अनिरुद्ध सिन्हा की आठ ग़ज़लें
एक
यहीं देखो तलाशो तुम दुबारा
मिलेगा आईने में सच तुम्हारा
उजालों ने कभी रस्ता निहारा
अँधेरों ने कभी हँसकर पुकारा
सफ़र मेरे लिए बिल्कुल नया था
मेरा साया ही था मेरा सहारा
भटक जाती हैं लहरें जब हवा में
समंदर का तभी मिलता किनारा
सभी चेहरे यहाँ उतरे हुए हैं
ये रंजो-ग़म का है कैसा नज़ारा
दो
नौनिहालों में आम होता है
हौसला बेलगाम होता है
घर में आएगी चाँदनी कैसे
चांद छत का गुलाम होता है
गर्द बिस्तर की झाड़ना केवल
घर जमाई का काम होता है
रोज़ कितने ही टूट जाते हैं
ये कचहरी में आम होता है
तेरे महफ़िल आने जाने से
कुछ तो मेरा भी नाम होता है
तीन
सौ ग़म थे जिस जगह पे वहाँ एक खुशी हँसी
बेटी विदा हुई तो मेरी झोपड़ी हँसी
उसको भी अपने आप पर शर्मिंदगी हुई
उसकी अमीरी पर जो मेरी मुफ़लिसी हँसी
कुछ ऐसे वाकिये मैं सुनाने से डर गया
लब से फिसल न जाए कहीं आपकी हँसी
इक नूर-सा है फैला अभी तक यहाँ वहाँ
आँगन में आज जैसे कोई चाँदनी हँसी
जब से पड़े हैं दर पे मेरे आपके कदम
थी तीरगी जहाँ पे वहाँ रोशनी हँसी
चार
मेरे ख़्वाबों की दुल्हन निगाहों में है
क्या करेगा अँधेरा जो राहों में है
प्यास की हिचकियाँ तेरी बढ़ती गईं
किसलिए फिर तू दरिया की बाँहों में है
मुद्दतों जिसने देखी अदालत नहीं
नाम उसका सुना है गवाहों में है
उससे कह दो कि वो पार जाए नहीं
नाव उसकी हवा की निगाहों में है
लग रहा घर भी सत्यम शिवम सुंदरम
रात यह रोशनी की पनाहों में है
पाँच
तू जो चाहे तो क्या से क्या कर दे
जलते सूरज पे तू घटा रख दे
ख़ुद को देखूँ उदास हो जाऊँ
एक धुंधला सा आईना रख दे
उससे कह दो कि धूप ले जाए
मेरे हिस्से में चंद्रमा रख दे
गर उजालों से है तेरा रिश्ता
इस मुंडेरे पे इक दिया रख दे
धुंध फैली है मेरे आँगन में
मेरी चौखट पे अब हवा रख दे
छह
धूप बारिश आंधियों में एक घर तो चाहिए
हम परिंदे हैं हमें कोई शजर तो चाहिए
ग़ैर के हाथों में बिन सोचे तो बंध जाए नहीं
प्यार के जज़्बात को ऐसा हुनर तो चाहिए
वो बहुत खुद्दार था अपने उसूलों पर जिया
मेरे कांधे को कभी वैसा भी सर तो चाहिए
बंद आँखों में मेरा चेहरा न देखे वो कभी
देखने वालों को दुनिया की नज़र तो चाहिए
दर्द का ओढ़े कफन है आँसुओं का ये नगर
एक अच्छी-सी मुहब्बत की ख़बर तो चाहिए
सात
नगर के शोर में सच का सवाल भी निकला
ग़मों के साँचे में ढलता मलाल भी निकला
वो जिसकी आँख में खुशियाँ ज़माने भर की थी
उसी की ज़ेब से भीगा रूमाल भी निकला
लहू से हाथ तुम्हारे रंगे हुए थे मगर
खुली जो मुट्ठी तो उसमें गुलाल भी निकला
मिला जो मुझसे कभी वो अना को ठुकराकर
तो उसके जेहन से अच्छा ख़याल भी निकला
मैं नेक दिल ही समझता रहा जिसे हरदम
वही फ़रेबी वही बाकमाल भी निकला
आठ
मजबूर की झोली से जब सिक्के निकलते हैं
मायूस ज़रूरत के रिश्ते तो बहलते हैं
अपनी ये अमानत है सदियों से यहाँ दिल के
हर चीज़ बदल जाए रिश्ते न बदलते हैं
आया न सलीके से शाख़ों को जिन्हें छूना
फूलों की नज़र छोड़ो काँटों को भी खलते हैं
बरसात के थमने पर देखा है यही हमने
तारे भी निकलते हैं जुगनू भी मचलते हैं
मोहताज ग़मों के हैं आँखों में छुपे आँसू
मर्जी कहाँ अपनी आँखों से निकलते हैं
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परिचय : अनिरुद्ध सिन्हा चर्चित ग़ज़लकार हैं. इनकी दस ग़ज़ल-संग्रह, दो कविता-संग्रह, एक कहानी-संग्रह और नौ संपादित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. इन्हें राजभाषा (बिहार सरकार) का प्रतिष्ठित सम्मान, उर्दू अकादेमी बिहार सरकार का सम्मान और राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर सहित कई सम्मान प्राप्त हैं.
संपर्क – गुलज़ार पोखर,मुंगेर (बिहार) – 811201
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