विशिष्ट गीतकार : अवनीश त्रिपाठी

【एक】 अँजुरी भर अँगड़ाई सिरज रहा है धूप सलोनी सिरहाने पर सूरज भोर झरोखे पर ले आई अँजुरी भर अँगड़ाई। दूर क्षितिज पर टहल रहे हैं बादल के मृगछौने श्याम-सलोने पर्वत जैसे कुछ हैं बौने-बौने मौसम के हरकारे बनकर आये वंशी-मादल धुनें,राग,लय,ताल समेटे मदमाती पुरवाई। झाँक रहीं किरणें कनखी से इच्छाएँ मधुवन की काजल ओढ़े नयन पढ़ रहे परिभाषाएं मन की नई गुदगुदी उठकर कब से पोर-पोर तक पहुँची खिली मञ्जरी फुनगी चहकी कली-कली इँगुराई।। नेहनदी ने गीत सुनाये कल-कल सम्बन्धों के पृष्ठ खुले पुलिनों पर आकर हस्तलिखित ग्रन्थों के…

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विशिष्ट गीतकार : साेनरूपा

सूना सूना सा दरपन नहीं चाहिए! तुम न हो ऐसा जीवन नहीं चाहिए! फूल कब खिल सका है धरा के बिना ख़ुशबुएं कब उड़ी हैं हवा के बिना बिन नयन रूप क्या सज सका है कभी कब जुड़ी हैं हथेली दुआ के बिना बिन ह्रदय कोई धड़कन नहीं चाहिए! सुर्ख़ियाँ जाने कब स्याहियाँ बन गईं बोलियाँ जाने कब चुप्पियाँ बन गईं मेरी मजबूरियों का था मुझ पर असर कब ये आँखें मेरी बदलियाँ बन गईं अब कोई ऐसी तड़पन नहीं चाहिए! प्रेम में दर्द है क्यों ये कहते रहें पीर…

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विशिष्ट कवयित्री : डॉ उषा रानी राव

जैसे थामती है हवा सफेद बादलों की कतार में.. नीले सागर के गर्भ में .. पतझड़ के पत्तों के मर्मर में .. चेतन के अचेतन में .. थामते हैं तुम्हारे हाथ मुझे जैसे थामती है हवा फूलों को ! तुम्हारा आलोकमय स्पर्श जीवित रखते हैं मुझे अनंत तक! दिखते हो तुम आँखें बंद करने पर … दिखते हो तुम ..केवल तुम ! मेरी हर स्पंदन से जुड़ कर … ले ..चलते हो मुझे ..मुक्त सीमांत तक जहाँ प्रणय प्रकाशित है ! चलने का विभोर आनंद सारी विषमताओं की दीवार फाँदकर…

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विशिष्ट कवि : अशोक सिंह

क्या होता है प्रेम ? (अपनी उम्र से पाँच वर्ष बड़ी एक दोस्त से जब मै आठवें का छात्र था।) क्या होता है प्रेम ? मैंने उससे पूछा उसने किताब की तरह मेरे चेहरे को अपनी हथेलियों में थामा और गौर से देखते हुए मुस्कुराकर अपने कंधे पर टिका लिया कुछ दिन बाद मैंने फिर पूछा वह फिर मुस्करायी और मेरी कमीज के अधखुले बटन को सलीके से लगाकर नाक पकड़ कर हिला दी मैं उत्तर जानने के लिए बेचैन था सो कुछ महीने बाद एक दिन सर्द चाँदनी रात…

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हस्तीमल हस्ती की ग़ज़लें प्रगतिशील जीवन मूल्यों का दर्पण : अनिरुद्ध सिन्हा

हस्तीमल हस्ती की ग़ज़लें प्रगतिशील जीवन मूल्यों का दर्पण : अनिरुद्ध सिन्हा सामान्य धारणा है कि हस्तीमल हस्ती ग़ज़ल-विधा पर विचार करनेवाले ग़ज़लकार हैं। इनकी ग़ज़लें सृजन और समय की सूक्ष्म,जटिल अंतःक्रियाओं के साथ चलती हैं। ग़ज़ल के आंतरिक सौंदर्य और उसकी मासूमियत से समझौता नहीं करते तथा भावों के संप्रेषण के लिए छंद की छूट नहीं लेते।इनके पास ग़ज़ल के वास्तविक स्वरूप के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। ग़ज़ल में प्रयुक्त होनेवाले शब्दों के प्रति भी सावधान रहते हैं। शब्दों का वास्तविक सामर्थ्य ग़ज़लों में स्पष्ट रूप से उजागर होता…

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विशिष्ट कवयित्री : डॉ भावना

यह जरूरी नहीं जानना यह जरूरी नहीं जानना कि मोर की तड़प को महसूस उमड़ता है बादल या बादल को उमड़ते देख नाचता है मोर यह जरूरी नहीं जानना कि सूरजमुखी के प्रेम की खातिर फिर-फिर निकलता है सूरज या सूरज के प्रेम की खातिर खिलने को अकुला जाता है सूरजमुखी यह जरूरी नहीं जानना कि पूनम के चांद को देख समुन्दर की लहरें हो जाती हैं बेकाबू या लहरों के आवेग को देख चांद उसे अपलक निहारता है जरूरी है जानना कि कैसे पेट के भूगोल में उलझ हमने…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : अशोक मिजाज

1 मोहब्बत की वो शिद्दत आज भी महसूस होती है, पुरानी चोट है लेकिन नई महसूस होती है। मेरी आँखों में तू ,ख़्वाबों में तू,साँसों में तू ही तू, न जाने फिर भी क्यूँ तेरी कमी महसूस होती है। मुझे आराम मिलता है तेरी ज़ुल्फ़ों के साये में, कि सब छावों से ये छावों घनी महसूस होती है। अगर छूना भी चाहूं तो तुझे में छू नहीं सकता, कोई दीवार राहों में खड़ी महसूस होती है। मैं जब बिस्तर पे जाता हूँ कभी तन्हा नहीं रहता, कोई शय मुझको सीने…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : सृजन गोरखपुरी

1 ख़ुशी के एक क़तरे को तरसती ज़िन्दगी है चले आओ, तुम्हीं में दो जहानों की ख़ुशी है सभी चीज़ें बहुत महफ़ूज़, हासिल, तयशुदा हैं कमी है ज़िन्दगी में तो तुम्हारी ही कमी है समंदर बेख़बर है प्यास से, कोई बताए किसी ख़ुद्दार की कैसे तड़पती तिश्नगी है ज़माना हो गया है चाँद को देखे मगर तो ख़यालों में अभी तक रोशनी ही रोशनी है सुकूँ मिलता नहीं दिल को कहीं भी और जाकर तुम्हारी याद सी दिलकश न कोई दिलकशी है फ़लक से एक पल को ही उतर आया…

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विशिष्ट कवि: विनय

हँसी का सौंदर्य झरने की तरह कल-कल करती ध्वनि आसमान में चिड़ियों का कलरव फूलों पर मंडराते भौंरों का गुंजन या फिर अल्हड़ हवाओं की सनसनाहट सच कहूँ ऐसे ही हँसती हो तुम तुम्हारी हँसी में जैसे ढलता है प्रकृति का सौंदर्य साज पर सँवरता है कोई राग सुबह की पहली किरण पर उल्लासित क्ूकती है कोई कोयल चाँदनी की फुहारों में जैसे मचलती है नदी की जलधारा तुम्हारी हँसी जैसे सावन की पहली घटा जीवन का पहला वसंत सौंदर्य रस का पहला छंद किसी युवती का पहला शृंगार शिशु…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : आलोक श्रीवास्तव

हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को होशियारी क्या, गुज़ारी होशियारी से, जवानी फिर गुज़ारी क्या धुएँ की उम्र कितनी है, घुमड़ना और खो जाना, यही सच्चाई है प्यारे, हमारी क्या, तुम्हारी क्या उतर जाए है छाती में, जिगरवा काट डाले है, मुई तनहाई ऐसी है, छुरी, बरछी, कटारी क्या तुम्हारे अज़्म की ख़ुशबू, लहू के साथ बहती है, अना ये ख़ानदानी है, उतर जाए ख़ुमारी क्या हमन कबिरा की जूती हैं, उन्हीं के क़र्ज़दारी है, चुकाए से जो चुक जाए, वो क़र्ज़ा क्या उधारी क्या *कबीर को श्रद्धा सहित समर्पित,…

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