विशिष्ट गीतकार : संध्या सिंह

चौमासा  थोड़ी धूप छुपा कर रखना सीलन का मौसम आना है सागर से विकराल भयानक काले काले दैत्य उठेंगे जहाँ प्रेम की लिखी इबारत ठीक वहीं जा कर बरसेंगे जम जायेगी काई मन पर अपने पाँव जमा कर रखना फिसलन का मौसम आना है सन्नाटे में साँय साँय कर हवा डराने को निकलेगी तेरा कुछ अनकहा चुरा कर पत्ते पत्ते पर लिख देगी शायद तुझ पर गिरे बिजलियाँ थोड़ा धीर बचा कर रखना विचलन का मौसम आना है मन बांचे तरुणाई   मंजिल खेले  आँख मिचौली छूटे फिसल फिसल कर हमने…

Read More

आलेख : संतोष सारंग

हिंदी उपन्यासों में ग्रामीण जन-जीवन का चित्रण  – संतोष सारंग   उत्तर आधुनिकता का लबादा ओढ़े आज का आम आदमी नगरीय तौर-तरीके अपनाने को आकुल है। ग्राम्य जीवन में भी शहरीपन समा चुका है। ठेठ देहाती जीवन मूल्यों पर चोट करती अपसंस्कृति का दर्शन खेत-खलिहानों व पगडंडियों तक में हो जाता है। शहरीकरण, औद्योगीकरण, उदारीकरण के कारण ग्रामीण जनजीवन में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। टूटते-बिगड़ते रिश्तों की डोर, सामाजिक सरोकारों से विमुख होकर स्व तक सीमित हो जाना, सहजीवन की वृत्तियों को भुला देना, यह क्या है? प्रगतिशील…

Read More

विशिष्ट ग़ज़लकार : विज्ञान व्रत

1 कुछ नायाब ख़ज़ाने रख ले मेरे अफ़साने रख जिन का तू दीवाना हो ऐसे कुछ दीवाने रख आख़िर अपने घर में तो अपने ठौर-ठिकाने रख मुझ से मिलने-जुलने को अपने पास बहाने रख वरना गुम हो जाएगा ख़ुद को ठीक-ठिकाने रख 2 आप कब किसके नहीं हैं हम पता रखते नहीं हैं जो पता तुम जानते हो हम वहां रहते नहीं हैं जानते हैं आपको हम हां मगर कहते नहीं हैं जो तसव्वुर था हमारा आप तो वैसे नहीं हैं बात करते हैं हमारी जो हमें समझें नहीं हैं…

Read More

आओ मनाएं हैप्पी वाली हेल्दी होली

आओ मनाएं हैप्पी वाली हेल्दी होली                                               – प्रियंका जायसवाल, बाल साहित्यकार एक तो परीक्षा की झंझट से मुक्ति और दूसरा होली का त्योहार। बच्चों के तो खुशी के मारे पैर जमीन पर ही नहीं पड़ रहे थे। रौनक व मित्रमंडली भी इसी उधेड़बुन में लगे थे कि इस बार जोरदार होली कैसे मनाया जाए? ‘‘हां, पर हमारे मोहल्ले वाले तो रंगों के नाम से ही ऐसे डर रहे हैं,…

Read More

खास कलम : विनय

हँसी का सौंदर्य झरने की तरह कल–कल करती ध्वनि आसमान में चिड़ियों का कलरव फूलों पर मंडराते भौंरों का गुंजन या फिर अल्हड़ हवाओं की सनसनाहट सच कहूँ ऐसे ही हँसती हो तुम तुम्हारी हँसी में जैसे ढलता है प्रकृति का सौंदर्य साज पर सँवरता है कोई राग सुबह की पहली किरण पर उल्लासित कूकती है कोई कोयल चाँदनी की फुहारों में जैसे मचलती है नदी की जलधारा तुम्हारी हँसी जैसे सावन की पहली घटा जीवन का पहला वसंत सौंदर्य रस का पहला छंद किसी युवती का पहला शृंगार शिशु…

Read More

विशिष्ट कवि : सुशील कुमार

बारिश, पहाड़ और भूख रातभर बारिश हुई है पहाड़ पर चीड़-साल नहा गया पोर-पोर नेतरहाट में फुनगियों-पत्तों से टघर रहा पानी अनगिन धार बनकर रिस रहा घोसलों में झोपड़ों में तराई में तटबंधों पर नालों में हलचल सी मची है उफ़न रही नदी भी बेतरह कछार पर मौसम जरा थमा कि पंछी बार-बार पंख खोल रहे देह से जलबून्द झाड़ रहे कभी एकटक अपने चूजों को देख रहे कभी दाने तलाशते धनखेतों पर उड़ रहे गाय बैल भैंस बकरियाँ दालानों में शोर कर रहे आसपास कुत्ते रह-रहकर भूंक रहे कहीं…

Read More

विशिष्ट कहानीकार : सुशील कुमार भारद्वाज

नंदनी नंदनी. हां हां. वही नंदनी जो खुद में खोई खोई सी रहती है. अरे वही नंदनी, जिसे राजनीति और राजनेता शब्द से इतनी चिढ़ है कि चर्चा शुरू होते ही तुनककर कह उठती है –“दुनियां का एक लाख दुष्ट मरता है तो एक नेता जन्म लेता है. नेता के लिए न तो कोई आदर्श होता है न ही कोई विचारधारा. इनके लिए यदि कुछ होता है तो वह है सत्ता. सत्ता की भूख. जिसके लिए वह कोई भी सुकर्म या कुकर्म बेझिझक कर सकता है क्योंकि उसे पता है…

Read More

विशिष्ट कवयित्री : रुचि भल्ला

माफ़ीनामा मैं क्षमाप्रार्थी हूँ दुनिया के सारे बच्चों के प्रति कि उन्हें मारा गया छोटी -छोटी बातों पर हाथ उठाया उनकी छोटी गल्तियों पर उन्हें चोट देते रहे जबकि बड़ी मामूली सी बातें थीं वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के टूटने की तरह नहीं था उनके हाथ से काँच के गिलास का टूट जाना और बच्चों ! जब तुमने स्कूल का काम नहीं पूरा किया लाख सिखाने पर पहाड़े नहीं याद किए बाबू जी की छड़ी छुपा दी टीचर के बैठने से पहले उनकी कुर्सी हटा दी ताजा खिला गुलाब तोड़ डाला…

Read More