अगले जनम फिर आना : सिद्धिनाथ स्मृति – सतीश नूतन

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अगले जनम फिर आना : सिद्धिनाथ स्मृति
– सतीश नूतन

1982 में गाँव की गझिन गाछ, बरैला ताल पर उड़ते प्रवासी पक्षियों के कलरव,
झाल-करताल-हरिकीर्तन के स्वर और दादी के कंठ में विराजित बज्जिका संस्कार गीतों को अलविदा कह पिता के साथ हाईस्कूल स्तर की शिक्षा लेने शहर आ गया था. माँ दादी की याद न सताए इसके निमित्त पिता रोज शाम गाँधी चौक ले जाया करते थे , घुमाने. इसी चौक पर शहर के लिखने-पढने वालों का जुटान होता था सब दिन. रिक्शे पर पूरी सीट छेके एक हट्टाकट्ठा आदमी उतरता था रोज़, उसके हाथ में साहित्य की कोई न कोई किताब होती थी, जिसे खैनी मलते वक़्त वह अपनी कांख में दबा लेता था. सब उसे बाबा कहते थे. इसी चौक पर उनसे परिचय कराया बाबूजी ने ,यहीं बताया : “ई सिद्धि चाचा हैं आपके.”
उन्हीं की अगुवाई में चौक से अस्पताल रोड की ओर पैदलगामी हो जाते थे सब और डाक्टर बिजली सिंह के क्लिनिक में एकत्र हो साहित्य संस्कृति कला पर घंटों बतकही के बाद अपने-अपने घर चल देते. यही तकरीबन हर रोज़ का हाल था. बीच -बीच में हास परिहास भी होते रहता था वहाँ. एक शाम यह हास परिहास उपद्रव में बदल गया. हुआ यह कि सिद्धिनाथ मिश्र मनमोहन जी को जानकीवल्लभ शास्त्री का हज्जाम कह दिये फिर उनके लिये दँतखिसोड़ शब्द का इस्तेमाल भी हुआ. मनमोहन जी आपे से बाहर हो गए, उन्हें पोंगा पंडित और नवल जी का लठैत कहते रहे बार-बार. सिद्धि चाचा धीर गंभीर मुद्रा में खैनी मलते रहे चुपचाप. अचानक उठे, “आज का काम पूर्ण हुआ” कहते हुए चल पड़े– मेदिनीमल मुहल्ले की ओर. ठीक दूसरी शाम दोनों एक ही बेंच पर चाय की चुस्की लेते देखे गए. वरिष्ठ पत्रकार तेजप्रताप चौहान ने हमलोगों से कहा: “देखऽ, दुन्नो में सुलह हो गया हो.”
सिद्धिनाथ मिश्र से जुड़े ऐसे हजार किस्से होंगे इस शहर के वाशिंदों के पास.

उनके पास चिकनी जुबान नहीं थी. साहित्य के नाम पर कचरा परोसने वाले लोग उन्हें नहीं सुहाते थे—बिल्कुल! विभिन्न विधाओं की दुर्लभ किताबें खूब संजोकर रखते थे वो . काका हाथरसी का ‘तुकांत कोश’ लाने उन्होंने अपने एक परिचित को शहर बनारस भेजा था. शराब नहीं पीते थे पर शराब की कलात्मक खाली बोतलों का अच्छा खासा कलेक्शन था उनके पास. कायदे कानून का पालन बहुत गंभीरता से करते थे सो संभव है कि बिहार में शराबबंदी के बाद उन बोतलों को नष्ट कर दिया हो उन्होंने. उनके कुर्ते की जेब बाकी जेबों से बिल्कुल अलग थी. कुर्ता सिलने वाले दर्जी की मनमर्जी उनके सामने बिल्कुल नहीं चलती थी .एक बार कश्मीरी फिरन जैसा एक लम्बा ऊनी कुर्ता सिलवाया, नाम दिया उसका महाकुर्ता. हस्ताक्षर वही है जिसे करने में न कलम रुके और न ही दुबारा उठे, यह सोच थी उनकी.मेरे पिता हिन्दी शिक्षक थे. दसवीं कक्षा तक हमारे गुरु भी रहे लेकिन घ और ध लिखने का अंतर सिद्धी चाचा से ही जाना. वे धनकुबेर थे. शहर में खेती योग्य जमीन और राजेन्द्र चौक पर मार्केट था पर चंदा मांगने पर रसीद में कमतर राशि भरने की ज़िद पर अड़े किचकिच कर ही दिया करते थे अक्सर.
किरण मंडल के संस्थापक सदस्यों में उनका नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है. 1948 में जब इस संस्था का गठन हुआ तब उनकी उम्र महज दस-ग्यारह साल के बीच थी. इस संस्था से जबतक जुड़े रहे इसके ‘कौमुदी महोत्सव’ और ‘मधु पर्व’ में हिन्दी के नामी गिरामी कवियों को बुलाने में अपनी महती भूमिका का निर्वाह किया. राजकमल चौधरी को आमंत्रित करने उनके घर गये. उनके ना नुकुर पर शशिकांता जी ( राजकमल चौधरी जी की धर्मपत्नी)से हाँ करवाया. नियत तिथि को चौधरी जी पनिया जहाज से हाजीपुर आये. दिनभर नेपाली मंदिर के शहतीरों पर उत्कीर्ण नग्न-भग्न चित्रों को निहारा और रात्रि काल में मंडल के मंच से अपनी चर्चित कविता ‘मुक्ति प्रसंग’ का बेहद प्रभावपूर्ण पाठ कर श्रोताओं के दिलो-दिमाग पर छा गए. गोपाल सिंह नेपाली आये, ‘चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा ‘ इसी किरण मंडल के मंच से सुनाये. उन्हें कई दिनों तक इस शहर का मेहमान बनाया सिद्धि चाचा ने. दिनभर स्कूल कालेजों में और शाम को बाज़ार भ्रमण कराया. तंगहाली के दिनों में नेपाली जी के लिये रजाई-तकिया भी इसी शहर में बना. समय समय पर नागार्जुन, जानकीवल्लभ शास्त्री, आरसी प्रसाद सिंह, रामवृक्ष बेनीपुरी, राजेन्द्र प्रसाद सिंह, गोपी वल्लभ, शांति सुमन, गोपालदास नीरज, काका हाथरसी, हुल्लड़ मुरादाबादी… जैसे कवि लेखकों का पदार्पण होते ही रहा इस शहर में. इस तरह उत्तर छायावाद से लेकर गीत, नवगीत, जनगीत, हास्य-व्यंग्य के जितने भी नये-नये स्वर उभरे सब सुनवाने को मंडल की परिधि में अनेक अवसर गढ़े वो . बीच के दिनों में ‘आयाम’ नाम से एक और संस्था का गठन किया. केदारनाथ सिंह को पहली बार इसी संस्था के बैनर तले देखा-सुना मैंने.

सुख्यात कृति आलोचक नंदकिशोर नवल उनके सबसे करीबी दोस्त रहे. नवल जी ने अपनी पुस्तक ‘यथा प्रसंग’ उन्हें इन शब्दों में समर्पित की है- “मित्रवर सिद्धिनाथ मिश्र के लिए.” इसके बारे में पुस्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा है: “पुस्तक का नामकरण सिद्धिनाथ मिश्र ने ही किया है, जो मेरे साहित्यिक जीवन के आरंभिक दिनों से ही मेरे मित्र रहे हैं. उनके साथ मैनें साहित्य के कई ऊतार चढ़ाव देखे हैं. मैं बहुत दिनों से अपनी एक पुस्तक उन्हें समर्पित करनाचाहता था. यह पुस्तक शायद उनके योग्य हो”. ‘द्वाभा’ नाम से इन दोनों की कविताओं का एक साझा संकलन आया. इसके पूर्व वैशाली जनपद के कवियों के दूसरे संकलन ‘ ‘जनपद विशिष्ट कवि’ में भी उनका कवि रूप सामने आ चुका था. अपनी कविताओं में उन्होंने मकई के भूँजे की गन्ध भरी, वैशाख की तपिश के चित्र उतारे :
” पेड़-पालो, चिरई -चुनमुन
सब दम साधे गुमसुम
कितना बदल गया है मौसम और मन
कि हवा हवाई दोनों गुम.”

दो से चार पंक्तियों में भी मुकम्मिल कविता कहते रहे वो. ‘वेलेंटाइन डे’ पर उनकी पूरी कविता देखिये:
“ले आएँगे बाज़ार से
जाकर दिलों-जाँ और”

हलांकि उन्होंने लिखा बहुत ही कम और पूरी ईमानदारी से इस वेदना को अपनी कविता में भी दर्ज किया :
” संवेदन-घन घुमड़ घिरे
अण्ट- शण्ट कौंधा किया,
किन्तु टल गई वर्षा
मन परती पड़ा रहा, उगी नहीं कविता.”

लेकिन जो भी लिखा उसे ठोक बजाकर लिखा. शब्दों के चयन में सर्वदा सचेत रहे . ‘जनपद विशिष्ट कवि’ की भूमिका में नवल जी ने लिखा है : “शब्दों का वाकई उन्होंने नैवेद्यवत् प्रयोग किया है.”
पढ़ाकू थे वो. देशभर के लिखने पढने वाले लोग उनकी इस प्रवृत्ति से से वाकिफ थे. दो वर्ष पूर्व मान्य आलोचक डाक्टर गोपेश्वर सिंह ने अपने फेसबुक वाल पर उनके इसी रूप को उकेरा है : “पटना में जब रहता था,तब अच्छे पाठक बहुत मिलते थे. उनसे मिलकर हम समृद्ध होते थे. ऐसे ही एक पाठक का नाम जो तुरत याद आ रहा है, वह हाजीपुर के श्री सिद्धिनाथ मिश्र का है. वे आलोचक नंदकिशोर नवल के सहपाठी थे. पढ़ने और किताबें ख़रीदने का ख़ूब शौक़ था. बहुतेरी कविताएँ याद थीं. एक बार कवि केदारनाथ सिंह के ललकारने पर उन्होंने पूरी ‘राम की शक्तिपूजा’ सुना दी जो उन्हें याद थी.”
इसी पोस्ट में लिखने – पढने वालों को उन्होंने एक टास्क भी दिया था : “हर इलाके में, हर शहर में सिद्धिनाथ जी जैसे सिद्ध पाठकों से आपकी मुलाकात हुई होगी! क्या आप अपने सिद्धिनाथों से हमारा परिचय कराने का कष्ट करेंगे?”
पता नहीं गोपेश्वर जी तक ऐसे और नामों की सूची पहुँची भी या नहीं?

‘ध्वजभंंग’ के संपादक मंडल में नवल जी के साथ काम करते हुए कविता कु-कविता में फर्क बताया. मनबढूँ कवि लेखकों को कसकर चिकोटी भी काटी. अपने कविता संग्रह ‘कल सुबह होने से पहले’ के आत्म परिचय में शलभ श्रीराम सिंह ने ‘ कुत्ते और आलोचकों से सख्त नफ़रत’ लिखकर जब आलोचकों को चिढ़ाया. प्रतिकार में ‘ध्वजभंंग’ के आवरण पर शलभ की कविता पुस्तक के नाम मात्र का उल्लेख करते हुए सामने कटे का निशाना लगाया गया. सालों बाद इस कृत पर जब मैंने नवल जी फिर सिद्धिनाथ मिश्र जी से इस बावत सवाल पूछे तो नवल जी ने सिर्फ इतना कहा: “इस तरह की साहित्यिक बदमाशियाँ खूब हुई और होती रहनी चाहिए.” सिद्धिनाथ जी उत्तर देते हुए ज्यादा तल्ख़ हुए: “शलभ का नशा फाड़ने के लिये बहुत जरूरी था ऐसा करना.”

गोष्ठियाँ कैसे आयोजित की जाये? मैंने उन्हीं से सीखा. आयोजन को लेकर नित नया प्रयोग करते, करवाते रहते थे वो. जिस कवि की स्मृति में कवि- गोष्ठी होती उसकी कविताओं का एक फोल्डर बनता, जिसमें कवि की तस्वीर और परिचय भी लगाया जाता. तब हाजीपुर में कम्प्यूटर टंकन की सुविधा नहीं थी. संजय शाण्डिल्य अपनी कलम से फोल्डर को कलात्मक बनाते फिर उसका फोटोकॉपी करवाया जाता फिर गोष्ठी में शामिल लोगों के बीच वितरण होता उसका. कवि की स्मृति में उसकी कविताओं का आवृत्ति पाठ करवाते वो .हमलोग जिस कविता को दुरूह समझते ,पाठ करने से हिचकते उसे वे बहुत ही सहजता से पढ जाते. शब्दों के उच्चारण में कहीं कोई चूक नहीं. उनके पाठ की नाटकीयता भी खूब प्रभाव छोड़ती. इस तरह नये कवियों को कविता पढने की कला सिखाया करते थे वो.
नवल जी के निधन के कुछ ही दिनों बाद उनके दोनों पुत्र कोरोना की भेंट चढ़ गये. मित्र और पुत्र शोक से ऊबर पाना उनके लिए बहुत कठिन हो गया और अंततः 86 की वय में दिनांक 3 फरवरी 2022 को कच्चे बाँस की अर्थी पर सूतकर कोनहारा घाट की महायात्रा पर चल दिए. उसी नारायणी के जल में घुल- मिल गए जिसके कलकल निर्मल धार पर नावों का मंच बना दिग्गज कवियों के साथ कविता वाचन किया था कभी, किसी ‘कौमुदी’ या ‘मधुपर्व’ में.
कोरोना काल में अपने दो जवान बेटों की अर्थी को कंधा लगाए इस घाट पर पहले भी दो बार आ चुके थे वो. अबकी आए तो यहीं राख हो गये.

बहुत आत्मीय सम्बन्ध नहीं रखा आपसे. सिर्फ इसलिए कि आप अप्रिय सत्य बोलते रहे चाचा.जब आप नहीं हैं इस धरा धाम में कितनी प्रिय लगतीं हैं आपकी पुरानी बातें.

पुनर्जन्म में विश्वास नहीं है. लेकिन आज कर लेता हूँ. अगले जनम में आना तो यहीं, इसी शहर में आना.

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