मन और मंज़र (संस्मरणात्मक ललित निबंध)
– शुभम कुमार
प्रतिदिन की भाँति आज भी सुबह की मॉर्निंग वॉक के बाद जब मैं अपने बगीचे में पहुँचा, तो खिले फूलों को देखकर मन आनंद से भर उठा। एक अलग प्रकार की सुकून भरी अनुभूति हो रही थी। हो भी क्यों न बहुत दिनों बाद जो फूल खिले थे। खिले फूलों को देखकर मैं सोचने लगा कि ये कितने दिनों बाद खिले हैं। पुरानी स्मृतियों में जाकर टटोलने पर कुछ धुँधली यादें ताज़ा होने लगीं, परंतु सही-सही याद कर पाना कठिन था। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि बगीचे में अनेक प्रकार के फूल हैं। गुलाब की ही अलग-अलग किस्में हैं, कहीं लाल, कहीं सफेद, कहीं पीले, तो कहीं सतरंगी गुलाब, जिनमें एक ही फूल में कई रंग एक साथ दिखाई देते हैं लाल, पीला, गुलाबी। नीली अपराजिता है, गेंदे हैं, गुड़हल हैं, गुलदाउदी हैं और न जाने कितने प्रकार के फूल, जिनमें अनेक रंगों की छटा बिखरी हुई है। इन सबको एक साथ नहीं लगाया गया था, बल्कि अलग-अलग समय पर लगाया गया है। फिर भी इतना अवश्य स्मरण हो रहा था कि किस पौधे को कितने वर्ष पहले लगाया था। वर्ष के साथ महीना भी कुछ-कुछ याद आ रहा था शायद इसलिए कि उन दिनों मैं छुट्टियों में घर पर था। बगीचे के अधिकांश पौधे पिछले सात-आठ वर्षों में लगाए गए हैं, यद्यपि कुछ पौधे इससे पहले भी लगाए गए थे।मेरे दादाजी और परिवार के अन्य सदस्यों ने भी इस बगीचे को सँवारने में योगदान दिया है। मैं भी जब-जब घर आता हूँ, कुछ न कुछ बागवानी अवश्य करता हूँ।
बागवानी करने का विशेष कारण तो मुझे ज्ञात नहीं, पर यह बचपन से मेरी रुचि और आदत का हिस्सा रहा है। बागवानी करना और पुस्तकों का संग्रह करना इन दोनों में मेरी इतनी रुचि है कि मैं अच्छे भोजन और कपड़ों तक से समझौता कर लेता हूँ। किंतु यदि कोई पौधा या पुस्तक पसंद आ जाए, तो उसे किसी भी तरह प्राप्त करने का प्रयास करता हूँ। यह केवल रुचि ही नहीं, बल्कि एक प्रकार का नशा बन चुका है। अपने पॉकेट मनी से बचत करके मैंने अनेक पौधे लगाए हैं। उन्हें पानी देना, बढ़ते हुए देखना और खिलते हुए देखना यह सब अत्यंत सुकून प्रदान करता है। मेरी यह आदत रही है कि जब भी मैं किसी कारणवश परेशान या विचलित होता हूँ, या जीवन की उलझनों को समझ नहीं पाता, तब मैं इन्हीं बाग-बगीचों, पौधों और प्रकृति के सान्निध्य में आकर शांति का अनुभव करता हूँ। हालाँकि पहले मैं यह नहीं समझ पाता था कि मुझे वहाँ सुकून क्यों मिलता है, पर अब यह अनुभव स्वाभाविक हो गया है जहाँ शांति मिलती है, वहाँ मन स्वतः चला जाता है। पिछले कुछ सप्ताहों से मैं आत्म-संशय की अवस्था से गुजर रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि जो मैं कर रहा हूँ, वह मुझसे हो पाएगा या नहीं। क्या मैं सही दिशा में जा रहा हूँ? क्या इस मार्ग पर मुझे सफलता मिलेगी? मैं अपनी सफलता के लिए अनेक रास्तों पर चल चुका हूँ, परंतु अपेक्षित सफलता कहीं नहीं मिली। अब एक बार पुनः संकल्प लिया है, पर यह संशय बना हुआ है कि यहाँ सफलता मिलेगी भी या नहीं, और यदि मिलेगी तो कब तक इंतज़ार की एक लंबी सूची है, और अब स्वयं को समझा पाना कठिन होता जा रहा है। मन में उठते अनगिनत प्रश्नों के उत्तर खोजते हुए मैं आगे बढ़ रहा था। पाँच-छह किलोमीटर तक इसी किंकर्तव्यविमूढ़ अवस्था में चलते-चलते अचानक समय का ध्यान आया। घड़ी देखी सात बजकर पैंतीस मिनट हो चुके थे। तब मैं घर की ओर लौट पड़ा। घर पहुँचकर जब बगीचे में खिले फूलों और पौधों पर लगे मंज़र को देखा, तो मन प्रसन्न हो उठा। पिछले वर्ष लगाए गए पौधों पर तब से फूल नहीं आए थे, पर मैंने प्रयास नहीं छोड़ा। पानी दिया, देखभाल की, सफ़ाई की फिर भी फूल नहीं खिले। तब किसी ने सलाह दी कि केवल खाद-पानी से काम नहीं चलेगा; पुराने और अनावश्यक शाखाओं की छँटाई करनी होगी, तभी नई शाखाएँ आएँगी और उन पर फूल खिलेंगे और सचमुच, आज वही फूल खिले हुए थे मन को आनंदित करते हुए। जीवन भी कुछ ऐसा ही है। सफलता एक दिन में नहीं मिलती; इसके लिए निरंतर और अथक परिश्रम करना पड़ता है। प्रतिदिन का परिश्रम धीरे-धीरे जुड़ता जाता है कई बार मन में प्रश्न उठता है कि इतनी मेहनत का क्या परिणाम होगा। हम आत्म-संशय की स्थिति में पहुँच जाते हैं क्या यह कार्य मेरे बस का है? क्या मैं इसके योग्य हूँ? यह कार्य तो बहुत बड़ा है; जब बहुतों से नहीं हो पाया, तो मुझसे कैसे होगा? इस आत्म-संशय को बढ़ाने में मार्ग की बाधाएँ और आसपास के नकारात्मक तथा अल्पज्ञानी लोग भी भूमिका निभाते हैं। इन्हीं विचारों के बीच मुझे कबीर की पंक्तियाँ स्मरण हो आईं-
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।।
अतः आवश्यक है कि हम अपने मन को नियंत्रित रखें, समय का धैर्यपूर्वक इंतज़ार करें और दृढ़ आत्मविश्वास के साथ अपने कर्म में निरंतर लगे रहें। नकारात्मकता से दूर रहकर स्वयं को प्रेरित करते रहें।
जिस प्रकार समय आने पर पेड़ों में मंज़र आता है, फल लगते हैं और फूल खिलते हैं, उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य का भी एक समय आता है। हमें अपने समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए और धैर्य बनाए रखना चाहिए। सफलता प्राप्त होने पर यदि कभी यह अहसास हो कि हम बहुत बड़े हो गए हैं, तो अपने संघर्ष के दिनों को याद करना चाहिए। जैसे हमें अवसर मिला, वैसे ही अन्य लोगों को भी मिल सकता है। प्रकृति हमें यह भी सिखाती है कि पेड़ फल आने से पहले आँधी, धूप और वर्षा को सहते हुए धैर्य बनाए रखते हैं, और जब फल आते हैं, तो विनम्र होकर झुक जाते हैं। अतः हमें भी एक वृक्ष की भाँति अपने संघर्ष के दिनों में आत्मविश्वास बनाए रखना चाहिए और सफलता प्राप्त होने पर विनम्र रहकर समाज के वंचित वर्गों का सहारा बनना चाहिए। मन को दृढ़ और शांत बनाए रखने के लिए स्वयं को प्रकृति से जोड़कर रखें और जहाँ भी फूल खिलें, उनके साक्षी अवश्य बनें।
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परिचय :: शुभम कुमार जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा के हिंदी विभाग में शोधार्थी हैं
