नदी को बहने दो : अनिरुद्ध प्रसाद विमल

नदी को बहने दो
– अनिरुद्ध प्रसाद विमल
श्रेयसी की बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी। यह दूसरा दिन था। खाने की इच्छा होती, परन्तु खाया नहीं जाता। नर्क से भी बदतर जीवन बीत रहा था उसका। कुछ ऐसी बात थी, कुछ ऐसी अनहोनी हो गई थी उसके साथ, जिस पर वह जितना सोचती और भी अधिक उलझती जाती। दर्पण के सामने खड़ी होती, स्वयं को अपलक निहारती। अपनी देह के अंग-अंग को हल्के से स्पर्श करती, सहलाती और फिर रोती। हिचकियों में रात बीत जाती। सोचती, कुछ भी तो नहीं बदला है। फिर मैं आहत क्यों हूँ? मन बेचैन क्यों है? श्रेयसी अपने को समझाने का अथक प्रयास करती, परन्तु मन उसके अन्तर्मन के बुने सभी तर्कों को धराशायी कर देता। मन आत्मा की आवाज को दबा देता।
बी. ए. अंतिम वर्ष की छात्रा थी वह। इक्कीस-बाईस वर्ष की श्रेयसी देखने में जितनी सुन्दर थी, पढ़ने में भी उतनी ही मेधावी। रूप-गुण संपन्न उस लड़की ने अभी-अभी जवानी की दहलीज पर कदम ही रखा था कि उसके साथ यह हादसा हो गया। यही दो साल पूर्व इंटर की परीक्षा में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होने के बाद माँ-बाप दोनों स्थानीय किसी अच्छे कॉलेज में बी. ए. की पढ़ाई के पक्षधर थे। लेकिन श्रेयसी ने दिल्ली विश्वविद्यालय में ही पढ़ने की जिद ठान ली थी। बाप की इकलौती बेटी थी वह। सबकी दुलारी। दो छोटे भाई, दादा, दादी सबको उस पर गर्व था।
पिता रामानुज बाबू प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे। रोज-रोज बढ़‌ती महँगाई में परिवार की गाड़ी किसी तरह खींच रहे थे। हिम्मती थे, हार मानना उनके शब्दकोष में नहीं था। पिता ने अनमनी उदास बैठी श्रेयसी से कहा- “मैंने तो कुछ भी नहीं कहा है। मैं तो सदैव तुम्हारी इच्छाओं के साथ रहा हूँ। याद है तुम्हें, पहले ही दिन तुम सरकारी स्कूल से भाग आई थी। कहा था तुमने, वह भी कोई स्कूल है, उस से तो अच्छा, साफ-सुथरा अपना गुहाल है। चारों तरफ गंदगी। एक मास्टर पर डेढ़ सौ बच्चे। गू के ढेर पर स्कूल, दिन भर सांस नहीं ले सकी हूँ मैं। सेंट जोसफ स्कूल की बस आती है गाँव। मैं वहाँ पढ़ूँगी। मुझे चारों तरफ गू से घिरे स्कूल में नहीं पढ़‌ना।”
तुम्हें क्या पता बेटी, मैं रात भर सो नहीं सका था। अपनी जेब तौलते रात बीती थी मेरी। जानता था कि ये मिशनरी विद्यालय अभिभावक की जेब कतरते हैं, पढ़ाते हैं, व्यवस्था देते हैं, परन्तु उससे अधिक लूटते हैं। मध्यम आय वर्ग के लोग अपने बच्चों को इन स्कूलों में पढ़ाने की कूबत नहीं रखते। फिर भी, रामानुज बाबू ने श्रेयसी को उसकी इच्छा के अनुरूप वहीं से पढ़ाया।… तब श्रेयसी ने भी निराश नहीं किया था। अपने क्लास की वह टॉपर थी। जिला कलेक्टर ने उसे अपने हाथों से पदक देकर सम्मानित किया था। सम्मान समारोह में माता-पिता भी सादर आमंत्रित थे। कितने गौरवान्वित हुए थे तब रामानुज बाबू, जब कलेक्टर साहब ने कहा था कि- “मेरी यह कुर्सी एक दिन इस लड़‌की की होगी।”
अतीत के इन क्षणों को, जो महीना भर पूर्व ही बीते थे को याद करते हुए रामानुज बाबू ने मुस्कुरा कर श्रेयसी से पूछा था- “किसने मेरी लाडली से कहा कि मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ा सकूँगा?”
“माँ ने।” संक्षिप्त सा जवाब था श्रेयसी का।
“क्या कहती है माँ?”
“खर्च का पूरा ब्यौरा देती है माँ। कहती है, पचास हजार एडमिशन में लगेंगे और फिर बीस से पच्चीस हजार रुपये प्रतिमाह रहने और खाने के देने होंगे। आवास और भोजन के लिये यह खर्च तो होगा। घर की आर्थिक स्थिति इस खर्च का भार उठा पाने में सक्षम नहीं है।”
रामानुज बाबू विवेकशील प्राणी थे। स्वभाव के सरल, सहज। उन्होंने पत्नी को आवाज दी- “दीपा?”
पत्नी चौके में बैठी थी। अपना नाम पुकारे जाने पर बाहर आई। बोली- “हाँ जी, क्या कहते हैं?”
“मेरी लाडो का मनोबल क्यों तोड़ती हो?”
“मैंने झूठ क्या कहा है। आपका पूरा वेतन तो तीनों बच्चों की पढ़ाई में खत्म हो जायेगा। घर कैसे चलेगा? गृहिणी हूँ मैं। आप महीने में वेतन उठाते हैं और मुझे थमा देते हैं। कहते हैं, अब तुम जानो, महीना भर चलाना है। मैं चलाती क्या हूँ, खेपती हूँ। पचास टका से नीचे कोई सब्जी नहीं मिलती। अस्सी टके किलो प्याज है। तीन लीटर दूध रोज चाहिए ही, पचास टके की दर से डेढ़ सौ रुपये रोज। बच्ची नहीं है श्रेयसी, इसे खुद सोचना चाहिए। पीछे इसके दो भाइयों की पढ़ाई भी तो है।” दीपा और बोलती। बीच में ही रामानुज बाबू ने टोका था। साधारण और कम लिखी-पढ़ी थी दीपा, परन्तु अनुभव की पकी थी। एक भी बात उसकी काटने लायक नहीं थी।
उसके अकाट्‌य तर्क पर रामानुज बाबू मुस्कुराये और थोड़ा ठहरकर बोले- “उसकी चिन्ता तुम छोड़ दो। मैं सारी व्यवस्था कर लूँगा।”
“बी. ए. ही तो करना है। वह तो किसी कॉलेज से कर सकती है। भागलपुर हो या दिल्ली विश्वविद्यालय, क्या फर्क पड़ता है।”
“फर्क पड़‌ता है दीपा, तुम्हें पता है कि चार हजार सीट के लिए देश भर से पाँच लाख से कुछ अधिक ही छात्र-छात्राओं ने डी. यू. में नामांकन के लिए फाॅर्म भरा है। बी. पी. एस. सी. के पैटर्न पर इसकी प्रतियोगिता परीक्षा होगी। इस परीक्षा में चुना जाना आसान नहीं। यदि अपनी श्रेयसी इसमें सफल हो जाती है तो यह गौरव की बात है। वहाँ पढ़ाई ही इतनी अच्छी होती है कि बच्चे तपे सोने की तरह निखर कर निकलते हैं। पह‌ले मेधा परीक्षा तो देने दो।” पिताजी के कहने के उपरांत माँ ने प्रतिवाद नहीं किया था।
निरन्तर सोचे जा रही थी श्रेयसी। मेधा परीक्षा में बहुत अच्छे अंक लाकर कैंपस कॉलेज करोड़ीमल के लिए वह चयनित हो गई थी। परन्तु वह दिल्ली नहीं गई थी। करोड़ीमल कॉलेज में पिताजी के लाख कहने-मनाने पर भी उसने नामांकन नहीं कराया था। उसके दिल और दिमाग में माँ प्रविष्ट कर गई थी। सहज, सरल माँ का निसंकोच सत्य कथन ! सत्य ही तो कहा था माँ ने, इतनी अल्प आय में कैसे चलेगा परिवार? एक श्रेया ही तो नहीं है, और भी तो हैं। बुढ़ापे में दादा, दादी पर होने वाला खर्च तो जोड़ना भूल ही गई थी माँ। तीन ऋण शेष से उबरने की बात में मैं भी शामिल थी। माँ सब्जी की छौंक के साथ कहती- “बेटी का ब्याह, गौना, खोज कर योग्य वर के हाथों में सौंपना भी तो बाप-माँ के माथे का ऋण ही है। बेटी को कितना भी पढ़ाओ, दान-दहेज के बिना शादी असंभव है। रही नौकरी की बात, तो वह स्वर्ग का पारिजात पुष्प हो गया है।”
माँ की हर बात पर सोच-समझ कर उसने संकल्प के साथ निर्णय लिया था कि वह भागलपुर विश्व-विद्यालय से ही पढ़कर लक्ष्य प्राप्त करेगी। यह शहर उसके घर से नजदीक भी है, मात्र तीस किलोमीटर। घर आना-जाना लगा रहेगा। अपना शहर है, कोई दिक्कत नहीं होगी। मन मार कर नहीं, श्रेयसी ने सहर्ष इस चुनौती को स्वीकार किया था। सुन्दरवती महिला महाविद्यालय में नामांकन के उपरांत डेरा भी संयोग से बहुत बढ़ि‌या और मन के अनुकूल मिल गया था। गली के चार मकान के बाद के मकान में आठ कमरे थे। मकान लड़‌कियों को किराये पर रखने के उद्देश्य से ही बनाया गया था। एक कमरा श्रेयसी को मिल गया था। गली के मोड़ पर ही दैनिक भास्कर का कार्यालय था। सुकांत भट्टाचार्य उस अखबार के संपादक थे। उसी गली के आखिरी मकान में उनका आवास था।
श्रेयसी की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती उसका हँसमुख चेहरा था। चंचल मुख पर हल्की मुस्कान सदैव थिरकती रहती। इन दो वर्षों में बी. ए. अंतिम वर्ष तक पहुँचते-पहुँचते उस लड़‌की ने प्रोफेसर से लेकर प्राचार्य तक को अपनी प्रतिभा और विनम्रता से प्रभावित किया था। गली में आते-जाते सुकांत में उसने पिता का अक्स देखा था। साठ-पैंसठ वर्ष की उम्र के विद्वान, अनुभवी मनुष्य थे वे। श्रेयसी जब भी सामने होती, प्रणाम की मुद्रा में हाथ जोड़ देती और सुकांत जी भी आर्शीवाद में हाथ उठाते कहते- “जीते रहो बेटी।” यह संबोधन श्रेयसी को एक गहरी आत्मीयता से भर देता। उसे लगता कि इस शहर में उसका भी अपना कोई है। परिचय के नाम पर बस इतना ही था दोनों के बीच। सफेद घनी दाढ़ी, लंबा कुरता-पाजामा और अपनी लंबी-पतली काया में कंधे से झोला लटकाये वे गांधी बाबा की तरह लगते। श्रेयसी उसे प्रणाम निवेदित कर निहाल हो जाती।
एकांत कमरे में रोती-फफकती श्रेयसी की आँखों में माता-पिता और सुकांत बाबा के सिवा और कोई नहीं घूम रहा था। वह सोच रही थी- “किसको? कैसे? अपनी व्यथा सुनाऊँ मैं? कोई तो अच्छा नहीं कहेगा। कैसे कहूँगी मैं कि मेरा यह शरीर अपवित्र हो गया। मैं अक्षत यौवना नहीं रही। मुझे उस रिक्शेवाले ने अनजान ऐसी जगह पर पहुँचा दिया, जहाँ मेरे साथ वह घिनौना कृत्य हुआ।”
फिर वह सोचती कि वह इस शहर से कुछ ज्यादा ही निर्भीक हो गई थी। जाड़े के कपड़े ही तो खरीदने थे। बहुत दूर नेपाली मार्केट जाना क्या जरूरी था? सस्ता समझ कर ही गई थी। पिता की जेब पर बोझ कम पड़े, इस बात पर भी उसका ध्यान रहता था। यद्यपि पिता रामानुज बाबू की तरफ से इस प्रकार की कभी भी कोई रोक-टोक अथवा मनाही नहीं थी।
बेटी मन लगाकर पढ़ रही थी। बहुत अच्छा रिजल्ट दे रही थी। किसी भी माँ-बाप को इससे अधिक और क्या चाहिए।
वह स्वभाव से ही मितव्ययी थी।… नेपाली मार्केट जाने का यही कारण था। सस्ते में जाड़े के अच्छे कपड़े वहाँ मिल जाते हैं। शाम से देर रात तक यह मार्केट लगता है। कुछ अधिक नहीं, थोड़ी रात हो गई थी। बीच में कुछ दूर तक रास्ता निर्जन पड़ता था। कई बार तो वह आई थी, उस रास्ते से होकर, इससे और अधिक रात में। लेकिन उस रात वह लुट गई। अपने एकांत कमरे में बैठी श्रेयसी को अपने आप से घिन हो रही थी।
जाड़े की निस्तब्ध रात थी। माघ-पूस की हड्डी कँपा देने वाली ठंड। उसने लंबी सांस ली। सांझ से ही कँपकँपी लिये पछु‌आ हवा चल रही थी। सांय-सांय करती हवा के जोर ने ताड़ के पेड़ को हिला दि‌या था। सूखे डमोले के गिरने की आवाज हुई। उसे लगा खड़… खड… खड़ाक के कर्कश स्वर के साथ वही गिरी हो। उसने सोचा, ये पेड़ मुझ पर टूट कर जड़ समेत, काश क्यों नहीं गिर जाता।
ठंड लग रही थी। उसने रजाई ओढ़ ली। घड़ी की ओर देखा, रात के दस बज रहे थे। रजाई के ऊपर कंबल से श्रेयसी ने अपने को ढँक कर सोने का प्रयास किया। परन्तु नींद ने नहीं आने की, मानो कसम ही खा ली थी। शरीर गर्म हुआ तो मस्तिष्क उड़ने लगा। विचारों को पंख लग गये। बलात शरीर के साथ हुए पीड़ादायक उन क्षणों की व्यथा-कथा में वह फिर डूब गई। किससे कहूँ, अपना यह दुख। क्या पिताजी इस हादसे का दुख सहन कर सकेंगे। माँ तो रोते-रोते मर जायेगी। … और जितने भी लोग हैं, इस संसार में, हँसेंगे। मसखरी करेंगे। पुलिस के नाम से ही उसे घृणा थी। माँ-बाप के सिवा उसे कोई अपना नजर नहीं आया।… परन्तु माँ-बाप को वह खोना नहीं चाहती थी। उसका अंग-अंग टहक रहा था। वह दर्द से कराह उठी। कोई भी सहारे के लिए आस-पास में नहीं था। सखी-सहेली, संगी-साथी सभी अपने-अपने कमरे में ठंड से सहमे-सिकुड़े पड़े थे।
अचानक रजाई, कंबल से बाहर निकल कर वह खड़ी हो गई। कॉलेज से बिल्कुल सटी गंगा नदी बहती थी। श्रेयसी का कमरा दूसरी मंजिल पर था। कमरे की उत्तर वाली खिड़‌की खुलने पर गंगा स्पष्ट दिखाई देती थी। उत्तर वाली खिड़‌की खोलकर उसने अविरल बहती गंगा को अपलक कुछ क्षण तक निहारा। लगा, गंगा उसकी आँखों से ही बह रही है। उसने बहते आँसुओं को निर्ममता से पोछा। देह पर ऊन की चादर रख बुदबुदाई- “माँ अब तेरा ही सहारा“ और सीढ़ियों से नीचे उतर गंगा नदी के किनारे बनी सीढ़ी घाट की ओर बढ़ गई।
ठंड के कारण पथ निर्जन था।
इक्के-दुक्के लोग ही मुश्किल से चल रहे थे। श्रेयसी घाट की सीढ़ि‌याँ तेजी से उतर कर अंतिम सीढ़ी पर सांस लेने के लिए रुकी। अथाह जलराशि की तीव्र धार यहीं से शुरू होती है। उसके दोनों हाथ प्रणाम के लिए उठे, नदी में छलांग लगाने को तत्पर ही थी कि उसे किसी पुरुष की मजबूत मुट्ठियों की पकड़ ने पीछे खींच लिया था। वह और कोई नहीं, संपादक सुकांत भट्टाचार्य थे। ऑफिस का काम निबटाने में देर हो गई थी। नदी घाट की सीढ़ि‌याँ इतनी रात में किसी स्त्री छाया को उतरते देख वे किसी अनहोनी आशंका से सिहर उठे थे।
घाट पर निगम से बिजली बल्ब की व्यवस्था थी। रोशनी में सुकांत जी ने लड़की को पहचानते हुए अचरज से पूछा- “श्रेयसी तुम? यहाँ इस हाल में आत्महत्या से बढ़‌कर संसार में दूसरा कोई पाप नहीं बेटी। नदी को बहने दो, तुम उसमें मत बहो।”
सुकांत के चरणों में लोट गई श्रेयसी, फफक कर रोती हुई बोली- “मैं अपवित्र हो गई हूँ अंकल। बलात किसी ने मेरी इज्जत लूट ली है। मैं अब जीना नहीं चाहती।”
बलात कहाँ, कैसे, कब??? की पुलिसिया जिरह के दुष्परिणामों से पत्रकार होने के नाते वाकिफ थे सुकांत जी। ऐसे नाजुक वक्त में प्यार, दुलार और सांत्वना की जरूरत होती है। ऐसे हादसों से बुद्धिमान एवं सोच-समझ वाले लोग ही बच्चों को उबार सकते हैं।
रात का समय था। साथ में निरीह, अकिंचन एक जवान लड़‌की, ऐसे में लोगों के जुट जाने का भय था। सुकांत जी ने श्रेयसी को दोनों हाथों से उठाया और हाथ पकड़ कर वापस सीढ़ियों के उपर खींचते हुए समझाया- “बाप के बदले मैं बाप बनकर खड़ा हूँ तुम्हारे सामने। तुम्हें मैं मरने नहीं दूँगा, यह निश्चय जानो। खामखाँ लोग नहीं जाने, शर्म से तुम्हारा सिर नहीं झुके निष्कलंकिनी बनी रहो, यही इच्छा है न तुम्हारी? आत्महत्या के निर्णय के पीछे का कारण भी यही है। बुखार से तुम्हारा शरीर तप रहा है। मेरे पीछे आओ बेटी। डरो नहीं। विश्वास करो, तुम्हारा अहित नहीं करूँगा।”
लंबे डेगों वाली आठ-दस सीढ़ि‌यों तक सुकांत बाबू ने श्रेयसी का हाथ नहीं छोड़ा। ऊपर जहाँ से सड़‌क सपाट थी, वहाँ हाथ छोड़ते हुए वे बोले- “चल सकोगी न?” श्रेयसी ने स्वीकृति में सिर हिलाया।… और वे डेरा तक आये। श्रेयसी को अपने कमरे की ओर मुड़ते देख सुकांत बाबू ने टोका- “नहीं, आज रात मेरे डेरे में रहो। तुम्हें सेवा और उपचार की जरूरत है। वहाँ आंटी हैं न! सब सँभाल लेगी। गोपनीयता का वचन देता हूँ। हम तीन के सिवाय यह बात चौथे के कान में नहीं जायेगी।” श्रेयसी के पास दूसरा कोई विकल्प भी नहीं था। बेहोशी सी छा रही थी उस पर। सुकांत बाबू ने श्रेयसी को सहारा देते हुए कहा- “यह एक पिता का आदेश है।” श्रेयसी ने पूर्ण आश्वस्त होकर पग सुकांत बाबू के आवास की तरफ बढ़ा दिये थे।
सप्ताह उसे पूर्ण स्वस्थ होने में लग गया। सुकांत बाबू की पत्नी भी भले विचारों की स्त्री थी। एक माँ से कहीं अधिक ही प्यार, दुलार और सेवा उस स्त्री ने श्रेयसी को दिया। छाती से लगा कर रात भर वह सोती। आठों अंग की मालिश वह करती, बालों को कंघी से सँवार कर उसे सजा कर दर्पण के समक्ष खड़ा कर कहती- “किसी अप्सरा से कम नहीं है, मेरी बेटी श्रेयसी।”
परन्तु श्रेयसी न बोलती, न हँसती। शून्य आँखों से लुटे-पिटे किसी पथिक की भाँति आकाश को ताकती और रोती हुई श्रीमती सुकांत के सीने में बच्चे की तरह चिपक जाती। मुँह छिपाये फफक कर रोने लगती। रविवार का दिन था। सुकांत बाबू घर पर ही थे। श्रेयसी का रोना उनसे देखा न गया। उसके समीप ही कुर्सी लगा कर बैठ गये। उसके बालों पर हाथ फेरते हुए बोले- “जाँच रिपोर्ट के गहन अध्ययन के बाद डाॅक्टर ने बताया कि तुम भविष्य की किसी भी आशंका से मुक्त हो।”
“परन्तु मेरा मन अपनी अपवित्रता पर कुरेदता रहता है।”
कुंठा से ऊपर उठो बेटी! यह शरीर वैसे भी पीड़ा, यातना, दुख और कष्टों का घर है। मन को समझाओ।यह अपराध तुम्हारा नहीं है, इसका भोक्ता वह है, जिसने यह दुष्कृत्य किया है। यह पाप तुमने किया ही नहीं है। किसी और के पाप का दंड स्वयं को देने का तुम्हें क्या अधिकार है। आदमी सिर्फ कर्म का अधिकारी है, फल की चिंता उसे लक्ष्य से भटका देती है। अपने लक्ष्य का संधान करो।” सुकांत बाबू कहते हुए तन कर खड़े हो गये थे।
“मैं क्या कर सकती हूँ अंकल?” श्रेयसी का रुदन रुक गया था। “महाभारत में जो माता कुंती ने किया, सूर्य के साथ हुए संबंध को भुलाकर पंच पवित्र कन्या तक की यात्रा से सबक लेने की जरूरत है श्रेयसी। प्रतिशोध के लिए पूरी ताकत के साथ उठो। पढ़-लिख कर ऐसे पद पर पहुँचो, जहाँ से ऐसे दुराचारियों को दंड दे सको। स्त्री सम्मान और उसके अधिकारों के लिए संघर्ष को लक्ष्य बनाओ। अपने निजी दुखों को सार्वजनिक दुखों की तरफ तब्दील करते ही अपना दुख घट कर छोटा हो जाता है।” सुकांत बाबू विद्वान व्यक्ति थे। वे श्रेयसी की प्रतिभा से परिचित थे। कुछ देर चुप रहने के बाद वे फिर बोले- “आज रविवार है। तुम्हारे पिताजी दोपहर बाद किसी भी समय-तुमसे मिलने पहुँच सकते हैं। तुम्हारा यही हाल रहा तो क्या उनसे कुछ छिपेगा?… और फिर क्या होगा, यह तुम भलीभाँति जानती हो। एक प्रतिभा को बचाने की मेरी कोशिश बेकार हो जाएगी।”
“मुझे मरने से क्यों बचाया अंकल” श्रेयसी काँपते स्वर में बोली।
“ऐसा कर मैंने तुम्हारे माँ-बाप को मरने से बचाया है। मरने के बाद छींटाकशी से तुम्हारी आत्मा की रक्षा की है।”
“मैं आजीवन ऋणी रहूँगी आपकी अंकल। एक परायी अपरिचित लड़‌की के लिए आपने समय, श्रम और अर्थ तीनों…!” श्रेयसी के होंठ थरथरा रहे थे।
बीच में ही सुकांत बाबू बोल पड़े- “मैं एक पत्रकार हूँ श्रेयसी, अपना धर्म समझता हूँ। यह सारा संसार, यह समाज हमारा अपना है। हम सभी जो भी करते हैं, उसका असर समाज पर पड़ता है। तुम भले ही अपने लिए पढ़ोगी, परन्तु तुम्हारे साथ समाज, देश और मनुष्यता का भी उससे हित स्वयं हो जाता है।”
“तो अब मैं क्या करूँ?” श्रेयसी के स्वर में दृढ़ता थी।
“नदी को बहते देखा है?”
“हाँ, बहुत निकट से।”
… तो नदी की तरह अपने को बहने दो। अपने कमरे में जाओ और लक्ष्य की प्राप्ति तक संघर्ष करो। मैं तुम्हारे साथ हूँ। जाओ बेटी, परन्तु ऐसे नहीं, पूर्व की श्रेयसी की तरह दृढ़‌ता के साथ, बीते हादसे को भुलाकर, मुस्कुराती हुई।”
सच में, श्रेयसी के होठों पर मुस्कुराहट तिर आई थी। माता-पिता सदृश्य सुकांत बाबू दोनों प्राणी का चरण स्पर्श करते हुए, इस कथन का गूढ़ अर्थ समझ कर कि- “नदी को बहने दो।” और वह अपने लॉज के लिए प्रस्थान कर गई थी।
…………………………………………………………………………………………
परिचय :: अनिरुद्ध प्रसाद विमल साहित्य की सभी विधाओं में सृजनरत रचनाकार हैं. अब तक हिन्दी में 18 और अंगिका में 17 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिसमें नाटक, कहानी, उपन्यास, लघुकथा, काव्य, दोहे, गीत और ग़ज़ल विधा को रचनाकर विमल ने प्रमुखता से लिया है. कई महत्वपूर्ण संकलनों का संपादन भी किया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *