पुस्तक समीक्षा : डॉ.भावना

संवेदना को झकझोरती ग़ज़लें – शिखरों के सोपान                                                                                     – डॉ.भावना  ग़ज़ल की बात आती है तो बरबस ही प्रेम याद आता है, प्रेम में बीता पल याद आता है और याद आती है विरह- मिलन की बेला।  ग़ज़ल प्रेमी- प्रेमिका के बीच से कब आम जनता के दुख- दर्द तथा हास- परिहास के साथ- साथ  सामाजिक-आर्थिक  एवं राजनैतिक विसंगतियों का आईना बन हमारे सामने आ गई, पता ही नहीं चला। कुछ ग़ज़लकार दुष्यंत को इसका श्रेय देते हैं, तो कुछ का कहना है कि इसकी शुरुआत दुष्यंत के पूर्व…

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खास कलम : अंजना झा

मेरे घर का कचरा आज बहुत ज्यादा परेशान थी मैं क्योंकि नहीं उठेगा आज मेरे घर का कचरा वाकई हैरान थी मैं।। कल ही तो आए थे गोधूलि बेला में जीर्ण काया उदास आंखें क्षीण स्वर संग गली के हर द्वार पर अपने हाथ फैलाकर मांग रहे थे अपना मेहनताना ताकि पत्नी के निर्जला व्रत को खुलवा सको मीठे पकवानों से जो किया था उसने तुम्हारी चिरायु के लिए। फिर कैसे चिरनिद्रा में अमूक बन सो गए तुम। वाकई परेशान हूँ मैं क्योंकि नहीं उठेगा आज मेरे घर का कचरा।…

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ख़्वाहिश करना कोई गुनाह तो नहीं ! – रश्मि तरिका

ख़्वाहिश करना कोई गुनाह तो नहीं ! – रश्मि तरिका   इंसानों की इस दुनिया में, बस यही तो इक रोना है …. जज़्बात अपने हों तो ही जज़्बात हैं, दूजों के हों तो खिलौना हैं !! जी हाँ …खिलौना ! जज़्बातों की डुगडुगी बजाता खिलौना जो हमारा अपना ही जब बजाता है तो बस दिल छलनी छलनी हो जाता है। जब दिल छलनी हुआ है तो ज़ख्म भी हुए होंगे और ज़ख्म है तो छूरी भी चली होगी न । एक लंबे अरसे से ,काफ़ी ज़द्दोज़हद के बाद तक़रीबन…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : हस्तीमल हस्ती

(1) चिराग़ दिल का म़ुकाबिल हवा के रखते हैं हर एक हाल में तेवर बला के रखते हैं मिला दिया है पसीना भले ही मिट्टी में हम अपनी आँख का पानी बचा के रखते हैं हमें पसंद नहीं जंग में भी मक्कारी जिसे निशाने पे रक्खें बता के रखते हैं कहीं ख़ुलूस कहीं दोस्ती, कहीं पे व़फा बड़े करीने से घर को सजा के रखते हैं अनापसंद हैं `हस्ती’ जी सच सही लेकिन नज़र को अपनी हमेशा झुका के रखते हैं (2) कांच के टुकड़ों को महताब बताने वाले हमको…

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खास कलम : डाॅ. महेन्द्र नारायण

अनकही तुम्हारे प्यार पर कई कविताएँ या तो कम हो जाती हैं या छोटी पड़ जाती हैं जिसे अधरों की अभिव्यक्ति प्रगट कर न सकी आज तक अमर, अटूट , असीम , अपार शायद इसीलिए बना हुआ है तुम्हारा प्यार मूक भावना का वाचाल है उदाहरण है अतुलनीय अपरिमेय जैसे शब्द किसी भी विचारों से फिट नही बैठते जब मूक दीवानेपन की दृष्टि बार-बार करती हैं तुम्हारा आभास मेरे मुखमण्डल पर तुम भले भले न समझो मैं प्रत्येक दृष्टि का हिसाब रखता हूँ जिसे खर्च न करके इस प्रेम सम्पत्ति…

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विशिष्ट गीतकार : रंजन कुमार झा

(1) पथिक बनो दीये खुद पथ के वर्ना हरसू अंधकार है वज्र इरादों के शोलों सँग दीवाली हर निशा मनाओ पथ दुर्गम में पड़ी शिलाएँ तोड़ो-फेको, दूर हटाओ मांग वक्त की भांप चला जो विजय रश्मियों पर सवार है चट्टानी -फौलादी ताकत दृढ़ संकल्पित निमिष न हिलना सीख लिया जिसने जीवन के कंटक में पुष्पों-सा खिलना मंजिल केवल उसके पग का ही करती नित इंतजार है नभ के तारे सभी तुम्हारे होंगे आज न कल, है निश्चित निज पाँवों पर खड़े शूल की आघातों से मत हो विचलित भरत भूमि…

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आलेख : अनिरुद्ध सिन्हा

हिन्दी ग़ज़ल – संवाद और संदर्भ – अनिरुद्ध सिन्हा इससे सहमत हुआ जा सकता है कि दुष्यंत कुमार से पहले हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में जो बहुत सारी वैचारिक तथा कलात्मक प्रवृतियाँ पनपी थीं ,वे सभी समाजवादी यथार्थवाद की परिधि में पूरी तरह आती हैं या नहीं आती हैं, आज भी विवाद का विषय है । कुछ आलोचकों ने इसी विवाद के सहारे हिन्दी ग़ज़ल को विभ्रमों, अतार्किक असंगतियों,अंतर्विरोधों की परिधि में लाकर खड़ा कर दिया है। उनका कहना है कि हिन्दी ग़ज़ल में आधुनिक संस्कृति के विकास की यथार्थवादी…

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विशिष्ट कवि : शांडिल्य सौरभ

पुनर्रचना डूबना भी तैयारी है नए सफर के में निकलने के पूर्व पश्चिम में डूबना पूरब में उगने की तैयारी है पश्चिम और पूरब तर्क हैं महज़ तथ्य यह है कि जीवन ही सत्य है , दो स्थितियों के बीच जो घट रहा है वही प्रेम है, वही जीवन है डूबना , प्रेम और जीवन की पुनर्रचना है पुनर्रचना उन्हीं उपादानों के साथ । क्या चाँद कभी दूसरा ला पाऊंगा ! भागा हुआ लड़का ट्रेन से कूद कर भागना पागलपन है यदि ऐसा तो मैं हूँ पागल ज़मीन से जुड़ना…

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विशिष्ट कहानीकार : संजीव जैन

लालबत्ती एक दूसरी कहानी यह भी मेरी जिंदगी अंत से आरंभ हो रही है। मैं हमेशा आरंभ के लिए करता रहा कोशिश पर अंत हमेशा पहले आता रहा और अब मैंने पहली बार अंत से आरंभ करना आरंभ किया है। …….. अंततः इस आरंभ ने जीवन के उस आरंभ को सामने लाकर खड़ा कर दिया जो छब्बीस साल पहले घट चुका है मेरे साथ। मैं इस हिसाब से किसी भी उम्र का हो सकता हूं चालीस, तेतालीस या तिरेपन या …….. कुछ भी ………उम्र मेरी चारसौ बीस साल की भी…

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