विशिष्ट कवयित्री: पूनम सिंह

(बाबा की सजल स्मृति को समर्पित) एकमुश्त बहुवचन है तुम्हारी कविता  फक्कड़ अक्खड़ और घुमक्कड़ तीन विशेषणों से परिभाषित तुम्हारा नाम अपनी बहुपरती संरचना में पूरी एक कविता है जब भी पढ़ती हूँ इसे अर्थों की तलाश में बिबाइयां फटे खुरदुरे पैरों की अंतहीन यात्रा मेरे साथ होती है अदम्य जिजीविषा का उत्कट आवेग लेकर तुमने लड़ी थी कठिन लड़ाईयां पूछे थे व्यवस्था से खतरनाक सवाल और अनुतरित प्रश्नों  के साथ गये थे आम तक सकर्मकता की सामर्थ्य पहचानने बाबा! यहीं से शुरू होती है न तुम्हारी कविता बंजर तोड़ते …

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पुस्तक समीक्षा : उछालो यूँ नहीं पत्थर

मुंगेर के युवा ग़ज़लकार विकास की गजल संग्रह “उछालो यूँ नहीं पत्थर” से गुजरते हुए – कुमार कृष्णन आधुनिक हिन्दी गजल अपने मौलिक चिंतन तथा विशिष्ट कथ्य-प्रतिभा के बल पर चर्चित और प्रशंसित हो रही है। हालांकि कुछ आलोचक हिन्दी गजल को सौंदर्य के प्रेम-प्रसंग के अंतर्गत  ही देखना पसंद करते हैं और अपनी उसी मानसिकता के साथ इसे परिभाषित भी करते हैं। जबकि सच है कि हिन्दी गजल अपने जन्मकाल से ही जीवन यथार्थ से जुड़ी रही है। ऐसी भी बात नहीं है कि इसके भीतर प्रेम और सौंदर्य…

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विशिष्ट गीतकार : जय चक्रवर्ती

1 आदमी थे हम छोडकर घर-गाँव, देहरी–द्वार सब आ बसे हैं शहर मे इस तरह हम भी प्रगति की दौड़ को तत्पर हुए.   चंद डिब्बों मे ‘गिरस्ती’ एक घर पिंजरानुमा मियाँ-बीवी और बच्चे ज़िन्दगी का तरजुमा   भीड़ के सैलाब मे हम पाँव की ठोकर हुए.   टिफिन , ड्यूटी, मशीनों की धौंस आँखों मे लिए दौड़ते ही दौड़ते हम वक़्त का हर पल जिए   गेट की एंट्री, कभी- हम सायरन का स्वर हुए.   रही राशन और पानी पर सदा चस्पाँ नज़र लाइनों मे ही लगे रह…

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खास कलम: अफरोज आलम

खुद कलामी  मेरे रूखसार पे जो हल्की हल्की झुर्रियां आ गई हैं यकिनन उस को भी आ गई होंगी जिंंदगी के सफ़र मे उमर के जिस ढलान पर मैं खडा हूँ यकीनन वो भी वहीं खडा होगा शब-वो-रोज के मद-व-जजर रंज-व-गम, आंसू  व खुशी सरदी गरमी, सुबह शाम से उलझते हुए चढती उमर का वो चुलबुलापन जो अब संजीदगी में ढल चुका है एेन मुमकिन है उस के भी मेजाज का हिस्सा होगा । हां ये मुमकिन है गैर मतवकाै तौर पे सरे राह तुम कहीं कभी मिल भी जाओ…

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बलात्कार एक सामाजिक अपराध बनाम बीमार समय और समाज : संजीव जैन

बलात्कार एक सामाजिक अपराध बनाम बीमार समय और समाज    हम जिस समय और समाज में रह रहे हैं वह अपने सामूदायिक दायित्वों की पूर्ति की दृष्टि से बीमार है और निरंतर अपाहिज होते जाने की ओर बढ़ रहा है। इस बीमारी के लक्षण दैहिक तो हैं ही, इसमें तो कोई शक है ही नहीं, परंतु मानवीय अभिवृत्तियों और मनोवृत्तियों का विश्लेषण हमें चौंका देता है कि दर असल हम कहां जा रहे हैं?    बीमार समाज के सबसे महत्वपूर्ण लक्षण हैं, हिंसा और बलात्कार। स्त्रियों के प्रति बलात्कार और…

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विशिष्ट कहानीकार: सुशील कुमार भारद्वाज

निकाह की दावत   सुबह से ही पूरा गाँव चहल-पहल में डूबा था. लग रहा था जैसे कि पूरा गाँव ही एक टांग पर खड़ा हो गया हो. हर कोई अपने–अपने तरीके से अपनी सक्रिय सहभागिता दिखाना चाह रहा था. कोई किसी से उन्नीस दिखने के लिए कतई तैयार नहीं था. आखिर हो भी क्यों  नहीं? बेटी की शादी है. और बेटी की शादी में तो अमूमन हर इंसान तहे दिल से मदद करना चाहता ही है. बेटी किसी एक की नहीं होती वह पूरे समाज की बेटी होती है.…

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विशिष्ट गजलकार: सुशील साहिल

1 निगाहें मेरी जाती हैं जहाँ तक नज़र आता है तू मुझको वहाँ तक महब्बत की अजां देता रहूँगा कोई आये, नहीं आये यहाँ तक कमर तक आ गया आबे-मुहब्बत ज़रा देखें ये जाता है कहाँ तक दिले-नादां ज़रा अब बाज़ आ जा उसे हम छोड़ आये हैं मकाँ तक जहां में धूम हिंदी की मची है नहीं महदूद ये हिन्दोस्ताँ तक शबाबो-मैकदा से तेरी रग़बत कभी नीलाम कर देगी मकाँ तक तेरा जलवा हर इक शय में निहाँ है तू ही तू है ज़मीं से आसमाँ तक न बाज़…

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