बशीर बद्र की ग़ज़लों का तिलिस्म
-डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री
उर्दू शायरी की एक बड़ी लंबी परंपरा है, लेकिन यह शायरी एक मुद्दत तक बादशाहों, ज़मीनदारों, और रईसों की ज़ीनत बनी रही. यह शायरी आवाम में तब मक़बूलियत का हिस्सा हुई, जब यह ग़ज़ल बशीर बद्र जैसे शायरों के पास पहुँची. आज बशर बद्र का न होना असल में ग़ज़ल के एक युग का समाप्त हो जाना है.कहने को कह सकते हैं कि बशीर बद्र काफ़ी लंबे वक्त से शेरो -शायरी की दुनिया से अलग थे. कई बीमारियों ने उन पर अपना क़ब्ज़ा कर रखा था, और वह एक तरह से एकांतवास की ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे,पर यह भी सच है कि उनका मौजूद होना भी ग़ज़ल के वक़ार के लिए बहुत था.
15 फरवरी 1935 को अयोध्या में पैदा हुए बशीर बद्र अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से उर्दू में पीएचडी करने के बाद बतौर प्रोफेसर मेरठ में अपनी नौकरी का आगाज़ किया, लेकिन उर्दू शायरी में एक मक़बूल शायर के तौर पर अधिक प्रसिद्ध हुए. कहते हैं कि उन्होंने सिर्फ सात वर्ष की उम्र में शायरी करनी शुरू कर दी थी, जब पिता को पता चला कि उन्होंने शायरी शुरू कर दी है, तो उन्होंने सख़्ती से मना किया, लेकिन एक वक़्त ऐसा भी आया कि उनका होना मुशायरों में कामयाबी की जमानत समझी जाने लगी . पूरी उर्दू शायरी में ग़ालिब के बाद यह अकेले शायर थे जिनकी ग़ज़लें लोगों की ज़बान पर थी. बशीर बद्र का पूरा नाम सैयद मोहम्मद बशीर बद्र था. 1999 में आपको पद्मश्री से नवाज़ा गया. अपनी बात को सलीके, तरीके और सहल ज़बान में करने वाले इस शायर ने तीस से अधिक मुल्कों के मुशायरों में शिरकत की. दहशतगर्दी,धार्मिक भेदभाव, और मनुष्य को विभाजित करने वाली शक्तियों पर हमेशा अपनी आवाज़ बुलंद की. उनका यह शेर तो पूरी दुनिया में पोस्टर कविता की तरह प्रसिद्ध हुआ-
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में
ये वो शायर था, जिसने शायरी में एक नए लहजे का इजाद किया, जिसने आवाम के दिल में जगह बनाई. मेरठ दिल्ली और भोपाल की ख़िदमत की, और बताया कि इंसान सबसे अच्छा कौन होता है. उनका एक शेर है-
गुलाबों की तरह शबनम में अपना दिल भिगोते हैं
मोहब्बत करने वाले ख़ूबसूरत लोग होते हैं
ग़ालिब की तरह उनकी नज़र में भी आदमी होना सबसे मुश्किल काम था-
इसलिए तो यहाँ अब भी अजनबी हूं मैं
तमाम लोग फ़रिश्ते हैं आदमी हूँ मैं
वह उम्मीद और आस्था के शायर हैं. वह सिर्फ भयभीत नहीं करते हमें आगे बढ़ने के लिए आमादा करते हैं-
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ़ भी हम चलेंगे रास्ता हो जाएगा
बशीर बद्र की ज़िन्दगी में कई ऐसे मोड़ आए, जब उनके हौसले टूटने लगे. 1987 में हुए मेरठ का दंगा भी उनमें से एक है, जब उनके घर को भी कलीम आजिज़ के घर की तरह जला दिया गया था, घर के सारे क़ीमती सामान राख हो गए, लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा तकलीफ़ अपनी किताबों के जल जाने से हुई.उनके लगभग पाँच हज़ार शेर जल गये,फिर वह मेरठ छोड़कर भोपाल आ गए, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली. पिछले कुछ सालों से वह याददाश्त की बीमारी में मुब्तेला थे.
अपनी शायरी के लिए उन्हें बहुत सारे पुरस्कार से भी नवाज़ा गया. जिसमें पद्मश्री के अलावा साहित्य अकादमी,उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी और बिहार उर्दू अकादमी के पुरस्कार भी शामिल हैं.न्यूयॉर्क में मिलने वाला पोएट ऑफ द ईयर अवार्ड भी क़ाबिले ज़िक्र है. डॉ. बशीर बद्र ने उर्दू शायरी और आलोचना की काफ़ी प्रसिद्ध किताबों की रचना की, जिसमें आमद,आहट इमेज,इकाई, आस आदि क़ाबिले ज़िक्र हैं. बशीर बद्र उर्दू के अलावा अरबी, फ़ारसी,अंग्रेजी और हिंदी के भी अच्छे जानकार थे. उनकी ग़ज़ल की कई किताबें हिंदी में भी मौजूद हैं. यहां तक कि अपने आप को वह हिंदी का शायर कहलाना ज्यादा पसंद करते थे. उनके कई शेर हम सबकी ज़बान पर हैं, जिसमें से कुछ शेर यहाँ देखा जा सकता है
अगर तलाश करो कोई मिल ही जाएगा
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझको चाहेगा
शोहरत की बुलंदी भी एक पल का तमाशा है
जिस शाख पर बैठे हो वह टूट भी सकती है
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
निया मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो
मुसाफ़ि र हो तुम भी मुसाफ़िर हैं हम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए
उर्दू- हिंदी के इस मशहूर शायर के इंतकाल पर पूरी दुनिया ग़मज़दा है. 28 मई 2026 को इंतक़ाल के बाद इस नामवर शायर को भोपाल के बड़े बाग़ कब्रिस्तान में सुपुर्द -ए -खाक़ कर दिया गया. दुनिया में मोहब्बत बाँटने वाले इस शायर के जनाज़े में कम लोग शामिल हुए, इनमें से कुछ लोग तो किसी काम से भोपाल में आए हुए थे.क़ब्रिस्तान में सिर्फ मोबाइल की रोशनी थी. इन्हें अंतिम विदाई देने का कोई इंतज़ाम नहीं था. अलग-थलग रहने वाला बेटा पहले ही उन्हें छोड़कर जा चुका था, सिर्फ पत्नी राहत आखिरी वक्त तक साथ निभाती रहीं .उन्हें सिर्फ उतनी ही ज़मीन मिली जिसके बारे में कभी बशीर बद्र ने लिखा था-
ज़िन्दगी तूने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीन
पांव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है.
1987 के मेरठ दंगे में जब उनका घर जला दिया गया. फिर कभी वह लौटकर मेरठ की तरफ़ नहीं गये.जिस वक्त उनका घर जल रहा था वह दिल्ली के मुशायरा में थे. वसीम बरेलवी की मानें तो उनकी ग़ज़लें किसी सितारा की नहीं मुकम्मल चाँद की तरह थी.उनके बेटे नुसरत बद्र जो बशीर बद्र से बीस साल से अधिक समय से दूर रहते थे, उन्होंने कहा था कि पिता नहीं चाहते थे कि वह भी शायरी करें. बशीर बद्र मानते थे कि शायरी ऊपर से आती है, और जो ज़मीन पर की जाती है वह शायरी नहीं एक्टिंग होती है.
बशीर बद्र की शायरी में सिर्फ मोहब्बत नहीं ज़िन्दगी और मौत दोनों का फलसफ़ा है.एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था एक दिन हम सब मर जाते हैं, और जो ज़िंदा रह जाती है वह हम सबकी मोहब्बत और हमारी शायरी है. वह यह भी कहा करते थे कि शायरी को सियासत और सियासत को शायरी में नहीं जानी चाहिए. जब शायर सियासत में क़दम रखता है,तो उसकी शायरी ख़त्म और सियासत आगे हो जाती है. बशीर बद्र ने ख़ालिस शायरी की जिसमें सियासत नहीं थी. यह अलग बात है कि वह अटल बिहारी वाजपेई की नज़्मों को और अटल बिहारी वाजपेई उनकी ग़ज़लों को ख़ूब पसंद करते थे. उनकी शोहरत हर तरफ़ थी कहते हैं कि उनके बेटे नुसरत बद्र ने जब दिलीप कुमार से ऑटोग्राफ मांगा, तो दिलीप कुमार ने ऑटोग्राफ की जगह बशीर बद्र का शेर लिख लिया था. मीना कुमारी उनके शेर को लिखकर अपने सिरहाने रखती थी. पाठ्यक्रम में उनकी ग़ज़लें शामिल थीं, यह कितना रोचक है कि एक प्रोफेसर होने के नाते उन्होंने अपनी ग़ज़लें ख़ुद पढ़ाई. जब वह एक एग्जाम देने गए थे, तो उनके शेर से ही सवाल पूछे गए. लगभग अस्सी से ज्यादा अशआर तो उनकी पीएच-डी की थीसिस में ख़ुद उनके अपने थे. बशीर बद्र ने जिस ज़मीन पर शायरी की , न जाने कितने शायरों ने उसपर शायरी करने की कोशिश की, लेकिन बशीर बद्र के शेर का मफ़हूम न आ सका. यहां तक कि उर्दू -हिंदी की एक लोकप्रिय शायर अशोक मिज़ाज ने उनकी शायरी से प्रभावित होकर अपना नाम अशोक मिज़ाज बद्र रख लिया है.
बशीर बद्र की ज़िन्दगी का सबसे बुरा वक्त मेरठ का दंगा था उस दंगे में उनके हज़ारों ग़ज़लें जल गईं. बाक़ी जो कक़ीमती पूंजी थी वह अलग. वर्षों इस अवसाद से वह निकल नहीं पाए. उनके कुछ जली हुई ग़ज़लें फ़िल्मकार विशाल भारद्वाज के हाथ लगी, जो बशीर बद्र को पिता जैसे मानते थे.उन्होंने वह ग़ज़लें उनको लौटा दी और बाद में हज भी करवाया.
पूरी दुनिया में मोहब्बत का पैगाम देने वाले बशीर बद्र का एक शेर भी ऐसा नहीं है, जो नफरतें बढ़ाती हो. जब वह दसवीं के तालिबे इल्म थे,तो पिता छोड़ कर चले गए. कई छोटी -मोटी नौकरी कर घर को चलाया भाई- बहनों को पढ़ाया और अपनी पढ़ाई भी जारी रखी.उनके पिता पुलिस विभाग में लिपिक थे. बाद में अनुकंपा पर नौकरी मिल गई. उनकी ज़िन्दगी का सबसे ख़ू बसूरत वक्त उसी इलाहाबाद का था. जब शायर के तौर पर वह मशहूर हो रहे थे. कहते हैं कि वह फ़िराक़ से जब मिलने गए, तो फ़िराक़ उनको नहीं जानते थे, लेकिन जब उन्होंने उनकी शायरी सुनी, तो फ़ितरतन किसी की तारीफ़ न करने वाले फ़िराक़ ने कहा तुम तो बहुत उम्दा शायरी कर लेते हो.
पद्मश्री से सम्मानित बशीर बद्र आज़ाद भारत के एक ऐसे शायर थे, जिनके बिना मुशायरा अधूरा होता था. यह भोपाल की ख़ुशनसीबी है कि उन्होंने हिंदी उर्दू के दो बड़े शायर बशीर बद्र और दुष्यंत कुमार को देखा. जिनके बिना किसी भी युग में ग़ज़ल का इतिहास नहीं लिखा जा सकता. भारत-पाकिस्तान के रिश्ते पर उनका यह शेर –
दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त बन जाएँ तो शर्मिंदा न हों
आज भी आपसी संबंधों पर ख़ूब सुनी जाती है. कुमार विश्वास यों ही नहीं उन्हें ग़ज़ललोक का गौतम बुद्ध कह कर पुकारते हैं. छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस पर आयोजित एक मुशायरा में शरद कोकास को दिए गए इंटरव्यू में बशीर बद्र ने कहा था मीरा, कबीर, तुलसी,ग़ालिब फ़ैज़,फ़िराक़,ख़ुसरो के वही शेर बचे हैं,जो इस भाषा में है जिससे मैं आपसे बात कर रहा हूं. किताबों वाली भाषा किताबों में ही रहेगी.
बशीर बद्र को पसंद करने वाला एक बड़ा तबक़ा था जो हर एक क्षेत्र से जुड़ा हुआ था. इंदिरा गांधी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी,मीना कुमारी ज्ञानी जैल सिंह, सबके वे हीरो थे. टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने लिखा था कि ज्ञानी जैल सिंह जब इस दुनिया से रुखसत हुए तो उनकी ज़बान पर बशीर बद्र का वही शेर था -उजाले अपनी यादों के…… गुलज़ार बशीर को अपना उस्ताद कहते थे. धार्मिक अलगाव तो उनके अंदर बिल्कुल न थी, मेरठ के जिस दंगे में उनका सब कुछ जल गया था.वो उन पर भी बात करना नहीं चाहते थे. बहुत पूछने पर कहते किसी प्रकाश सिंह ने उनका घर जलाया तो घनश्याम सिंह ने उन्हें आसरा दिया उनकी बहू बेटियां मेरी बहू बेटियों की तरह थीं.
यक़ीनन वह अपनी ग़ज़लों के साथ हमारे बीच हमेशा क़ायम रहेंगे, इसलिए उनका आंखों से ओझल हो जाना, विदा हो जाना नहीं,गुड बाय होना है.
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परिचय : डाॅ जियाउर रहमान जाफरी की कई पुस्तकें प्रकाशित हैें. समाकलीन गजल पर इनकी समीक्षा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती है.
ग्रम /पोस्ट -माफ़ी, वाया -अस्थावां, ज़िला -नालंदा, बिहार 803107
9934847941, 6205254255
zeaurrahmanjafri786@gmail.com
