माँ
– सतीश नूतन
माँ
फैमली पेंशन पाती है
पेंशन लेने जब भी आती है बैंक
पासबुक में दबा कर लाती है
घर की जरूरतों की एक लम्बी सूची
हर माह
जरूरतमंदों द्वारा
लिखी-थमाई
इस सूची में
उसने
कभी नहीं लिखा
अपना नाम और अपनी जरूरतें
…………………………………
माँ
– सतीश नूतन
माँ
फैमली पेंशन पाती है
पेंशन लेने जब भी आती है बैंक
पासबुक में दबा कर लाती है
घर की जरूरतों की एक लम्बी सूची
हर माह
जरूरतमंदों द्वारा
लिखी-थमाई
इस सूची में
उसने
कभी नहीं लिखा
अपना नाम और अपनी जरूरतें
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सार्थक कायस्थ की तीन कविताएं खास दिन न जाने किस ‘ख़ास’ दिन के इंतज़ार में, हम ज़िंदगी की सबसे अच्छी चीज़ें, बस बचा कर रख लेते हैं। अलमारी…
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