विशिष्ट कवयित्री : सुषमा सिन्हा

सफेद झूठ तस्वीर के इस तरफ खड़ी मैं बताती रही उसे कि यह बिल्कुल साफ और सफेद है तस्वीर के उस तरफ खड़ा वह मानने से करता रहा इंकार कहता रहा कि यह तो है खूबसूरत रंगों से सराबोर मूक तस्वीर अपने हालात से जड़ खामोशी से तकती रही हमें उसे मेरी नजरों से कभी न देख पाया वह ना मैं उसकी आँखों पर कर पाई भरोसा कभी खड़े रहे हम अपनी अपनी जगह अपने अपने सच के साथ मजबूती से यह जानते हुए भी कि झक-साफ़-सफेद झूठ जैसा नहीं…

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खास कलम : पूनम गुजरानी

बातों में बात बातों में उनकी बात करे रातों में उनके  साथ जरे माटी के नन्हे दीपक से उजियारे की सौगात वरे गूंथे कविता की चोटी में    आशा की सोनल किरणों को        तपते सहरा में रख आएं          शीतल जल वाले झरनों को मुरझाए फूलों को चुनकर उनमें भी हम मुस्कान धरें माटी के नन्हे दीपक से  उजियारे   की  सौगात वरे खुशियों की खुशबू से महके   धरा से अम्बर तक परिवेश     संस्कारों की दीपमालिका        जगमगा देती…

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विशिष्ट गीतकार : कृष्णा बक्षी

1 कभी   क़ुहरा कभी  बादल खुले  मौसम  अगर  तो धूप   आये   आंगने  में ।भँवर  से  कश्तियाँ   बाहर कोई      कैसे       निकाले लहर    बैठी     हुई      है मोर्चे        अपने      संभाले। जहाँ    हों     पुल        बने, बहुत   कमज़ोर   नदियों के भलाई     है     सम्भल   के- लाँघने  में।। चली      अश्लीलता     में डूबती- तिरती          हवाएँ छपे        नववर्ष          के कैलेंडरों   पर   नग्न   मुद्राएँ । हों     जिस     घर         में बहन,  भाई,    बहू,       बेटी शरम     आती    है    इन को- टाँगने  में।। अचंभा    इससे    ज़्यादा  और हो   सकता  है   क्या      भारी कला,  संगीत,   कविता    का है   शोषण   आज  भी    जारी। जो   देता   …

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हिंदी साहित्य के विलक्षण कवि : कवि रघुवीर सहाय

9 दिसंबर जन्म दिवस पर विशेष – राजेश कुमार शर्मा पुरोहित दूसरा सप्तक के कवियों में प्रमुख नाम रघुवीर सहाय का आता है। हिंदी के विलक्षण कवि,लेखक,पत्रकार,संपादक,अनुवादक,कथाकार,आलोचक।रघुवीर सहाय का जन्म 9 दिसंबर1929 को लखनऊ उत्तर प्रदेश में हुआ था। इन्होंने 1951 में अंगेजी साहित्य में स्नातकोत्तर किया। 1946 से साहित्य सृजन करना प्रारंभ किया। इनका विवाह 1955 में विमलेश्वरी सहाय से हुआ। इनकी प्रमुख कृतियाँ ‘सीढ़ियों पर धूप में’,’आत्म हत्या के विरुद्ध’,’हँसो हँसो जल्दी हँसो’,’लोग भूल गए हैं’,’कुछ पते कुछ चिट्ठियां’,’एक समय था’ जैसे कुल छह काव्य संग्रह लिखे। ‘रास्ता…

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आलेख : प्रसून लतांत

माटी के कलाकार हकु शाह जिनकी उपलब्धियों का फैलाव बहुत होता है। कोई भी उनके व्यक्तित्व और उनकी कृतियों को विस्तार में बह सकता है। लेकिन उन्हें नाप नहीं सकता है। लोक रचना के सौंदर्य की बारीक से बारीक जानकारी हो या अनुभूतियां, सब सागर के आकार में हकु शाह केयहां समाहित हैंं। हकु शाह हमेशा उन चीजों से उद्दीप्त होते हैं, जिन्हें हम छांट देते हैं या रद्दी समझ लेते हैं। उनका मानना है कि हर चीज के पास कहने को अपना कुछ होता है, बशर्ते कि हमें सुनना…

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विशिष्ट कहानीकार : राजनारायण बोहरे

इकलसूमड़े हम सब हैरान थे । वर्मा दम्पत्ति का सदा उजाड़ और फीका सा रहने वाला मकान इस वक्त हमारे कस्बे के सबसे चतुर ठेकेदार की देख-रेख में अपना श्रृंगार कर रहा था। आज बड़े भोर चार मजदूर अचानक प्रकट हुए थे और वे बिना किसी हुकुम के इंतजार के स्वतः ही इस मकान में उगे झाड़-झंकाड़ उखाड़ने में जुट गए थे। फिर इससे फुरसत पाते ही तुरंत उनने झाड़ू उठाके मकान के छत, दीवारों से लेकर लॉन के पेड़ों पर तक जमा हो गई धूल की परत और जाले-झोंसेे…

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विशिष्ट कवि : मुकेश कुमार सिन्हा

अजीब सी लड़कियां वो अजीब लड़की सिगरेट पीते हुए साँसे तेज अन्दर लेती थी चिहुँक कर आँखे बाहर आने लगती हैं पर खुद को संभालते हुए, खूब सारा धुंआ गोल छल्ले में बना कर उड़ा देती है ! ठुमक कर कहती है देखो कैसे मैंने उसे उड़ा दिया धुंए में, बेचारा न मेरा रहा, न जिंदगी रही उसकी ! फिर, नजरें बचा कर भीगती आँखों से कह देती उफ़, हिचकी आयी न, अन्दर तक चला गया धुंआ ! अजीब ही है वो अजीब लड़की ! वही अजीब लड़की, गियरवाली साइकिल…

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विशिष्ट गजलकार : लक्ष्मी शंकर बाजपेयी

1 लगते हैं उनको अपने सितम भी सितम कहां होती है ज़ालिमों की कभी आँख नम कहाँ.. हर ग़म समेट लेती थी आँचल मे अपने माँ.. अब सूझता नहीं कि रखूँ अपने ग़म कहां.. वो भी इक आदमी है जिसे ये तलाश है.. रख्खूँ मैं जा के औऱ ख़तरनाक बम कहाँ.. वो ख़ौफ़नाक दौर है,सहमी है लेखनी बदले जो आदमी को मिले वो क़लम कहाँ.. ये ठाठ रहनुमा के ग़रीबोँ के मुल्क मे कुछ मुल्क की सोचेँ वो,है इतनी शरम कहाँ.. चुनना है साँपनाथ मे औ नागनाथ मे डसने मे…

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