लघुकथा

नीलिमा शर्मा की लघुकथाएं अपना  सुख “पापा  आपके घर क्या बर्तन नही थे  जो माँ शादी में बर्तन फर्नीचर  लेकर आई थी ‘ बेटे ने हाथ से अखबार लेते हुए  गुप्ता जी से सवाल किया “बेटे सब कुछ था घर में  , लेकिन उन दिनों बेटी को विवाह में  सब कुछ देने का रिवाज़ था तो !! आप मना नही कर सकते थे क्या ? ” “ बेटा हमारे ज़माने में सब कुछ माँ बाबा निर्धारित करते थे , हम तो झलक भर लड़की की देखते थे  और हाँ मम्मी आप देख लो कहकर अपनी मोहर लगा देते…

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विशिष्ट कवयित्री : अपर्णा अनेकवर्णा

आलता लाल एक जोड़ी घिसे पाँव निकल पड़े हैं आदिम दिशा को कर आई विदा जिन्हें बस कल ही वो पलटे नहीं न ठिठके न ही बदली दिशा अपनी पुकारता रहा आकाश बरसता रहा जल खूब धधकी अग्नि चंदन पहने डोलती रही पवन धरती ने फिर किया वहन एक और वियोग का भार अपने आदिम धैर्य से संकोच ने रुंधन को जड़ दिया था ग्रंथियों में ही दुबकी रही वह महानगर की थमी विथिकाओं से उभरी संवेदना जुटी और फिर वहीं लौट गईं असहाय सी एक दूसरे से आँखें चुराए…

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आलेख

अंधेरे का इन्द्रधनुष : मुक्तिबोध की कविता – संजीव जैन मुक्तिबोध को पढ़ना जैसे अंधेरे में लालटेन के सहारे अकेले बियावान जंगल से गुजरने की प्रक्रिया में पहाड़ों और बावडियों के बीच होकर गुजरने का अनुभव अर्जित करना है। हिन्दी कविता के पाठक और कविता की आलोचना रंगों को देखने की अभ्यस्त है। रंग भी ऐसे जो सहज और सरल एक रेखीय समझ विकसित करते हैं। ‘अनेकता में एकता’ की दृष्टि ने ‘अनेकता’ के सौन्दर्य को अनदेखा ही रहने दिया। ठीक ऐसे ही अंधकार से प्रकाश की ओर यात्रा करने…

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पुस्तक समीक्षा

प्रजापति की ग़ज़लें अत्यंत सहजता से वर्तमान के यथार्थ तक ले जाती हैं – अनिरुद्ध सिन्हा डॉ कृष्ण कुमार प्रजापति की ग़ज़लें साधारण बोलचाल की आवाज़ के उतार-चढ़ाव में हैं जिनमें काव्यात्मक वस्तु का श्रवण गुण भी शामिल होता है —शब्दों के साथ शब्दों को जोड़ने की छंदोबद्ध क्रिया।  समस्वरों,अनुप्रासों आदि की बहुलता अतितृप्ति की अनुभूति देती है। कलात्मक प्रौढ़ता और ताजगी के अतिरिक्त उनमें एक खास तरह का अनुशासन भी है जो ग़ज़ल की बुनियादी शर्तों से निकला हुआ लगता है। डॉ प्रजापति की ग़ज़लों की मासूमियत बड़े साफ…

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पुस्तक समीक्षा

पुस्तक समीक्षा हर इक ख़ूबी-ओ-ख़ामी पर नज़र जाए तो अच्छा हो: दहलीज़ का दिया – के. पी. अनमोल ‘दहलीज़ का दिया’ भाई वाहिद काशीवासी का पहला ग़ज़ल संग्रह है। बनारस के रहने वाले वाहिद काशीवासी का मूल नाम संदीप द्विवेदी है। हिन्दी, अंग्रेज़ी और उर्दू ज़बानों पर बराबर पकड़ रखने वाले संदीप पेशे से स्वतन्त्र अनुवादक हैं।’दहलीज़ का दिया’ जैसा कि मैंने बताया, इनका पहला ग़ज़ल संग्रह है जिसमें इनकी कुल 51 ग़ज़लें संग्रहित हैं। संग्रह की दो ख़ूबियां हैं जो इसे अन्य पुस्तकों से थोड़ा अलग करती हैं-1. प्रस्तुत…

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खास कलम : गुंजन गुप्ता

खास कलम : गुंजन गुप्ता हाइकु धनतेरस धन बरसाये व लाये खुशियाँ ॥ धन्वंतरि दें आशीष  मिटे रोग रहें आरोग्य ॥ दीपावली में लक्ष्मी गणेश संग विराजें घर ॥ धन दे लक्ष्मी गणेश जी मंगल करे सबका ॥ ये अमावस दूर करे कालिमा निज मन का  ॥ दीप जलाओ मिट जाए अँधेरा निर्धन का भी ॥ सड़कों पर रोते बच्चों को भी दो दिल से भेंट ॥ मत जलाओ पटाखे  बचा लो ये पर्यावरण ॥ गोवर्धन की पूजा से होगी रक्षा परिवार की ॥ यम-यमी सा भाई- बहन का हो…

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विशिष्ट गीतकार : डॉ रवींद्र उपाध्याय

विशिष्ट गीतकार : डॉ रवींद्र उपाध्याय धूप लिखेंगे, छाह लिखेंगे धूप लिखेंगे, छाह लिखेंगे मंजिल वाली राह लिखेंगे खुशियों के कोलाहल में जो दबी-दबी है आह, लिखेंगे बादल काले – उजला पानी निशा-गर्भ में उषा सुहानी रंग-गंध की कथा चल रही श्राेता विवश शूल अभिमानी सतत सत्य संधानी हैं हम कैसे हम अफवाह लिखेंगे जलता एक दीप काफी है चाहे जितना तम हो गहरा कब रुकते हैं अभियानी पग विघ्न भले हो दुहरा-तिहरा होंगे और लहर गिनते जो हम दरिया की थाह लिखेंगे बे-मकसद जीना क्या जीना बिना पाल जिस तरह…

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विशिष्ट कवि : शहंशाह आलम

विशिष्ट कवि : शहंशाह आलम घाटी के नीचे घाटी घाटी के नीचे की घाटी के बारे में सबको पता नहीं है सदियों से दुर्बल के भीतर रहता है एक और दुर्बल छिपा हुआ साधारण के भीतर एक और साधारण झील के भीतर रहती है एक और झील चीख़ के भीतर एक और चीख़ बतियाने के भीतर एक और बतियाना अचरज के भीतर एक और अचरज सत्य के भीतर एक और सत्य झूठ के भीतर एक और झूठ घर के भीतर होता है एक और घर धारणाओं के भीतर कई-कई धारणाएँ…

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विशिष्ट गजलकार

विशिष्ट गजलकार : शिवकुमार बिलगरामी (1 ) एक महफ़िल सजाये बैठा हूँ तुझ से दिल को लगाए बैठा हूँ तुझ से मिलने की बेक़रारी है बेक़रारी  दबाये   बैठा   हूँ तेरे दीदार की तमन्ना में चन्द साँसें बचाये बैठा हूँ मुझ में मेरा न कुछ रहा बाक़ी अपनी हस्ती मिटाये बैठा हूँ आ भी जाओ अगर मगर छोड़ो कब से पलकें बिछाये बैठा हूँ तेरे ख़ातिर मैं साडी दुनिया को अपना दुश्मन बनाये बैठा हूँ (2 ) मेरा बेचैन बदन मेरा परेशान बदन रोज़ होता है दिले हाल पे हैरान बदन…

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विशिष्ट कहानीकार

किवाड़ों का पसीजापन उसका रुकना जैसे एक गजब हो गया था। न जाने वह क्यों रुक गयी थी? क्या भुला दिए गए लोगों को ऐसे रुकने का अधिकार होता है? पर वह रुक गयी थी? ये घर किसका था? वह उसी मकान के सामने अनाथों की तरह खड़ी थी जिसमें उसका बचपन बीता था। जिसमें उसने अपने सपने देखे थे। जिससे उसकी डोली उठी थी और जिसमें उसने तमाम शिकवे गिले किए थे। आज उनके कदम उस मकान में घुसने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं। कभी यह भरा…

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