सार्थक कायस्थ की तीन कविताएं
खास दिन
न जाने किस ‘ख़ास’ दिन के इंतज़ार में,
हम ज़िंदगी की सबसे अच्छी चीज़ें,
बस बचा कर रख लेते हैं।
अलमारी के सबसे अंधेरे कोने में टंगी,
वो एक नई और महँगी सी शर्ट,
महीनों दबी रह जाती है इस आस में…
कि जब कोई बेहद खास मौका आएगा, तब इसे पहनेंगे।
बंद अलमारियों में सजे,
वो काँच के बेहद खूबसूरत बर्तन,
तरस जाते हैं किसी के हाथों की गर्माहट को…
कि कोई खास मेहमान आएगा, तब इनमें चाय परोसी जाएगी।
हम सिर्फ चीज़ें ही नहीं बचाते,
हम बचा लेते हैं अपनी सबसे बेफिक्र हँसी,
कि जब सारी परेशानियाँ खत्म हो जाएंगी,
तब एक दिन जी भरकर हँसेंगे।
हम बचा लेते हैं अपने हिस्से का सुकून,
कि बस यह एक ज़िम्मेदारी और पूरी हो जाए,
फिर आराम से अपनी ज़िंदगी जिएंगे।
पर फिर एक दिन… अचानक से एहसास होता है,
कि वो खास शर्ट रखे-रखे पुरानी हो गई,
वो काँच के खूबसूरत बर्तन बिना इस्तेमाल हुए ही चटक गए,
और वो बेफिक्र हँसी…
तयशुदा मंज़िलों तक पहुँचते-पहुँचते, कहीं पीछे ही छूट गई।
हम भूल गए थे…
कि ज़िंदगी कोई लोहे की तिजोरी नहीं थी,
जिसमें पलों को और खुशियों को,
कल के लिए सहेज कर रखा जाता।
ज़िंदगी तो एक बहती हुई नदी थी,
जिसे बस अंजुली में भरकर, उसी वक़्त पी लेना था।
यह ‘खास दिन’ का इंतज़ार,
ज़िंदगी का सबसे थका देने वाला सराब है।
क्योंकि जो आज है, और जो अभी है…
दरअस्ल बस वही हमारा है।
स्वीकृति
मैंने एक बात पर ध्यान दिया।
एक कवि अपनी कविता इसलिए नहीं लिखता
कि वह केवल उसकी डायरी में बंद रहे;
वह चाहता है कि कोई उसे पढ़े।
एक चित्रकार कैनवास इसलिए नहीं बनाता
कि उसे अँधेरे कमरे में छिपा दे;
वह चाहता है कि कोई उसे देखे।
एक संगीतकार धुन इसलिए नहीं रचता
कि वह केवल उसके कानों तक सीमित रहे;
वह चाहता है कि कोई उसे सुने।
लेखक पुस्तक लिखता है,
वैज्ञानिक अपनी खोज प्रकाशित करता है,
बच्चा चित्र बनाकर सबसे पहले अपनी माँ को दिखाता है।
शायद हम जो भी रचते हैं,
उसका सबसे बड़ा उद्देश्य
किसी दूसरे मनुष्य तक पहुँचना होता है।
तभी मुझे लगा कि
मनुष्य को सबसे बड़ा भय मृत्यु का नहीं,
बल्कि इस बात का है कि—
उसका होना किसी तक पहुँचे ही नहीं;
कोई उसे देखे नहीं, सुने नहीं, समझे नहीं।
शायद कला का जन्म अभिव्यक्ति से नहीं,
अकेलेपन से हुआ है।
कवि कविता लिखता है,
चित्रकार चित्र बनाता है,
संगीतकार धुन रचता है—
क्योंकि हर मनुष्य कहीं न कहीं
यह चाहता है कि कोई उसे देखे,
सुने और समझे।
नेमत
ज़माने की कतारों से, अलग होना भी नेमत है
फ़रेब-ए-जीत से खुद को, बचा लेना भी नेमत है।
मुसलसल भागते रहने से, हासिल कुछ नहीं होता
सफ़र में कुछ घड़ी के वास्ते, रुकना भी नेमत है।
जिन्हें हर हाल में साबित, कोई रुतबा ही करना है
उन्हें क्या इल्म, ख़ामोशी का ये रुतबा भी नेमत है।
निगाहें ढूँढती रहतीं, हमेशा मंज़िलों को ही
बिना मंज़िल किसी रस्ते पे, खो जाना भी नेमत है।
न कोई जंग दुनिया से, न खुद से फ़ासले बाकी,
सभी उलझन भरी शर्तों का, मिट जाना भी नेमत है।
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परिचय : सार्थक कायस्थ की कविताएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती है.
पता: कायस्थ टोला बेनीगंज हरदोई उत्तर प्रदेश 241304
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ईमेल: sarthaksaxena428@gmail.com
