है, जिसमें वह  अतीत, वर्तमान और भविष्य की पगडंडी पर चलता हुआ कुछ- कुछ लिखने की तैयारी खुद कर लेता है। यही लेखक की अपनी सत्ता है और अपनी इसी सत्ता का…

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विशिष्ट कहानीकार : अवधेश प्रीत

कजरी – अवधेश प्रीत कजरी की हालत अब देखी नहीं जा रही। रात जैसे-जैसे गहराती जा रही है फजलू मियां की तबीयत डूबती जा रही है। वह इस बीच कभी घर के भीतर तो कभी बथान तक कई चक्कर लगा चुके थे। जब भी वह बथान तक जाते थम कर खड़े हो जाते। कजरी उन्हें सर उठाकर देखती और वह लक्ष्य करते कि उसकी आंखें पनियायी हुई हैं। उनका दिल धड़क उठता और वह गहरी उदासी में डूबे कजरी का सर सहलाते। कजरी चुपचाप सर झुका लेती। वह मन ही…

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विशिष्ट कवयित्री : कल्पना मनोरमा

अग्निफूल सूरज के अनुभव में चाँद छोटा चाँद के अनुभव में तारा छोटा तारे के अनुभव में जुगनू छोटा और जुगनू भी समझता है छोटा दीपक को लेकिन ज्यादा नहीं फिर भी कुछ तो जरूर होता है अद्भुत छोटे के निज में भी समझाता है दीपक तेजस्विनी शिखा को दिखाकर उसके पास में अभी-अभी उगे अग्निफूल वसंत की आहट है वसंत की आहट है याकि शोर है पतझड़ का कहना कठिन है हाँलाकि कर दिया है दिशाओं ने प्रारम्भ रँगना अपने होंठों को रचने लगी है भोर अल्पनाएँ नई -नई…

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खास कलम : गरिमा सक्सेना

रक्षाबंधन बहन-भ्रात के प्यार का, यह अनुपम त्योहार। रक्षाबंधन जोड़ता, दिल से दिल का तार।। कच्चा धागा प्रेम का, बाँध भ्रात के हाथ। माँगे भगिनी भ्रात से, जन्म-जन्म का साथ।। रोली, मस्तक पर लगा, राखी बाँधे हाथ। बहन दुआयें दे रही, चूम भ्रात का माथ।। बेटी को नित कोख में, मार रहा संसार। ऐसे में कैसे मने, राखी का त्योहार।। नवबेलों ने वृक्ष के, राखी बांधी हाथ। हर आँधी तूफान में, भय्या देना साथ।। चूम लिफाफे में रखा, राखी, रोली प्यार। यूँ बहना ने भ्रात से, जोड़े दिल के तार।।…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : कुँअर बेचैन

1 मिल न पाए जब ज़मीं पर, तो उड़ानों में मिले बन के बादल दोस्त हम कितने ज़मानों में मिले अपनी क्या औक़ात जब बिकने लगेभगवान भी उनके बुत मंदिर से भी पहले दुकानों में मिले हमसे मत पूछो निचोड़ा किस क़दर उनको गया फूल क्यारी में कहाँ, अब इत्रदानों में मिले ये नई कालोनियाँ, ये फ्लेट क्या दे पायेंगे वो जो रिश्ते हमको गलियों के मकानों में मिले जिनकी ख्वाहिश है कि फिर टुकड़ों में बँट जाए चमन ऐसे कुछ चेहरे भी अपने बाग़वानों में मिले क्या पता सादा…

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विशिष्ट गीतकार : रविशंकर मिश्र

नज़र लग गयी घायल है, चोट किधर किधर लग गयी, सोने की चिड़िया की फिकर लग गयी। हौसला गज़ब का था गज़ब की उड़ान एक किये रहती थी धरा आसमान बड़ी खूबसूरत थी नज़र लग गयी। गहन अँधेरों में जब दुनिया घबराती परों में उजाला भर रास्ता दिखाती तभी “विश्वगुरु” वाली मुहर लग गयी इतनी तकलीफ़ है कि कही भी न जाये बढ़ते ही आते हैं नफ़रत के साये प्यार बाँटने में जब उमर लग गयी कैसा यू-टर्न चुपके ही चुपके ये काम हो गया, भारत इंडिया का गुलाम हो…

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