विशिष्ट गीतकार :: धीरज श्रीवास्तव

(1) क्या रक्खा अब यार गाँव में! नहीं रहा जब प्यार गाँव में! बड़कन के दरवाजे पर है खूँटा गड़ा बुझावन का!  फोड़ दिया सर कल्लू ने कल  अब्दुल और खिलावन का!  गली-गली में बैर भाव बस  मतलब का व्यवहार गाँव में!  क्या रक्खा अब यार गाँव में!  नहीं रहा जब प्यार गाँव में! बेटी की लुट गई आबरू बूढ़ा श्याम अभी जिन्दा!  देख बेबसी बेचारे की  मजा ले रहा गोविन्दा!  सच का है मुँह धुआँ-धुआँ बस  झूठों का अधिकार गाँव में!  क्या रक्खा अब यार गाँव में!  नहीं रहा…

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विशिष्ट कहानीकार :: संजीव जैन

वो लड़की  संजीव जैन यह वैसी लड़की नहीं है, जैसी आमतौर पर जीवन की सतह पर अतराती दिखाई जाती हैं। वो लड़की एक साधारण किस्म की बहुत साधारण लड़की है। छोटा कद। बड़ा माथा। गुलाबी गाल। लंबे बाल। पहाड़ीपन से भरी हुई। चुलबुली पर शांत। सुलगती हुई पर तरल। तो ऐसी ‘वो लड़की’ अचानक एक होटल के रिसेप्शन पर मिल जाती है तो…. अनैतिकता का लिहाफ…… ताज होटल शिमला के रिसेप्शन पर खड़ी हुई वो लड़की निरंतर पहलू बदल रही है। उसके हाथ कम्प्यूटर स्क्रीन पर हैं, ओंठ कुछ बुदबुदाते…

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नारी चेतना के दोहे : हरेराम समीप

नारी चेतना के दोहे : हरेराम समीप हर औरत की ज़िंदगी, एक बड़ा कोलाज इसमें सब मिल जाएँगे, मैं, तुम, देश, समाज नारी तेरे त्याग को, कब जानेगा विश्व थोड़ा पाने के लिए, तू खो दे सर्वस्व न्यौछावर करती रही, जिस पर तन-मन प्राण वो समझा तुझको सदा, घर का इक सामान औरत कब से क़ैद तू, तकलीफ़ों के बीच भरे लबालब दुक्ख को, बाहर ज़रा उलीच करती दुख, अपमान से, जीवन का आग़ाज़ औरत के सपने यहाँ, टूटें बे-आवाज़ जुल्म सहें फिर भी रहें, हम जालिम के संग यही…

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विशिष्ट कवयित्री :: डॉ राजवंती मान

सामर्थ्य मुझ पर विश्वास रखो मेरी दोस्त ! मैं तुम्हारे शिथिल / मरणासन्न अंगों को उद्दीप्त करुँगी करती रहूंगी भरती रहूंगी / तुम्हारी पिचकी धमनियों में अजर उमंगें लहू में विबुध सरसराहटें ! सूरज का असीम प्रकाश ढांपता रहेगा चिर ऊष्मा से प्रदान करता रहेगा दैव उर्जा बरबाद दिनों में ! मेरी दोस्त ! नहीं हो तुम वाणी रहित कुछ वक्त रह सकती हो मौन साँझ की लसलसी बेला में कथित प्रेरकों के विरुद्ध फीके उजालों की परतों में l गहरी हैं तुम्हारी जड़ें छिपी रहती हैं सारी शक्तियां वहीं…

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हेमलता – एक मखमली आवाज़ :: सलिल सरोज

हेमलता – एक मखमली आवाज़ “अँखियों के झरोखों से, मैने देखा जो साँवरे तुम दूर नज़र आए, बड़ी दूर नज़र आए बंद करके झरोखों को, ज़रा बैठी जो सोचने मन में तुम्हीं मुस्काए, बस तुम्हीं मुस्काए” 16 मार्च 1978 को प्रदर्शित हुई फिल्म “अँखियों के झरोखों से” के इस टाइटल ट्रैक को आप चाहे जितनी बार भी सुन लीजिए ,आप फिर से इसे दोबारा सुनने से अपने आप को रोक नहीं पाएँगे।  रविन्द्र जैन का बेहतरीन गीत और संगीत आपको किसी और ही दुनिया में लेके जाता है ; लेकिन…

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कवि स्वप्निल श्रीवास्तव से युवा कवि राजीव कुमार झा की बातचीत

कवि स्वप्निल श्रीवास्तव से युवा कवि राजीव कुमार झा की बातचीत राजीव –आप लम्बे समय से लेखन कर रहे हैं । आपने कविता लेखन कब शुरू किया था और साहित्यिक पत्र – पत्रिकाओं में प्रतिष्टित कवि के रूप में कब स्थापित हुये थे। उस समय आपकी पीढ़ी में और कौन से लोग कवितायें लिख रहे थे । ….. कविता का रोग तो बचपन से लगा था । बचपन में मां के साथ तुकबंदी करता रहता । कविता साथ रह गयी और मां असमय हमें छोड़ कर चली गयी । यह मेरे…

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पुस्तक समीक्षा :: ईश्वर का अनुवाद करते हुए

विलक्षण,  बिंब, प्रतीक और भाषा का संगम ‘ईश्वर का अनुवाद करते हुए’  ‘ईश्वर का अनुवाद करते हुए’ वरिष्ठ कवि डॉक्टर स्वदेश कुमार  भटनागर का सद्य प्रकाशित गद्य कविता- संग्रह है, जो प्रकाश बुक डिपो ,बरेली से छप कर आया है ।संग्रह में कुल 8 सर्ग हैं जिनमें अलग-अलग भाव और पृष्ठभूमि पर कविताएं लिखी गई हैं ।संग्रह के आवरण  पर ही छंद मुक्त कविता की जगह गद्य कविता की स्वीकारोक्ति  कवि की स्पष्टवादिता की निशानी है।  कविता मनुष्यता की मातृभाषा होती है। कवि कविता को रचते हुए अपने जीवनानुभवों को…

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ट्वईंटी-ट्वईंटी के प्लाट पर प्रेम :: चित्तरंजन कुमार

ट्वईंटी-ट्वईंटी के प्लाट पर प्रेम – चित्तरंजन कुमार किस-किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम तू मुझसे खफा है तो जमाने के लिए आ -अहमद फराज बातें हुई तो प्रेम, नजरें मिली तो प्रेम, रूठ गए तो प्रेम, मनाने पर मान गए तो प्रेम । वाकई, प्रेम भी अजीब है । हो जाए तब भी मुश्किल, न हो तो भी मुश्किल । हद है मन में उफखी-बिखी है, फिर भी प्रेम है । प्रेमिका मिल जाए तो कुछ बोलते डर लगे, न मिलें तो कल्पनाओं का दौर……….। प्रेम न हुआ…

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विशिष्ट ग़ज़लकार :: सुधीर कुमार प्रोग्रामर

सुधीर कुमार प्रोग्रामर की पांच ग़ज़लें 1 लगाकर आग बस्ती से निकल जाने की आदत है जिन्हें हर बात में झूठी कसम खाने की आदत है चुराकर गैर के आंसू बना लेते हैं जो काजल उन्हें खुशियों की इक दुनिया बसा जाने की आदत है सजीले बागबानी में टहलने आ गए साहब जिन्हें फूलों की रंगत पे बहक जाने की आदत है इजाजत है नहीं कहना आवारापन को आवारा बड़े हाकिम का बेटा है जुल्म ढाने की आदत है जो मेहनत से हथेली पर हुनर बोये हुनर बांटे उन्हें पाताल…

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खास कलम :: डॉ पंकज कर्ण की ग़ज़लें

1 बहुत बारीकियों से तोलता है खरा सिक्का कभी जब बोलता है नसीहत है के उससे बच के रहिए जो कानों में ज़हर को घोलता है किसी के वश में ये रहता नहीं है सिंहासन है ये अक्सर डोलता है मैं फिर मशहूर होता जा रहा हूँ वो मेरे पीठ पीछे बोलता है जरूरतमंद की खातिर ए ‘पंकज’ कहाँ कोई दरों को खोलता है 2 रोज़ एक ज़ख़्म नया आ के लगा देता है मेरा क़ातिल मुझे जीने की दुआ देता है क्यों न उठ जाए अदालत से भरोसा अपना…

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