भावना की तीन कविताएँ

1
यह अलग बात है
कि पर्दा उठ चुका है
जिन्दगी के रंगमंच पर
खेला जा रहा यह खेल
खत्म हो चुका है

पर,तुमने शानदार पारी खेली है
एक ऐसी पारी
जो इतिहास के
सुनहरे अक्षरों में दर्ज होगी

एक ऐसे वक़्त में
जब स्त्री शिक्षा
उँगलियों पर गिने जाने लायक थी
गाँव-जबार के
लड़कियों के लिए
अपर ,मिडिल पास होना ही
उपलब्धि हुआ करती थी

उस वक्त
तुमने जागती आँखों से
उच्च शिक्षा का सपना देखा
वो कहते हैं न
कि सपना वह जो सोने न दे

हाँ ! माँ
तुम्हारे सपनों ने
तुम्हें कभी सोने नहीं दिया
तुम चलती रही अनवरत
गाँव समाज की तमाम
वर्जनाओं/लांक्षणाओं को
अनदेखा/अनसुना करते हुए

तुम्हारी निर्भीकता और सजगता ने
हमारी राह आसान कर दी
देखो न! माँ
यह इमारत उसी पर खड़ी है

2

मैं हूं न माँ!
लोग कहते हैं
कि तुम मर चुकी हो
जितनी जल्दी हो
मुझे यह बात समझ लेनी चाहिए
पर, कैसे माँ ?
कैसे समझाऊँ मैं खुद को

बचपन में
आम के पेड़ से नये पेड़ कॉलम बना
खूब उगाये हैं हमने
तब तो, नन्हे पेड़ को
किसी ने नहीं कहा
कि अपने जन्मदाता पेड़ को
भूल जाओ

फिर मुझे क्यों ?
समझाने पर तुले हैं लोग
मैं भी तो
तुम्हारे उदर से निकली
तुम्हारे खून से पोषित
एक मांस का लोथड़ा भर थी

जिसे तुमने जीवन दिया
दुनिया को देखने की दृष्टि दी
शिक्षित /संस्कारित किया
मैं कोई और नहीं माँ
…. तुम्हारी प्रतिबिंब हूँ

तुम्हारी दमित इच्छाएं
मुझ में फलीभूत हो रही हैं माँ
मैं जब तक हूं
तुम्हारी सोच
और परिमार्जित होकर
मुझमें आकार लेती रहेगीं

मैं हूँ न माँ !
जब तक मैं हूँ
तुम मर नहीं सकती

3

कल तक
जब तुम थी माँ
दिन-रात कैसे गुजर रहे थे
पता ही नहीं

लगता जैसे
कुछ पल को मोहलत मिले
कि आराम कर सकूं

अब
जबकि तुम नहीं हो
कोई काम ही नहीं
आराम ही आराम है
पर,चैन नहीं