ख़्वाहिश करना कोई गुनाह तो नहीं !

– रश्मि तरिका

 

इंसानों की इस दुनिया में, बस यही तो इक रोना है ….

जज़्बात अपने हों तो ही जज़्बात हैं, दूजों के हों तो खिलौना हैं !!

जी हाँ …खिलौना ! जज़्बातों की डुगडुगी बजाता खिलौना जो हमारा अपना ही जब बजाता है तो बस दिल छलनी छलनी हो जाता है। जब दिल छलनी हुआ है तो ज़ख्म भी हुए होंगे और ज़ख्म है तो छूरी भी चली होगी न ।

एक लंबे अरसे से ,काफ़ी ज़द्दोज़हद के बाद तक़रीबन पांच साल कलम चलाने की मशक्कत करते हुए , कुछ पत्र पत्रिकाओं और फेसबूक की दुनिया में अपार वाहा वाही लूटने के बाद ,कुछ शुभचिंतकों की शुभकामनाएं लेते हुए हम एक दिन इस मुकाम पर पहुँचे कि अब दिलो- दिमाग में समाये या कुछ अनछुए फलसफों को कहानी का जामा पहनाकर एक कागज़ पर उतारा जाए।बस इसी ख़्याल के मद्देनज़र हमें कभी तालियों की गड़गड़ाहट में सुंदर कांजीवरम साड़ी में मंच की सीढियाँ चढ़ते हुए ,कभी अपनी स्वाभाविक मुस्कान को एक लेखकीय अदा में बदलते हुए तो कभी माइक पर नमस्कार की पहली आवाज़ के सदके जाते हुए हमें पाठक बनाम दर्शक दिखने लगे।यूँ लगने लगा कि हमारे एक एक लफ्ज़ पर हर कोई कुर्बान हो रहा हो। सपनों में खोए हुए ,ख्यालों के ताने बाने बुनते हुए , आने वाली हर प्रतिक्रिया के जवाब में कलम को कसकर थामे हुए हम अपनी भावनाओं की रवानगी में बहने लगे।ज्यों ज्यों बह रहे थे त्यों त्यों किताब की सफ़लता के गुर मंत्र सीखने की ललक पैदा होने लगी ।मशहूर होने की कवायद में हम बड़े बड़े दिग्गज़ लेखकों ,बड़े बड़े बुक सेलर बने लेखकों से टिप्स लेने लगे।

परिवार और मित्रों की दुआओं की बदौलत एक दिन पुस्तक हाथ में ऐसे आई मानो एक नवजात शिशु नौ महीनों के बाद जब माँ की गोद मे आता है तब माँ उस शिशु को सहलाते हुए बड़े स्नेह से देखती है।उसे अपने सीने से लगाकर जो मातृत्व की भावना में बहती है वैसा ही कुछ हमारा हाल था।अपने सपने को जीते हुए हमने भी इसी कशमकश के नौ महीने लगाए थे ।ततपश्चात सम्पादक की हाँ या न को हमने भी ऐसे झेला जैसे लेबर रूम के बाहर परिवार वाले खड़े इस बात का इंतज़ार करते हैं कि लड़का हुआ या लड़की ! बच्चे के पैदा होने के बाद की खुशी को जैसे मनाया जाता है ऐसे ही हमने भी परिवार में ,मित्रों में अपनी किताब के आगमन की सूचना दी।बधाइयों का सिलसिला चला।पुस्तक मेले में अपनी किताब को एक बच्चे की मानिंद झोली में लेकर खड़े रहे।लोग आए और बधाई देने लगे ,किताब रूपी बच्चे के नाम को भी सराहा गया…उसके नैन नक्श यानि उसके कवर पेज को भी सराहा गया।” नाम रोशन हो ” की खूब दुआएँ दी गई और हम खुशियां मनाते ,गर्व से अपने छोटे भाई के पास इतराते हुए पहुँचे।उनके हाथों में किताब देते हुए कुछ मीठे बोल ,शुभकामना रूपी शगुन की उम्मीद लगा कर बैठे गए।भाई जिसका पढने से नाता केवल शौचालय की सीट पर अखबार भर पढ़ने तक सीमित था, ने किताब को उलट पलट कर देखा ,निहारा और एक गंभीर मुद्रा में बधाई दी।जैसे बड़े बुजुर्ग नवजात शिशु को गोद मे लेकर बच्चे के रँग रूप ,नैन नक्श का पूरा मुआयना करते हैं और एक ही वाक्य में अपनी बुज़ुर्गीयत का अफ़साना कह डालते हैं “अभी तो पैदा हुआ है ।जैसे जैसे बड़ा होगा रँग बदलेगा।” बात शारीरिक रँग की होगी लेकिन बुजुर्ग एलान ऐसे करते हैं मानो उन्होंने पैदा होते ही बच्चे के व्यवहारिक रँग को देख लिया हो कि बड़े होने पर कुछ अलग ही रँग दिखायेगा।तब एक माँ की मनोस्थिति क्या होती है ,उसके चेहरे के हाव भाव क्या होते हैं इस बात से अनभिज्ञ बुजुर्ग लोगों की बात को सत वचन मान कर ख़ामोश रहना पड़ता है ।

कुछ यही हाल था हमारी किताब का जो भाई की गोद में किसी सुंदर वचन की उम्मीद में कुलबुला रही थी। दुनिया के दस्तूर का भाव आज समझ आ रहा था कि मौका आपके घर की खुशी का हो और आपको अपनों को बुलाना हो तो मनाना पड़ता है बेशक वो आपसे उम्र और ओहदे में छोटा हो या बड़ा हो।आज छोटे भाई के मुखमंडल पर घर के बड़े होने की छटा सी दिखाई दे रही थी मानो मेरी सारी खुशी और कामयाबी का ठीकरा उसके कंधों पर आन पड़ा हो। भाई ने इस ‘नए सदस्य ‘के आगमन की खुशी में चाय नाश्ता और हमारी मनपसंद इमरती से मुुंह मीठा करवाया लेकिन ख़ामोश रहा।

हम भी बाल सुलभ सी ज़िद्द लिए छोटे भाई से उसकी ही मंगवाई मीठी ‘इमरती सी ‘प्रतिक्रिया के इंतज़ार में बैठे रहे। आज से पहले तो ऐसा न हुआ था कि यही भाई हमारे किसी खुशी गम में शरीक न हुआ हो।आज ज़ुबान पर ताले क्यों पड़े हैं समझ न आया। कभी हमारी सेहत को लेकर ,कभी कपड़ों को लेकर जो भाई हमेशा अपनी बिन मांगी सलाह भी देता रहा हो ,उसकी आज की खामोशी कितनी नागावर गुज़र रही थी ,वो क्या जाने ! पर अपने आत्मसमम्मान को ताक पर रखकर हम भी पूछने वाले नहीं थे।नहीं तो न सही ..!हम क्या मरे जा रहे हैं इसकी मीठी वाणी सुनने को ? माँ बाबूजी ,भाभी बहने सबने तारीफें की एक यही अकड़ कर बैठा है।एक पल को लगा कहीं जलन …नहीं नहीं !

इतना तो हम जानते हैं कि भले ही कुछ न कहे पर भाई तो स्नेह प्यार से भरा हुआ व्यक्तित्व है।न्यौछावर होता है हम पर।भगवान माफ़ करना ..कैसी बातें सोचने लगी।धिक्कार है मुझ पर !

साँझ की बेला और हमारी वापिसी का समय हो चुका था।माँ ने बधाई स्वरूप नेग दिया ,भाभी ने मिठाइयों व फलों से भरा टोकरा दिया।गद गद भाव से भरे जा ही रहे थे कि भाई ने अपनी चुप्पी तोड़ी ..

“बहुत बहुत बधाई हो बहन ! बहुत खुश हूँ तुम्हारी कामयाबी पर।काम की टेंशन से घिरा हुआ था सो सुबह कुछ कह नहीं पाया।अब तुम ठहरी ‘ वेल्ली ‘..सारी ज़िम्मेदारियों से मुक्त ।एक क्या दस किताबें लिखो।खैर अच्छा लगा ..यह बताओ कितने पैसे खर्च किये किताब छपवाने में।”

मन पहले ही “वेल्ली” शब्द सुनकर तिलमिला गया था।हमने भी अपने तरकश से एक तीर निकाल फेंका भाई की तरफ।

“अपनी सारी ज़िम्मेदारियों को सम्पूर्ण करने के बाद अपने खाली समय का सही सदुपयोग कर रही हूँ।तुम्हारी तरह व्यस्त होने के बहाने नहीं बना रही।”

“अरे ,अरे बहना मज़ाक कर रहा था।अब तुम बहनों की खुशी में एक भाई खुश नहीं होगा तो कौन होगा ?”बात बदलते हुए भाई ने कहा।

“कोई बात सीधे भी कर लिया करो।दिल तोड़ देते हो।यह तो न हुआ कि दुआएँ दो कि मेरा नाम लेखन की दुनिया में खूब चमके।”

“यह सही कही बहना ! आज तम्हें सफ़लता का गुरुमंत्र देता हूँ जिससे कि तुम्हारा खूब नाम होगा।”एक रहस्यमयी मुस्कान बिखेरते हुए भाई ने कहा।

“अच्छा …वो कैसे ? बताओ न !” मन गेंद की तरह खुशी से उछलने लगा।अगला पल सफलता का “खास टिप” सुनने समझने के लिए लालायित होने लगा।साँस रोके भाई के लबों की हरकत देखने को उतावल हो रही थी।

 

“देख बहना ! आजकल न ये नाम ,ये शौहरत मरणोपरांत बहुत मिलती है।अब श्रीदेवी को ही देख लो ! मीडिया ने उसकी मौत के बाद उसे और भी फेमस कर दिया। समझ रही हो न मैं क्या कहना चाहता हूँ।”

“मैं सब समझ रही हूँ भाई। जब मुँह खोलोगे गलत ही बकोगे।देख लो माँ अपने इस सपूत को।”

मां की तरफ मुख़ातिब होकर शिकायत की तो सब की दबी दबी सी हँसी खिखिलाहट में बदल गई।भाई के इस मज़ाक में सब शामिल थे।

” सच कह रहा हूँ बहना ! तेरे जाने के बाद मैं तेरी इस किताब को दुनिया के कोने कोने में पहुँचा दूँगा।तू बस एक बार …तो सही।फिर देखना तेरा कितना नाम होगा।साथ में मेरा भी भला होगा।मीडिया में आने का कब से एक ख़्वाब पाले बैठा हूँ पर उसके लिए करूँ क्या वो आज तक समझ न आया। अब तुम बड़ी बहन ठहरी ,सारे कर्तव्यों से फ़ारिग हो ,वेल्ली हो।जाने से पहले यह अच्छा काम किया कि किताब छपवा ली।अब मशहूर होने के लिए जीते जी तुम्हें बहुत मशक्क़त करनी पड़ेगी।मरने के बाद इतना वक़्त नही लगेगा।”

“नालायक , मैं कौन सा बड़ी लेखिका हूँ जो मरने के बाद याद की जाऊँगी।”

“बस ये तुम मुझ पर छोड़ दो ! एक टैग लाइन छपवा दूँगा कि अपनी पहली पुस्तक की कामयाबी देखने से पहले ही लेखिका हुई भगवान को प्यारी। “आजकल मार्केटिंग का ज़माना है।’कामयाबी’ शब्द बिना मेहनत के ही तुम्हें मरणोपरांत कामयाबी दिलवा देगा।हम परिवार वालों से जब पूछा जाएगा तब मैं तुम्हारी याद में तारीफों के पुल बाँध दूँगा ।देखना तुम …!”

“बेशर्म ! मैं मर ही गई तो क्या देखने आऊँगी ..!”

भाई को गुस्से से एक मुक्का पीठ पर मारा कि आह की आवाज़ से नींद खुल गई।

पतिदेव पीड़ायुक्त हैरानी से देख रहे थे। गुस्से से जो मुक्का भाई की पीठ पर मारना था वो नींद नींद में पति को दे मारा था।उसी पति ने जिसने किताब लिखने की प्रेरणा से छपवाई तक पूर्ण सहयोग दिया था।

क्या कहूँ अब …यही कि

“हसरत पूरी ना हों तो ना सही…
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परिचय :आगमन व प्रतिलिपि कहानी प्रतियोगिता में तीसरा व आठवां स्स्थान. देश की विभिन्न पत्रिकाओं में कहानियां व लघुकथाएं प्रकाशित. दो तीन संयुक्त कहानी संग्रह में भागीदारी.
पता : 12 ए, टावर बी, धीरज संस के समीप, जीडी गोयनका रोड, सूरत, गुजरात
मो. – 9726924095

 

 

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