विशिष्ट कवयित्री :: अनीता सिंह

अनीता सिंह की पांच कविताएं

 

बरसा हथिया

चौरी-चांचर सूंड गिराकर

हथिया बरसा जोर- जोर से।

 

जब चढ़ता अदरा नहीं बरसे

तब माटी फसलों को तरसे

विदा काल जब बरसे हथिया

तब जन- मन का जीवन हरसे

गड़गड़- गड़गड़, तड़तड़- तड़तड़

गरज रहा है चहुंओर से।

 

जाता हथिया बरस बरसकर

आसमान को लगा झुकाने

जड़ समेत ही गिरे पड़े हैं

जाने कितने पेड़ पुराने

झमर – झमर – झम,झमक- झमक कर

बरस रहा है भोर-भोर से।

 

पोखर-ताल-तलैया भर गए

बागमती, कोसी उफनाई

छिमा करो हे इन्नर देवता

जनजीवन कर रहा दुहाई

दादुर सांझ- पराती गाए

टरर- टरर के शोर- शोर से।

 

सावन पियासो हीं जाए

अबके घन नहीं छाए, माई री

सावन पियासो हीं जाए

 

अबके चिरइया

बाग न बोले

फूल के ऊपर

भंवरा न डोले

रेत रही उड़ीआए, माई री

सावन पियासो हीं जाए

 

अबके कुमुदनी

ताल न फूले

खाली पड़े हैं

बाग के झूले

सखिया न कजरी गाए, माई री

सावन पियासो हीं जाए

 

अबके न भावज

सनेसा पेठाए

अबके तो भईया भी

सुध बिसराए

कंत नहीं घर आए, माई री

सावन पियासो हीं जाए

 

लहर -लहर नाव चले

लहर -लहर नाव चले

डगर -डगर पाँव रे

 

चार दिन का साथ लगे

सदियों का साथ

लेकर चलना यूँ हीं

हाथों में हाथ

सिर पर हमारे रहे तारों की छाँव रे

 

लहर -लहर नाव चले

डगर -डगर पाँव रे

 

निमिया के पेड़ तले

छोटा सा घर

मांदल की थाप पर

नाचें झूsम कर

मिलकर बसाएंगे सपनों का गाँव रे

 

लहर -लहर नाव चले

डगर -डगर पाँव रे

 

माटी के चूल्हे पर

खदकेगा भात

बांसुरी की टेर पर

महकेगी रात

जीवन में कोई ना रहेगा अभाव रे

 

लहर -लहर नाव चले

डगर -डगर पाव रे

 

मेरे राम तुम्हीं रखवारे

टूटी नइया पार जवइया

कबसे बैठी नदी किनारे

मेरे राम तुम्हीं रखवारे

 

मंदिर -मंदिर  माथा टेका

जाने कितने  देव गुहारे

मेरे राम तुम्हीं रखवारे

 

भटक रहे हैं जंगल -जंगल

निर्जन वन में किसे पुकारें

मेरे राम तुम्हीं रखवारे

 

जंतर -मंतर जादू -टोना

कैसे -कैसे नजर उतारे

मेरे राम तुम्हीं रखवारे

 

इसके -उसके आए सबके

छत पर चढ़के बाट निहारे

मेरे राम तुम्हीं रखवारे

 

सोलह सिंगार बत्तीसों अभरन

दुल्हन बैठी माँग संवारे

मेरे राम तुम्हीं रखवारे

 

मौसम आया बीत गया

दे सुधियों को दंश, मिलन का

मौसम आया बीत गया।

 

उमड़-घुमड़ कर मेघा आए,

हुई मगर बरसात नहीं।

अबके सावन में कुछ भी तो,

पहले जैसी बात नहीं।

 

पिछले साल इसी मौसम में,

जीवन का मनमीत गया।

 

हम बन गए खिलौना जैसे ,

क्रूर नियति के हाथों के।

सपने सारे चूर हो गये

वे अच्छे दिन रातों के।

 

धीरे -धीरे पूरा रिसकर,

यह जीवन-घट रीत गया।

 

अपनी सेवा और प्रार्थना भी,

कुछ भी काम नहीं आई।

रक्षक बने विधाता ने भी

निष्ठुरता ही दिखलाई ।

 

निष्ठाओं की हार हो गई,

क्रूर काल ही जीत गया।

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परिचय : अनीता सिंह की कविता की कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. इन्हें कई संस्थानों की ओर से पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है

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