देख सको तो देखो

  • डॉ अविनाश भारती

समकालीन हिन्दी ग़ज़ल अपने समय की बेचैनियों, संघर्षों और आम आदमी की संवेदनाओं को अभिव्यक्ति देने वाली एक सशक्त विधा के रूप में स्थापित हुई है। वरिष्ठ ग़ज़लकार शिव कुमार पराग का ग़ज़ल-संग्रह ‘देख सको तो देखो’ इसी परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण और विचारोत्तेजक संग्रह है। श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित इस संग्रह में कुल 111 ग़ज़लें संकलित हैं, जो ग़ज़लकार के व्यापक जीवनानुभव, सामाजिक सरोकार और रचनात्मक दृष्टि का परिचय देती हैं।

संग्रह की शुरुआत में ‘हिन्दी ग़ज़ल तेवर, प्रतिरोध और संघर्ष की काव्य विधा है’ शीर्षक के अंतर्गत शिव कुमार पराग हिन्दी ग़ज़ल की भाषा पर अपनी स्पष्ट राय रखते हैं। उनका मानना है कि हिन्दी ग़ज़ल की भाषा सहज, सरल और दुराग्रहों से मुक्त होनी चाहिए, ताकि पाठक और श्रोता उससे आसानी से जुड़ सकें। यह विचार केवल उनकी मान्यता भर नहीं है, बल्कि पूरे संग्रह में उनकी रचनाशैली का आधार भी बन जाता है। उनकी ग़ज़लों की भाषा कहीं भी अनावश्यक क्लिष्टता का बोझ नहीं उठाती, बल्कि सीधे पाठक के मन तक पहुँचती है।

पराग जी की ग़ज़लों का सबसे बड़ा गुण उनका सामाजिक सरोकार है। वे आम आदमी के दुःख-दर्द, संघर्ष, अभाव, भूख, लोकतंत्र की विडंबनाओं, राजनीतिक विसंगतियों, बदलते सामाजिक मूल्यों, पारिवारिक रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं को अपनी ग़ज़लों का विषय बनाते हैं। उनकी दृष्टि केवल समस्याओं को रेखांकित करने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वे बेहतर भविष्य की उम्मीद भी जगाते हैं। यही कारण है कि उनकी ग़ज़लें निराशा के बीच भी आशा का दीप जलाए रखती हैं।

इस संग्रह में जीवन के अनेक विमर्श स्वाभाविक रूप से उपस्थित हैं। कहीं भूख और असमानता का प्रश्न है, कहीं लोकतंत्र की लड़खड़ाती स्थिति पर चिंता व्यक्त की गई है, तो कहीं मनुष्य के भीतर बची हुई संवेदनाओं को बचाए रखने की बेचैनी दिखाई देती है। उनकी ग़ज़लों में गाँव की स्मृतियाँ, पारिवारिक जीवन, सामाजिक रिश्ते और मनुष्य की आंतरिक पीड़ा भी समान रूप से स्थान पाती है। इस दृष्टि से यह संग्रह केवल ग़ज़लों का संकलन नहीं, बल्कि हमारे समय का एक संवेदनशील दस्तावेज़ भी है।

शिव कुमार पराग निजी जीवन में भी अत्यंत मृदुभाषी, सरल और आत्मीय व्यक्तित्व के धनी हैं। उनसे मिलने वाला व्यक्ति सहज ही उनके विनम्र व्यवहार और आत्मीयता से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। उनके व्यक्तित्व की यही सहजता उनकी ग़ज़लों में भी स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त होती है। वे कृत्रिमता या आडंबर का सहारा नहीं लेते, बल्कि सीधे और सच्चे अनुभवों को सहज भाषा में पाठकों के सामने रखते हैं। हालाँकि उनकी इस सौम्य प्रकृति को उनकी रचनात्मक दृष्टि की कोमलता नहीं समझना चाहिए। उनकी ग़ज़लों में जनवादी तेवर भी पूरी मजबूती के साथ उपस्थित हैं। वे आम आदमी के दुःख-दर्द, सामाजिक विषमताओं, राजनीतिक विसंगतियों और लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण पर निर्भीकता से अपनी बात कहते हैं। उनकी ग़ज़लों में संवेदना और प्रतिरोध का सुंदर संतुलन दिखाई देता है, जो उन्हें समकालीन हिन्दी ग़ज़ल के महत्त्वपूर्ण रचनाकारों में विशिष्ट स्थान प्रदान करता है।

शिल्प की दृष्टि से भी यह संग्रह उल्लेखनीय है। पराग जी की ग़ज़लों में बहर, क़ाफ़िया और रदीफ़ का संतुलित निर्वाह दिखाई देता है। प्रतीकों और बिंबों का प्रयोग सहज है तथा कथ्य के अनुरूप विकसित होता है। भाषा में प्रवाह है और अभिव्यक्ति में भी कसावट है। वे कम शब्दों में गहरी बात कहने की क्षमता रखते हैं, जो एक सफल ग़ज़लकार की पहचान मानी जाती है।

इनकी ग़ज़लों में जीवन के विविध अनुभव पूरी सच्चाई के साथ उपस्थित हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने अपने संपूर्ण जीवनानुभव को ही अपनी रचनात्मक ऊर्जा का आधार बनाया है। यही कारण है कि उनकी ग़ज़लें बनावटी नहीं लगतीं, बल्कि पाठक को अपने आस-पास के जीवन से सीधे जोड़ देती हैं।

पाठकों के अवलोकनार्थ संग्रह के कुछ प्रतिनिधि शेर प्रस्तुत हैं-

 

निकल के सामने आओ तो कोई बात बने,

अपनी आवाज़ उठाओ तो कोई बात बने।

 

ख़ून में दरार पड़ने लगी,

दोस्ती किस तरह बचाएँ हम।

 

कुछ और देर में बदलाव नज़र आएगा,

नई सुबह का इंतज़ार कर रहा हूँ मैं।

 

हम बहुत चाहते हैं मगर,

रुख़ हवा का बदलता नहीं।

 

जो गिरगिट-सा रंग बदलते हैं,

आजकल फूलते-फलते हैं।

 

लौट के धरती पर आ जा,

अब ना चाँद-सितारे लिख।

 

भूख के दृश्य जब भी आते हैं,

हम बहुत देर तिलमिलाते हैं।

 

हिचकोले खाने लगी लोकतंत्र की नाव,

खेवनहारों में बढ़ी आपस की तकरार।

 

लाख आएँ मुसीबतें, लेकिन,

चलते रहना है हौसला रखकर।

 

जब कभी पाँव लड़खड़ाए हैं,

मंदिरों के क़रीब आए हैं।

 

अंततः कहा जा सकता है कि ‘देख सको तो देखो’ एक ऐसा ग़ज़ल-संग्रह है, जो संवेदना, सामाजिक चेतना और कलात्मक परिपक्वता का सुंदर संगम प्रस्तुत करता है। शिव कुमार पराग ने अपनी सहज भाषा, प्रभावशाली कथ्य और सुदृढ़ शिल्प के माध्यम से समकालीन हिन्दी ग़ज़ल को समृद्ध करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। यह संग्रह न केवल ग़ज़ल-प्रेमियों के लिए उपयोगी है, बल्कि उन सभी पाठकों के लिए भी पठनीय है जो साहित्य में अपने समय की सच्ची तस्वीर देखना चाहते हैं। निःसंदेह यह पुस्तक संग्रहणीय और बार-बार पढ़े जाने योग्य कृति है। इस उत्कृष्ट ग़ज़ल-संग्रह के लिए आदरणीय शिव कुमार पराग जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।

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ग़ज़लकार : शिव कुमार पराग

समीक्षक : -डॉ. अविनाश भारती