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विशिष्ट कवि :: सार्थक कायस्थ
कविता - विशिष्ट कवि

विशिष्ट कवि :: सार्थक कायस्थ

admin August 22, 2026
सार्थक कायस्थ की तीन कविताएं   खास दिन न जाने किस ‘ख़ास’ दिन के इंतज़ार…
विशिष्ट ग़ज़लकार :: अनिरुद्ध सिन्हा
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विशिष्ट ग़ज़लकार :: अनिरुद्ध सिन्हा

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पर्वतों और घाटियों का सम्मोहन वृतांत कौसानी कथा :: डाॅ.भावना
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पर्वतों और घाटियों का सम्मोहन वृतांत कौसानी कथा :: डाॅ.भावना

admin August 21, 2026
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admin August 20, 2026August 20, 2026
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डाॅ. शांडिल्य रामानुजम की दो हास्य कविताएँ
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डाॅ. शांडिल्य रामानुजम की दो हास्य कविताएँ

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देख सको तो देखो डॉ अविनाश भारती समकालीन हिन्दी ग़ज़ल अपने समय की बेचैनियों, संघर्षों…
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संपादकीय

 

 

संपादकीय –

अर्द्धनारीश्वर शिव से प्रेम और स्त्री की नियति

सावन का महीना चल रहा है। सावन भगवान शिव का प्रिय माह है। भगवान शिव यानी औघड़दानी -जो गरल स्वयं पीते हैं एवं अमृत दुनिया को अर्पित करते हैं। शिव यानी अर्धनारीश्वर। दुनिया की सारी स्त्रियाँ अपने लिए शिव के समान पति की ख्वाहिश रखती हैं। भले ही उन्हें सारी जिंदगी भाँग घोटनी पड़े, मृगछाला पर सोना पड़े अथवा पहाड़ पर अपना निवास रखना पड़े… उन्हें तो पति के रूप में बस शिव ही चाहिए। वह शिव, जिसने पार्वती को अपने आधे अंग में समाहित कर लिया।

स्त्रियाँ पुरुष से बस इतना ही तो चाहती हैं। स्त्रियाँ प्रेम की प्रतिमूर्ति होती हैं और उन्हें बस प्रेम ही चाहिए होता है। प्रेम के वशीभूत होकर वे जीवन में लाखों कष्ट सह लेती हैं। निश्चल और निष्कपट प्रेम की तलाश स्त्रियों की नियति है। परन्तु, यह मुट्ठी-भर स्त्रियों का ही सौभाग्य है।

ज्यादातर स्त्रियों का जीवन आज भी भोग्या की छवि से ऊपर नहीं उठ पाया है। स्त्रियाँ, जो प्रेम और करुणा का केंद्र-बिंदु हैं, उन्हें कोई-न-कोई मछेरा जाल लेकर फाँसने की फिराक में हमेशा ही बैठा मिलता है। कुछ स्त्रियाँ उनकी चाल को पहचानती हैं और अपने रास्ते बदल देती हैं। कुछ उसके जाल में फँस जाती हैं।

मछेरे को क्या! उन्हें तो बस मछली चाहिए। उनके लिए मछली धन और ऐश्वर्य का साधन है। वही स्त्री रूपी मछली पुरुष रूपी मछेरे के लिए वासना की तृप्ति का साधन बन जाती है।

जरूरी है स्त्री को चालाक होना। नहीं तो ये मछेरे उनका उम्र भर शोषण करते रहेंगे और फिर उन्हें बदनाम कर अगली मछली की तलाश में लग जाएँगे। साहित्य-जगत में भी ऐसे मछेरों की कमी नहीं है।

सावन का यह पवित्र माह है। भारत की प्रत्येक स्त्री में माता सीता तथा पार्वती का वास है और पार्वती जी शिव जी के आधे अंग में निवास करती हैं। अगर शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया, तब ऐसे मछेरे का क्या होगा? ईश्वर ही जाने!

वैसे, कुत्सित मछेरे हर युग में रहे हैं। याद कीजिए, इंद्र के पुत्र की क्या दुर्दशा मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने कर दी थी। स्वर्ग के राजा के पुत्र होने के बावजूद जयंत तीनों लोकों में भागता फिर रहा था, मगर राम का बाण उसका पीछा नहीं छोड़ रहा था।

कुत्सित मछेरे की भूमिका में बैठे पुरुष अपने दुर्भाग्य को स्वयं आमंत्रित करते हैं।  माता दुर्गा स्वयं ऐसे कुकर्मियों के लिए पर्याप्त हैं।

अभी-अभी देश ने 80वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाया। आप सभी को हार्दिक बधाई।

– भावना

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आंच व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है. इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं. लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है
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