सच बयानी का नहीं ये चुप्पियों का दौर है :: विजय वेदांत

सच बयानी का नहीं ये चुप्पियों का दौर है
  – विजय वेदांत

‘खामोशियों का दौर’ जितेंद्र कुमार ‘नूर’ का दूसरा ग़ज़ल संग्रह है, जिसमें समकालीन भारत के राजनीतिक, सामाजिक और मानसिक ताने-बाने को बड़ी साफगोई और सूक्ष्मता से उकेरा गया है। संग्रह की विशेषता यह है कि इसमें नयापन, सच्चाई, ज़िन्दगी की जद्दोजहद और संवेदना के तमाम रंग मौजूद हैं। वरिष्ठ ग़ज़लकार हरिराम समीप द्वारा रचित भूमिका इस संग्रह को एक साहित्यिक संबल और पुष्ट संदर्भ देती है, जो पाठक को लेखक की यात्रा और उसके महत्व से जोड़ती है। कुल मिलाकर, यह संग्रह नए समय और नई पीढ़ी के सवालों को फ्रंट पर लाता है और पाठक से संवाद करता है।
पुस्तक के शेर न सिर्फ सामाजिक विडम्बनाओं, तानाशाही प्रवृत्ति और चुप्पी के डर को उजागर करते हैं, बल्कि प्रेम, रिश्ते, माँ के आँचल, जल संकट जैसी अनुभूतियों से भी सराबोर हैं। संग्रह की ग़ज़लें कहीं भी एकरस नहीं होतीं, कहीं प्रतिरोध तो कहीं आत्मीयता, कहीं विडम्बना तो कहीं गहरी उम्मीद की झलक है।

आँख मिलाकर जब उनसे कोई अपना हक़ माँगे तो
मान के इसको वो अपना अपमान खड़े हो जाते हैं

जैसे शेर समय की तो तस्वीर पेश करते ही हैं, साथ ही हर संवेदनशील पाठक के भीतर बेचैनी और सोच पैदा करते हैं।
‘नूर’ की भाषा सहज और प्रवाहशील है, जो बिना किसी सजावटीपन के सीधा असर करती है। वो क्लिष्टता या अतिसंवेदनशीलता से बचते हैं। उनकी हर पंक्ति अपने समय की ज़रूरत और ताजगी की मिसाल है।
उनकी ग़ज़लों में पारम्परिक काफिया, रदीफ़, मतला और मकता का संतुलन मिलता है, लेकिन वहीँ कई जगह वो इन बंधनों से परे जाकर विचार-संवेग को तरजीह देते हैं। यही सोच उनकी ग़ज़लों को आज के समय से जोड़ती है। उनकी भाषा आम बोलचाल की है, फिर भी उसमें गहरी अभिव्यक्ति और भावनात्मक सम्प्रेषण है, जिससे पाठक लेखनी के क़रीब महसूस करता है।
संग्रह के कई शेर सामाजिक अन्याय, अभिव्यक्ति की आज़ादी, लोकतांत्रिक मूल्यों और आम आदमी के संघर्ष पर बेहद सटीक टिप्पणी करते हैं,

जो करेगा प्रश्न कहलाएगा एंटी-नेशनल
‘नूर’ कुछ मत बोल, तानाशाहियों का दौर है

आज के दौर में, जब सवाल उठाना भी जुर्म बन गया है, नूर इस भय और ख़ामोशी के विरुद्ध खड़े नज़र आते हैं।
वहीं, मां का आँचल, जल संकट, पूर्वजों की विरासत, प्रेम की सच्चाई, इन विषयों के माध्यम से वह संवेदनाओं की बहुरंगी दुनिया में भी प्रवेश करते हैं।
पूरे संग्रह में जितेंद्र कुमार ‘नूर’ का संघर्ष दृश्यमान है। आजमगढ़ के छोटे कस्बाई परिवेश से निकलकर साहित्यिक पहचान बनाना, वह भी तब जब अभिव्यक्ति और असहमति पर संकट हो, बहुत बड़ी बात है। उन्हें मिले काव्य रथी सम्मान, हिंदी सेवी साहित्य सम्मान, निराला स्मृति सम्मान और लोकायन संस्कृति सम्मान यह दिखाते हैं कि उनका लेखन केवल निजी नहीं, सांस्कृतिक और सामाजिक साझेदारी का भी परिचायक है।

जैसे मेरे पूर्वजों को कर दिये वो दरकिनार
वैसे ही इतिहास से मैं लापता हो जाऊँगा

यह संग्रह पढ़ना केवल शेरों का आनंद लेना भर नहीं बल्कि अपने समय की चुनौतियों, समाज के बदलावों और व्यक्तिगत संवेदनाओं को महसूस करना भी है। ‘खामोशियों का दौर’ उस पाठक को खासतौर पर छुएगा, जो ग़ज़ल को सिर्फ रूमानी नहीं, बल्कि सामाजिक और वैचारिक हथियार मानता है।
यह किताब हर उस संवेदनशील और सवाल करने वाले पाठक का संग्रह होनी चाहिए, जिसे अपने समय की बेचैनी में भी उम्मीद तलाशनी है।

मुझे न व्रत, न तपस्या, न दुआ से मतलब
मैं इश्क़-इश्क़ भी कह दूँ तो इबादत हो जाय

‘खामोशियों का दौर’ जितेंद्र कुमार ‘नूर’ की परिपक्वता, संवेदना और साहित्यिक चेतना का सुंदर दस्तावेज़ है। इसकी ग़ज़लें न केवल आज के दौर की आवाज़ हैं, बल्कि आने वाले समय की चिंता और संकल्प भी हैं। शांत, प्रभावी, तथा आज के सवालों और सपनों से भरी यह किताब नूर की ग़ज़ल यात्रा में एक मजबूत और उल्लेखनीय पड़ाव है।

चुप्पियों की इस नदी में मैं तो बह सकता नहीं
मैं हूँ शायर मैं बिना बोले तो रह सकता नहीं

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संग्रह का नाम : खामोशियों का दौर
ग़ज़लकार : जितेंद्र कुमार ‘नूर’
प्रकाशन : संकल्प प्रकाशन, नई दिल्ली
पृष्ठ : 110
क़ीमत : ₹195
समीक्षक : विजय वेदांत

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