खास कलम : राघवेंद्र शुक्ल

भीड़ चली है भोर उगाने हांक रहे हैं जुगनू सारे, उल्लू लिखकर देते नारे, शुभ्र दिवस के श्वेत ध्वजों पर कालिख मलते हैं हरकारे। नयनों के परदे ढंक सबको मात्र दिवस का स्वप्न दिखाने। भीड़ चली है भोर उगाने दुंदुभि बजती, झूम रहे हैं, मृगतृष्णा को चूम रहे हैं, अपनी पीड़ाएं फुसलाकर नमक-नीर में घूम रहे हैं। किसी घाव पर किसी घाव के शुद्ध असंगत लेप लगाने। भीड़ चली है भोर उगाने। नए वैद्य के औषधिगृह में दवा नहीं बनती पीड़ाएं। सत्य नहीं, कवि ढूंढ रहे हैं चारणता की नव…

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खास कलम : राहुल शिवाय

दोहा भूख, गरीबी, बेबसी, पीड़ा औ संत्रास। यही आज उपलब्धियाँ, कृषक-जनों के पास।। नई सभ्यता ने जने, ऐसे आज उलूक। संस्कृति के नभ पर रहे, मुख ऊपर कर थूक।। जबसे इंटरनेट ने, जमा लिया व्यापर।। सन्नाटे से भर गया, उछल-कूद-त्योहार। कैसे रिश्तों की बुझे, वहाँ बताओ प्यास। कैक्टस हैं देते जहाँ, फूलों का अहसास।। जप, तप, पूजा-पाठ सब, लगने लगे फिजूल। जबसे हमने प्रेम की, शीश लगा ली धूल।। अधिवक्ता हैं भेडिये, औ जज हैं जल्लाद। ऐसे में मासूम की, कौन सुने फरियाद।। अपने दुख पर औरतें, वर्षों से हैं…

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खास कलम : त्रिलोक सिंह ठकुरेला

कुण्डलियां जिनकी कृपा कटाक्ष से, प्रज्ञा, बुद्धि, विचार। शब्द, गीत, संगीत, स्वर, विद्या का अधिकार॥ विद्या का अधिकार, ज्ञान, विज्ञानं, प्रेम-रस। हर्ष, मान, सम्मान, सम्पदा जग की सरबस। ‘ठकुरेला’ समृद्धि, दया से मिलती इनकी। मंगल सभी सदैव, शारदा प्रिय हैं जिनकी॥ अपनी अपनी अहमियत, सूई या तलवार। उपयोगी हैं भूख में, केवल रोटी चार॥ केवल रोटी चार, नहीं खा सकते सोना। सूई का कुछ काम, न तलवारों से होना। ‘ठकुरेला’ कविराय, सभी की माला जपनी। बड़ा हो कि लघुरूप, अहमियत सबकी अपनी॥ सोना तपता आग में और निखरता रूप। कभी…

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पुस्तक समीक्षा : सवा लाख की बाँसुरी

पुस्तक समीक्षा : सवा लाख की बाँसुरी – सत्यम भारती ‘दर्द, विरह, आँसू, घूटन अगर न होते मित्र, तो फिर कवि होता नहीं दीनानाथ सुमित्र ।’ स्वभाव से अक्खङ, बातों से फक्कङ, चेहरे पर तेज, हाथों में क्रांतिकारी कलम, चेहरे पर समाजिक चश्मा, सर पर भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की टोपी, बांहों में आशा का झोला,पैरों में परिवार का चप्पल- ऐसे है कवि दीनानाथ सुमित्र । मैनें कबीर को तो नहीं देखा लेकिन सुमित्र को देखा हूं, ये ऐसे अवधूत है जो अकेले समाज बदलने का मद्दा रखते है ।…

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विशिष्ट कवयित्री : मंजुला उपाध्याय ‘मंजुल’

मिट्टी में जडे़ं कसीदे कारी वाले गमलों में आश्रय देकर इतरा रही है अपनी सम्पन्नता पर तुम्हारी सोच । मेरी हरी भरी डालियां खिला खिला यौवन देखकर तन जाती है गर्दन तुम्हारी हक़दारी के अहम में । मगर तुम्हें पता ही नहीं सांवले बदन पर जंचती पिली साडी़ का मर्म । आओ ! छुकर देखो ! कैसे पक्की मिट्टी को फोड़कर समाई हुई हैं कच्ची मिट्टी में गर्भ में जड़ें मेरी …।। नि:शब्द स्नेह दर्पण सा पैगाम तुम्हारा बांचू तेरा आखर -आखर सिर टिकाए दरवाजे पर बैठूं तुझको हाथ में…

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विशिष्ट कहानीकार : मधु सक्सेना

वो चालीस मिनिट – मधु सक्सेना तेजी से चला जा रहा था थ्री व्हीलर । उतनी ही तेजी से मीठी के विचार ।आज साथ मिला कितने दिनों के इंतज़ार के बाद । कनखियों से मितान को देख रही थी ।उसके कठोर हाथों को देखकर सोच रही थी इतनी कोमल कविताएं कैसे लिख लेता है वो । कुछ तो बोले मितान …जाने क्या सोच रहा ..खुद में डूबा हुआ ।मीठी इंतज़ार ही करती रही ।आखिर झटके से थ्री व्हीलर रुका तो मितान तेजी उतर गया अपना सामान लेकर । मीठी भी…

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आलेख : संजीव जैन

पारिवारिक विघटन और हिंदी महिला उपन्यासकार पितृसत्तात्मक परिवार की जिस संरचना और स्वरूप को हमने अब तक समझा है उसके संदर्भ में महिला उपन्यासकारों के उपन्यासों में पारिवारिक विघटन की स्थितियों और कारणों को समझने और परखने का प्रयास करेगें। महिला उपन्यासकारों के संदर्भ में जब हम भूमंडलीय प्रवृत्तियों का अध्ययन करते हैं तो सबसे पहले हमारे सामने आती है पारिवारिक विघटन की प्रवृत्ति। पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली जिस सिद्धांत पर कार्य करती है उसमें ‘उपभोग’ उपभोग के लिए होता है आवश्यकताओं के लिए नहीं। उपभोग को उत्पादन से जोड़ दिया…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : ध्रुव गुप्त

1 हद से भी बढ़ जाएंगे तो क्या करोगे चांद पर अड़ जाएंगे तो क्या करोगे इस क़दर आवारगी में दिल लगा है हम कभी घर जाएंगे तो क्या करोगे लाख टूटी ख्वाहिशों से दिल भरा है ख़ुद से ही लड़ जाएंगे तो क्या करोगे यूं नहीं समझाओ रिश्तों की सियासत शर्म से गड़ जाएंगे तो क्या करोगे इनसे जी बहलाने की आदत पड़ी है ज़ख्म सब भर जाएंगे तो क्या करोगे बेसबब यह ज़िन्दगी गुजरी ख़ुदाया हम अगर मर जाएंगे तो क्या करोगे 2 गरचे सौ चोट हमने खाई…

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विशिष्ट गीतकार : ज्ञान प्रकाश आकुल

(1) जितने लोग पढ़ेंगे पढ़कर, जितनी बार नयन रोयेंगे समझो उतनी बार, गीत को लिखने वाला रोया होगा। सदियों की अनुभूत उदासी यूँ ही नहीं कथ्य में आयी आँसू आँसू हुआ इकट्ठा मन में एक नदी लहरायी इस नदिया में घुलकर जितने लोग प्यास अपनी खोयेंगे, सब के हिस्से का वह मरुथल गीतकार ने ढोया होगा। मंत्रों जैसे गीत मिलेंगे मंत्रमुग्ध से सुनने वाले सुनकर लोगों ने सहलाए अपने अपने दिल के छाले जितनी रातें जाग जागकर लोग नए सपने बोयेंगे, उतनी रातें गीत अकेला झूठ मूठ ही सोया होगा।…

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