विशिष्ट कवयित्री :: साधना रानी

साधना रानी की नौ कविताएं

मौन की वह एक बूँद

सुनो ना !
तुम
चमकते रहना
जैसे अंजन में छिपा
कोई चिर-संवरण दीपक,
जो जलता है मौन,
पर दिखता नहीं
तुम
यूँ ही उतरते रहना
मेरी साँसों की धुँधली संध्या पर,
जैसे हर निशीथ में
एक लौ चुपचाप जन्म लेती हो
मेरे जीवन तक,
इन पलकों पर
एक बूंद बनकर टिके रहना
जैसे स्वप्न की नमी
या
पहली बूँद वर्षा की,
जो नभ से टूटकर
मन की मिट्टी में खोने से पहले
क्षण-भर के लिए
मोती बन जाती है
मैं
अपनी तन्हा पथराई पलकें
तुम्हारी आहट से सिंचित करूँगी,
और हर चमकती सलवट में
तुम्हारा ही प्रतिबिम्ब बुनती जाऊँगी
जब–जब
मेरा अंतर्मन
निराशा की गीली धूल से भर जाएगा,
तुम एक निष्कलंक बूँद बन
मेरे भीतर पुकार बन झर जाना
मैं
उस एक बूंद को
अपने पलकों की सीपी में छुपाकर
जीवन की हर कटु धूप में
अंतर का मोती बना सँजो लूँगी
तुम
बस यूँ ही
मौन की उजली धुन बनकर रहना,
जब तक मैं
अपने अधूरे गीतों की तंद्रा में
तुम्हें अंतिम स्वर की तरह थाम सकूँ
शून्य गीत
कल
वह श्वेत पंखों वाला पल,
जो नील नभ की गोद में
धीरे-धीरे विलीन हो गया,
जैसे कोई स्वप्न,
भोर की ओस में घुलकर
केवल एक नमी बन रह गया हो
उसकी स्मृतियाँ
आज भी मन के उपवन में
अदृश्य घंटियों-सी बजती हैं,
पर उस धवल आभा के भीतर
अब भी तैरते हैं धुँधले छायाचित्र,
अधूरे शब्द, अधूरे स्पर्श,
जो थमने को नहीं जानते
काश! उस समय के उषा-कणों से
आशीष बरस पाते,
हृदय की सूनी डालियों पर
सुख के फूल खिल उठते,
जीवन की लहरों में
शांत ज्योति झिलमिला उठती
पर वह पल तो
किसी चिर अनाम तट पर जा सोया,
जहाँ से लौटना केवल प्रतिध्वनि को आता है।
मैं प्रतीक्षा में डूबी
अपने ही अंधकार में
उसके पगचिह्न खोजती हूँ,
जैसे शशि के आँचल में
गुम हो गया हो कोई नक्षत्र
सहस्र जन्मों की तृषा लिए
मैं उस क्षण को पुकारती हूँ
“ओ समय! एक बार फिर लौट आ,
मेरे भीतर की रिक्त गुफा में
अपनी किरण भर जा।”
पर वह नहीं आता
सिर्फ एक नीरवता उतरती है,
जो आँसू बन झर जाती है,
और मैं फिर वही
अधूरी, अपूर्ण, पर जीवित
अपने शून्य को
गीत बनाकर सजाती रहती हूँ
अनकही सी एक संध्या
देर तक
फुनगी पर
ठिठकी रही शाम
जैसे किसी की प्रतीक्षा में रुकी हो
बिना कहे…
बस देखती रही उस ओर
जहाँ से कोई लौटने वाला था
वह ढलती रही…
धीरे-धीरे
जैसे कोई बात,
कहते-कहते
ख़ुद को रोक ले
अंधेरा आया
पर बदला नहीं कुछ,
जैसे मन का कोई कोना
बस यूँ ही ठहरा रह गया हो,
भोर की जो आशा थी,
किसी पुराने वादे सी
चुपचाप
बिना बोले चली गई
एक चुप्पी थी
जो आँखों की काजल में उतर आई थी,
वो चुप्पी
कभी बादल बन गई,
कभी हवा —
जो कुछ कहकर
कहीं दूर निकल गई
कल क्या होगा?
कोई बात बढ़ेगी या ठहरेगी?
ये तो पता नहीं —
पर आज,
दिल के किसी सूने कमरे में
एक हसरत
धीरे से करवट बदल गई
जीवन : एक क्षणिका की खोज
जीवन
क्षणों का सिहरता समागम है,
जैसे निशा के आँचल में
चुपचाप गिरते
तारों की विस्मृति।
यह माया
विचारों की हलचल में
जब मन के सरोवर में
अदृश्य तरंगें जगाती है,
तब सत्य
कमल की तरह
विलीन जल से उठता है,
क्षण भर को ही सही,
पर स्वयं में पूर्ण
जब स्वप्न
नयन के कोरों से
आशाओं की वीणा बन
कुछ पाने को काँपता है,
तब —
ओस की एक नन्ही बूँद
पत्ते पर ठहरी
सूर्य-किरणों से
उजाले की भाषा में बोल उठती है
वही क्षण
जहाँ आत्मा
अपने ही आलोक में
नहाती है,
वहीं
सत्य घटित होता है
कुछ पल को,
कुछ साँसों तक ही सही
पर वही पल,
समस्त जीवन का सत्व बन
अनुभव की पीठिका पर अंकित हो जाता है
भ्रम की परछाईं
आज जान चुकी हूँ
जो चला गया,
वह लौट कर नहीं आता…
फिर भी,
अभी-अभी —
किसी ने पुकारा था मुझे!
या वह केवल
मेरी ही कल्पना की थरथराहट थी ?
निशब्द घड़ियाँ,
वीरान आकाश,
स्वप्निल एकांत
और मैं!
अकेली…
चारों ओर कोई नहीं,
सिवा उस मौन के
जो मेरे भीतर गूंजता है।
पर यह क्या?
वह छवि
जानी-पहचानी सी,
धीरे-धीरे उभरती धुंध में!
मैं दौड़ती हूँ,
उसके स्पर्श को पकड़ने
और पा लेती हूँ
अपने ही भ्रम को,
अपनी ही छाया को
अभी-अभी,
किसी ने पुकारा था मुझे…
या स्मृति ने
मेरे नाम की रुनझुन बाँधी थी?
मेरे मन की सीमाओं पर
जहाँ विचार थक कर लौट आते हैं,
वहीं किसी परिचित सुगंध ने
फिर से छू लिया मुझे
जैसे कोई भूली हुई साँस
फिर जीवन बन उठी हो
कुछ तो है
शायद वह तुम नहीं,
मेरा ही भ्रम!
तुम्हारी उपस्थिति का
एक नन्हा झोंका,
जो केवल मेरे ही भीतर बहता है,
मेरे ही भावों के समुद्र में
डूबता-उतराता है,
मुझसे ही जीवन माँगता है
यही तो
मुझे पुनः जीने की प्रेरणा देता है।
कभी-कभी,
जब कोई कसक मन में ठहर जाती है,
वह भ्रम नहीं रह जाती —
वह एक संसार बन जाती है,
जहाँ
हम अपने ही प्रतिध्वनि से संवाद करते हैं।
हाँ,
अब जान गई हूँ
किसी ने नहीं पुकारा था मुझे
वह केवल मेरी स्मृति थी,
मेरे ही मन का मृगजल —
जो तुम्हारे नाम की
आवाज़ बन गया था।
समागम
समागम
कभी-कभी,
मेरे भीतर घुली कुछ अधूरी कहानियाँ,
कुछ अनसुलझे जज़्बात,
कलम की नोक से बाहर निकल आते हैं,
जैसे बहती हुई नदियाँ,
पन्नों पर अपनी आहट छोड़ जाती हैं
लिखते-लिखते,
कुछ क्षणों के लिए,
उन अनकहे भावों को जी लेती हूँ
खुद से,
अपने भीतर की भीड़ में,
मिल जाती हूँ।
फिर एक अजीब सी खुशी सी होती है,
जब मैं अपने ही भीतर की भीड़ में,
खुद को खोती हूँ
और उसी खो जाने में,
खुद को पाती हूँ
यह समागम,
जैसे बारिश की बूंदें,
सूखे खेतों से मिलती हैं,
जैसे धूप के बाद छांव मिलती है,
ठंडी, शांत, और सुकून भरी
दुनिया की इस भागमभाग में,
जहाँ हर कोई कहीं दूर कहीं दूर भाग रहा है,
मैं कुछ क्षणों के लिए,
अपने मन के आंगन में,
ख़ामोशी से,
खुद से मिल जाती हूँ
फिर वह मिलन,
एक नए सवेरे की तरह होता है,
जहाँ हर पल नयी उम्मीदें खिलती हैं,
जहाँ हर साँस में,
जिंदगी की नयी मिठास होती है
और मैं उठती हूँ,
अपने भीतर की गहराईयों के साथ,
नई सोच, नई राहों के साथ,
तैयार, फिर से,
इस संसार की भीड़ में,
अपनी एक छोटी सी जगह खोजने को
वो महुए की साँझ…”
आमों की टहनियों पर
फिर कोई अधूरी बात टँग गई है
बौर की सोंधी सी चुप्पी में
झाँकता है बचपन का पीला सूरज।
महुये के झुके तन पर
एक कुंच की हल्की थरथराहट थी,
जैसे किसी विरहिणी के आंचल से
चुपके से गिर पड़ी हो एक पाती
अनकही, अनछुई, अनलिखी!
माफ कीजिए
यह स्मृति किसी जुगनू सी झिलमिला गई,
किसी साँझ के पथ पर
उस गंध ने फिर बाँध लिया मन…
जैसे तपती गर्मियों की छाया में
कोई मधुर मूर्च्छा उतर आई हो —
महुए की मादकता में डूब जाना,
अपने ही अंतर में
धीरे-धीरे खो जाना!
किन्तु अब
न बौर की गंध है
कुंच की कोमल थाप…
महुआ क्यों नहीं दिखाई देता वर्षों से?
क्या समय की रेत में
उसकी जड़ें भी सूख गईं?
या हमारी आँखों में
अब वो सावन नहीं रहा
जो फूलों की भाषा समझ सके…?
मुझे लगता है
महुए ने लौटने से इनकार नहीं किया,
हम ही लौटना भूल गए हैं
उस साँझ के पथ पर
जहाँ स्मृतियाँ महकती थीं —
बिना किसी वसंत के भी।
जादू-सी यह ऋतु
यह कैसी बयार है,
या शायद
कुदरत की कोई मौन तान,
जो
पत्तियों की गिरती धुन में
कोई गीत रच रही है…
वृक्षों की डालियाँ
चुपचाप झुकी हैं,
मानो
उदासी ओढ़े
कोई प्रणय-विरह झेल रही हों…
यह रँग-बिरंगी धरती,
कोई उत्सव नहीं,
यह तो
अतीत की स्मृतियों की
मखमली चादर है,
जो
ओस में भीगती हुई
मन के गहन एकांत को
छू रही है।
कभी लगता है
यह पदचाप है
लौटती शीत की,
या
गिरती पत्तियों की अंतिम सिसकी,
या शायद
गर्मी की दस्तक
जो द्वार पर
संदेह बनकर ठिठकी है
हवा में
इत्र नहीं,
कोई चिर-परिचित व्यथा घुली है,
जो हर मौसम की
एक अलग पीड़ा
बयाँ करती है…
यह जो है
आबोहवा, ऋतु, छाया, या मोह?
कभी समझ नहीं आता
यह जगत है,
या
हृदय की ही कोई
माया…
वसंत
शरद के शांत अश्रु और
ग्रीष्म की तप्त साँसों के मध्य
एक मौन पुलक की छाया है वसंत
मानो विषाद की चादर पर
किसी ने स्मित रश्मि बुन दी हो
यह ऋतु नहीं,
मन के दीपक की वह लौ है
जो आँधी के भय में भी
किसी की स्मृति में मुस्कुराना जानती है
फागुन के रंग
जैसे अनदेखे स्वप्नों के परिधान पहन
सजधज कर उतर आए हों नभ से
और प्रेम?
वह तो वसंत की परिधि पर
किसी विरही की आँखों में
नीर बनकर चमक रहा है।
मैंने दुःख की नदी पर
नीरव शब्दों से एक पुल रचा है
जिस पर खड़ी
मैं न तो यात्री हूँ,
न पार जाने की व्याकुलता में
मैं बस देख रही हूँ
नीलाकाश की विशाल चुप्पी,
और वसुंधरा की वह पीत हरियाली,
जो भीतर की सूनी मिट्टी को
अनायास ही स्पर्श कर जाती है
फूल खिलते हैं
तो जैसे कोई अभिलाषा
धीरे से अधर छू जाती है
और जब खेत पकते हैं,
तो स्मृति में कोई स्नेह
सुनाई देता है
किसी बीते स्वर की तरह
वसंत?
यह ऋतु नहीं,
मन की उस सीपी में पलता मोती है
जो अश्रु से ही जन्मता है,
पर सौंदर्य बन बहता है
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परिचय : साधना रानी लंबे समय से लिख रही हैं. इनकी कविताएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं.
सपर्क : मझौलिया रोड, मुजफ्फरपुर
मो. 9572000965

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