आत्मनिर्भरता : प्रशांत करण

आत्मनिर्भरता
                   – प्रशांत करण
    परसों ही लौकडाउन चार के समय हमारे आर्यावर्त के प्रधानमंत्री जी ने देश को सम्बोधित करते हुए आत्मनिर्भरता का मंत्र दिया है।सो आज चर्चा इसी आत्मनिर्भरता पर।
    हमारे यहाँ आत्मनिर्भरता के कीड़े बचपन से ही हमारे शरीर में प्रवेश कर चुके हैं।बचपन से ही बच्चे अपनी पसंद-नापसन्द के फैसले लेने में स्वतंत्र और आत्मनिर्भर रहे हैं।स्कूल जाते समय घर से ही  किताब कॉपी के अलावे खेल के सुविधानुसार उपकरण/  सामग्री साथ ले जाते हैं।कई पढ़ाई में आत्मनिर्भरता के कारण  शिक्षकों की पढ़ाई पर शायद ही निर्भर ही नहीं रहे।खुद जो समझा उसे ही ठीक माना।परीक्षाओं में भी किताब,प्रश्नोत्तर की पुस्तिका साथ ले जाते ताकि उत्तर लिखते समय किसी का मुंह न देखना पड़े।बस आत्मनिर्भर।इधर प्रश्न देख,उधर उत्तर खोज कर छाप दिया।आत्मनिर्भरता की यह गौरवमयी परम्परा अब भी कई राज्यों का गौरव बना हुआ है।कइयों द्वारा युवावस्था प्राप्त होने के पश्च्यात विवाह के लिए भी उनकी अपने माता-पिता अथवा अविभावकों पर निर्भरता नहीं रही। जिसके साथ जबतक मन हुआ रह लिए और आगे भी आत्मनिर्भरता पर ही विश्वास किया।
       कई सयाने नौकरियों में भी आत्मनिर्भरता के नियम का कड़ाई से पालन करते हैं।खुद अपने भरोसे जुगाड़ कर किसी तरह नौकरी पाने में सफल हो जाते हैं।टेंडर खुद निकलते,खुद परिवार के कागज़ी फर्मों पर टेंडर भरते,खुद टेंडर दे देते,खुद काम की जांच के बदले भुगतान भी कर देते।बस यह हुई न आत्मनिर्भरता । यूनियनों के नेता भी आत्मनिर्भर।जो अपनी आत्मा ने कहा वही करते।कुछ आत्मा सहित निर्भर होने लगे तो इस क्रम में हड़बड़ी में आत्मा और निर्भरता दोनों पृथक हो गए।थानों में पुलिस भी आत्मनिर्भर दिखने लगी।खुद किसी को किसी अपराध में पकड़ा,खुद फाइन किया और खुद सजा देकर बस आत्मनिर्भर।कोर्ट-कचहरी,वकील सब झंझट समाप्त।
    मैं स्वयं आत्मा सहित निर्भरता की तलाश में लगा हूँ।आत्मा तो अमर है।इसलिए मर तो सकती नहीं,मार भी नहीं सकते।पर यह सुविधा तो उठाई जा ही सकती  है कि सुविधानुसार अल्प अथवा दीर्घ काल के लिए इसे गिरवी रख दिया जाए।यदि गिरवी की सुविधा न हो तो वैसी विषम परिस्थिति में इसके बेच दिए जाने में हर्ज देखना घाटे की बात है।जब मामला कुल मिलाकर निर्भरता पर टिका हो तो आत्मा की बात बीच में छोड़ देने का सुख असीम है।कोई चाहे तो मुझे गोद तक ले सकता है।हममें से कई भारतीय जन्म के बाद ही अपने को राज्य पर निर्भर कर लेते हैं।कई यह कार्य बालिग होने के बाद नेतागिरी की शुरुआत में ही कर डालते हैं।एक बार निर्भर होने में सफलता मिल गयी तो समझो पूरी उम्र तक का भी थोड़ी मेहनत से जुगाड़ लगना पक्का हो गया।आजन्म आत्मा के बिना राज्य पर पूर्णतः निर्भर।फिलहाल भारतीय पति की तरह मैं भी खाने-पीने के मामले में अपने अंतःपुर पर निर्भर हूँ।जब जो मिला,बस आत्मा को दबा कर खा पी लेना है।एकबार आत्मा को दबाने का अभ्यास सही ढंग से हो गया तो समझो गृहस्थ जीवन सुखमय।फिलहाल अपने सपने बड़े होने लगे हैं और निर्भरता की मात्रा विस्तार खोज रही है।भैया जी इसके पुराने साधक हैं।बस लौकडाउन खुलते ही उनसे ही आत्मनिर्भरता का पाठ सीखना होगा।क्योंकि नियम भी वही बनाते हैं, पालन उन्हीं की आदेश से होता है और स्वयं पालन करने के लिए वे पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं।करें न करें यह उनकी आत्मा पर।पर आत्मा तो किसी पहाड़ी की ऊंची चट्टान के नीचे दबा कर छिपा दी गयी है।

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परिचय. पूर्व आइपीएस अधिकारी. साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन

 

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