खास कलम : लकी निमेष

1 अगर जो गाँव को छोडूँ तो बस्ती रूठ जाती है अगर मैं शहर ना जाऊँ तरक्की रूठ जाती है मुहब्बत में शिकायत का अलग अपना मज़ा देखा मुझे जब देर होती है तो खिड़की रूठ जाती है कि बूढे बाप की मज़बूरियों से क्या उसे मतलब ज़रा सा कम मिले सामान लड़की रूठ जाती है नही आसान लोगो दुश्मनी ऐसे नही निभती अगर खामोश बैठूगां तो बर्छी रूठ जाती है किसे अच्छा लगेगा यूँ ग़मो में मुब्तिला होना खुशी का क्या करू साहिब ये जल्दी रूठ जाती है परेशां…

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सफ़रनामा : आंच का एक वर्ष

धीमी-धीमी आंच में पका साहित्य देश में बहुत कम पत्रिकाएं होती हैं जो अपने नाम को सार्थक करती हैं. सौभाग्य से यह श्रेय जिस पत्रिका को हासिल है, वह है ई-पत्रिका आंच. ‘आंच’ ने जिस तरह धीमी-धीमी आंच में साहित्य को पकाया, करीने से सजाया और शालीनता से परोसा, उसने प्रबुद्ध पाठकों के मुंह का स्वाद बढ़ा दिया. उस पर, आत्मीयता का आम-रस घोल कर डॉ भावना (संपादक )ने इसके स्वाद को शिखर पर पहुंचा दिया. अभी साल भर ही तो हुआ है इसको जन्म लिये हुए. लेकिन इसकी किलकारियां…

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ग़ज़ल की भाषा, ख़याल और कहन के सन्दर्भ में : के. पी. अनमोल

ग़ज़ल की भाषा, ख़याल और कहन के सन्दर्भ में ग़ज़ल एक ऐसी विधा है, जो सदियों से कही/लिखी जा रही है। अरबी, फारसी, उर्दू से होते हुए हिन्दी और विश्व की अन्य भाषाओं तक सफ़र करते हुए इसके दीवानों की तादाद लगातार बढ़ी है। आज हम ग़ज़ल की लोकप्रियता को प्रतिमान स्थापित करते हुए देख रहे हैं। हमारे हिन्दुस्तान में सैंकड़ों सालों तक उर्दू में अभिव्यक्ति पाती ग़ज़ल कालान्तर में जब खड़ी बोली की ओर मुड़ी तो इसे एक ऐसा ग़ज़ल-गो मिला, जिसने इस विधा को हर आमो-ख़ास के दिलो-दिमाग़…

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पत्रिका के एक वर्ष पूरे होने पर बधाई के शब्द

धीमी-धीमी आंच में पका साहित्य देश में बहुत कम पत्रिकाएं होती हैं जो अपने नाम को सार्थक करती हैं. सौभाग्य से यह श्रेय जिस पत्रिका को हासिल है, वह है ई-पत्रिका आंच. ‘आंच’ ने जिस तरह धीमी-धीमी आंच में साहित्य को पकाया, करीने से सजाया और शालीनता से परोसा, उसने प्रबुद्ध पाठकों के मुंह का स्वाद बढ़ा दिया. उस पर, आत्मीयता का आम-रस घोल कर डॉ भावना (संपादक )ने इसके स्वाद को शिखर पर पहुंचा दिया. अभी साल भर ही तो हुआ है इसको जन्म लिये हुए. लेकिन इसकी किलकारियां…

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विशिष्ट कवि : अनिल पांडेय

हमारे समय का सांड़ चारा की तलाश में गायब हुआ सांड लौट आया है सब अचरज में हैं उसे देखकर मौन है, शांत चित्त होकर देख रहा है बच्चे चिंता में हैं पहले की तरह खदेड़ नहीं रहा है पूँछ हिला रहा है लगातार औरतें दूर से ही भागना चाहती हैं बुढ़ापे समझाए जा रहे हैं सांड से बचने की तरतीबें लोगों को खेत-कियारी सुरक्षित रखने की चिंता परिवेश में अधिक बढ़ गयी है इन दिनों सांड भी कुछ कहना चाहता है यह कि वह मारता नहीं यह कि वह…

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पुस्तक समीक्षा : अनिरुद्ध सिन्हा

मानवीय संवेदना के रस से युक्त”अभी तुम इश्क़ में हो” छंदमुक्त कविता के जिस दौर में लोग मांग के अनुसार कविता लिख रहे हों, उस दौर में अगर कोई अपने गीतों और ग़ज़लों के माध्यम से साहित्य में अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज़ करवा रहा हो तो थोड़ा चौंकना पड़ता है। ऐसे तो भारतीय कविता का छंद ही उसका सबसे बड़ा यथार्थ है। भारत की सांस्कृतिक विरासत ही शब्दमय है।लेकिन आधुनिक दौर में कविता लेखन के लिए सुविधाजनक स्पेस तैयार कर लिया गया है । कविता लेखन का सारा खेल आत्म…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : डी.एम.मिश्र

1 बनावट की हँसी अधरों पे ज़्यादा कब ठहरती है छुपाओ लाख सच्चाई निगाहों से झलकती है कभी जब हँस के लूटा था तो बिल्कुल बेख़बर था मैं मगर वो मुस्कराता भी है तो अब आग लगती है बहुत अच्छा हुआ जो सब्ज़बाग़ों से मै बच आया ग़नीमत है मेरे छप्पर पे लौकी अब भी फलती है मेरे घर से कभी मेहमाँ मेरा भूखा नहीं जाता मेरे घर में ग़रीबी रहके मुझ पे नाज़ करती है कहाँ से ख़्वाब हम देखें हवेली और कोठी के हमारी झोपड़ी में आये दिन…

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विशिष्ट कहानीकार : पंखुरी सिन्हा

हिस्टीरिया और हेल्थ पेपर्स ‘दुनिया डोल रही है, आकाश डोल रहा है, पृथ्वी अपनी धुरी से कुछ दूर छिटक गयी है शायद, एक तेज़ आंधी चल रही है समूचे ब्रह्माण्ड में, पेड़ पौधे उखड़ गए हैं, सारे ग्रह नक्षत्रों के, उल्का पात हो रहा है, उसी पर हो रहा है, माँ’…. पता नहीं, यह माँ शब्द वह पूरा उच्चरित कर पायी या नहीं, उस निःशब्द लम्बे वाक्य में जो दिमाग में किसी बुलेट ट्रेन सा चल गया था—जब दुबारा होश का धागा हाथ आया—शायद, इसी शब्द पर अँटकी थी, सारे…

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विशिष्ट गीतकार : राहुल शिवाय

तुम मिले तुम मिले तो मिट गई है पीर इस तन की चढ़ गई है होठ पर अब बांसुरी मन की हम खड़े थे कबसे इस क्षण की प्रतीक्षा में है मिला कब प्रेम मन को सहज दीक्षा में तुम मिले कुसमित हुई है आस जीवन की मंदिरों, दरगाह, पीपल के बँधे धागे तुम वही जिसके लिए हम रात भर जागे तुम मिले तो जग गई झंकार आंगन की कल्पना में था तुम्हारा कल तलक मुखड़ा भोज्यगृह, बिस्तर, बगीचा सभी का दुखड़ा आज उन सँग खुशी बाँटे ताल धड़कन की…

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