दुष्यंत पूर्व हिन्दी ग़ज़लकार : ज्ञानप्रकाश पाण्डेय

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दुष्यंत पूर्व हिन्दी ग़ज़लकार : ज्ञानप्रकाश पाण्डेय

कोई भी घटना अकस्मात नहीं घटती, उसके नेपथ्य में कोई-न-कोई प्रक्रिया बहुत पहले से चल रही होती है। ग़ज़ल का हिन्दी में आगमन भी, अचानक गुजरा कोई हादसा नहीं था। ग़ज़ल कई परिवर्तनों के पश्चात हिन्दी में आई। ग़ज़ल के साथ एक हजार साल की मुश्तकरखा तहज़ीब भी भारत आई। ग़ज़ल के उत्स को लेकर भी कई बातें कही जाती हैं। किन्तु सच तो ये है कि जमाना-ए-जाहिलिया (अरब के इतिहास में इस्लाम के पूर्व का समय) में लिखे जा रहे कसीदों में जब प्रेम का प्रवेश हुआ तो ग़ज़ल का जन्म हुआ। इमरउल क़ैस (539 ई.) जमाना-ए-जाहिलिया का पहला शायिर था। ये अरबी का शायर था! कैस की शायरी अपने तीसरे परिवर्तन के बाद हिन्दी में आती है। चूँकि ग़ज़ल एक रिवायती सिन्फ़ है अपने साथ एक तहजीब, संस्कार, हुनर, चेतना और योग्यता लेकर आई। ये बात अलग है कि कालान्तर में ये भारतीयता के प्रभाव से विलग न रह सकी। ज्ञान मंडल वाराणसी के ‘हिन्दी साहित्यकोश’ के अनुसार ख्वाजा मुईनुद्दीन चिस्ती भारत में ग़ज़ल के सर्वप्रथम रचनाकार थे। खैर ग़ज़ल का इहितास कुछ भी हो हम अपने विषय पर आते हैं। प्रस्तुत निबंध में हम दुष्यंत से पूर्व के हिन्दी ग़ज़लकारों पर प्रकाश डालेंगे।

जैसा कि सभी जानते हैं ग़ज़ल अपेन इब्तिदाई दौर में प्रेम की वाहिका रही है, हिन्दी ग़ज़ल के प्रारंभिक दौर पर भी उर्दू का गहरा प्रभाव पड़ा। हिन्दी ग़ज़ल का प्रारंभिक दौर भी वैयक्तिकता की परिधि से आगे न बढ़ सका। पूरी तरह से प्रेम पिटारा बना रहा। किन्तु इसके बाद भी ये बात ध्यान देने योग्य है कि इन ग़ज़लों में दैहिक प्रेम की जगह मानव प्रेम की भी आर्द्र खुशबू मिलती है। इश्क कहीं-कहीं मजाजी की जगह हक़ीकी का भ्रम पैदा करता है। प्यारेलाल शोकी लिखते हैं –

 

“जिन प्रेम रस चाखा नहीं, अमृत पिया तो क्या हुआ,

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जिन इश्क में सर ना दिया सो जग जिया तो क्या हुआ।

 

जब इश्क के दरियाव में होता नहीं ग़रकाब तो,

गंगा बनारस द्वारका पनघट फिरा तो क्या हुआ।

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मारम जगत को छोड़कर दिल तन से ते खिलवत पकड़,

शोकी पियारेलाल बिन सबसे मिला तो क्या हुआ।”

 

पहले शेर में ‘अमृत’ अमरता का पर्याय बनकर आया है। अत: पहली पंक्ति में शायर कहना चाहता है कि बिना प्रेम के तो अमृत पीकर भी आदमी अमर नहीं हो सकता। ‘जग जिया’ अर्थात गृहस्थ जीवन भी इश्क के बिना अधूरा है। दूसरे मिसरे में आया ये इश्क कई ओर संकेत करता है ये इश्क प्रेमिका से भी हो सकता है अर्थात मजाजी हो सकता है। इष्ट से भी हो सकता है अर्थात् हक़ीकी भी हो सकता है। तथा साथ-ही-साथ गृहस्थ जीवन अर्थात अपने फ़र्ज से भी हो सकता है। यानी व्यवहारिक भी हो सकता है। हर हाल में ये इश्क ठीक ही लगता है। दूसरे शेर में आया इश्क कुछ पुनरावृत्ति लिए हुए है। किन्तु मन की पवित्रता की ओर संकेत करता है। कवि कहना चाहता है कि बिना इश्क अर्थात बिना समर्पण इन तमाम पवित्र जगहों के पर्यटन का कोई लाभ नहीं है। तीसरे शेर में कवि पलायनवादी सा नज़र आता है। कवि संसार छोड़कर एकांतवासी होने की बात करता है। इन तीनो शेरों में जगज्जुल का अभाव खल रहा है।

गिरधर दास के शेरों में फिर वही  रंग नज़र आती है। वही उर्दू की इज़ाफ़त वही आशिक मिज़ाज़ी। पूरी तरह से व्यष्टि प्रधान शेर। सामाजिक सरोकार कहीं भी नज़र नहीं आता।

“हम भी उस बे-पीर के आशिक हैं कहलाने लगे,

आह! हम मजनू-शुमारी में गिने जाने लगे।

हो गया मुझसे खफ़ा वह याद अब आता नहीं,

जब से सब बे-पीर आकर उसको बहकाने लगे।”

शेर के रुक़्न, फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फाइलुन हर शेर में बिल्कुल सही ढ़ंग से आए हैं मगर ‘मजनू-शुमारी’ के बाद ‘गिने’ शब्द का प्रयोग अनुचित जान पड़ता है। दोनों शब्द एक दूसरे के समानार्थी हैं। दो समानार्थी शब्दों का एक साथ प्रयोग अनुचित है। शेरों में पर्याप्त शेरियत है।

जैसा कि सर्वविदित है कबीर पर भी ग़ज़लकार होने का आरोप है। इनकी आरोपित कविताओं में ग़ज़ल के तत्व भी विद्यमान हैं। पर्याप्त सामाजिकता और भाषा की तानाशाही तो इनकी विशेषता है, किन्तु विधा की प्राचुर्यता का अभाव मिलता है। दो-चार कविताओं में इत्तफ़ाकन ग़ज़ल के तत्व मिल जाने से उन्हें ग़ज़लकार मान लेना ठीक नहीं लगता। खैर, इश्के-हक़ीकी के कुछ शेर देखते हैं।

हमन है इश्क मस्ताना हमन को होशियारी क्या,

रहें आजाद या जग से हमन दुनिया को यारी क्या।

न पल बिछड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से,

उन्हीं से नेह लागी है हमन को बेकरारी क्या।

पहले शेर में कबीर का फक्कड़ाना मिजाज़ दिखाई देता है तो वहीं दूसरे शेर में ब्रह्मवाद की स्थापना करते हुए से दिखाई देते हैं।

कबीर स्वयं प्रेमी बनकर प्रिया से एकाकार हो जाते हैं। शेर अपने रुक़्न को शुरू से अंत तक थामे हुए है। शेर का रुक़्न है-

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ईलुन

बलबीर सिंह रंग का नाम भी दुष्यंत से पूर्व के ग़ज़लकारों में आता है किन्तु इन पर कवि सम्मेलन का प्रभाव साफ दिखाई देता है। इनकी कविताओं में अवाम की चित्तवृत्रि का प्रतिबिंब कहीं परिलक्षित नहीं होता। अगर कहीं होता भी है तो बड़ा ही क्षीण – चित्र सामने आ पाता है। एक उदाहरण –

ऐ दिले-नाकाम आखिर किस लिए?

गर्दिशे अय्याम आखिर किस लिए?

मतले के दोनों मिसरे अपने आप को व्यक्त करने में असमर्थ लग रहे हैं। क्या, किसलिए ये बात स्पष्ट नहीं हो पा रही। दोनों वाक्यों में क्रिया नदारद है। बिना क्रिया के वाक्य ही अपूर्ण लग रहे हैं।

एक और शेर देखें –

आप के पैगाम आखिर किस लिए?

हर किसी के नाम आखिर किस लिए?

यहाँ ‘आखिर किस लिए’ रदीफ़ अपने आप को सही ढंग से स्थापित नहीं कर पा रहा। रचनाकार शायद कहना चाह रहा है कि ‘आप के पैगाम हर किसी के नाम आखिर किस लिए’ मगर पहले मिसरे में आया रदीफ़ कोई अर्थ नहीं दे रहा बल्कि अतिरिक्त पद दोष पैदा कर रहा है।

एक अन्य ग़ज़ल के कुछ शेर देखते हैं –

“हमने तनहाई में जंजीर से बातें की हैं,

अपनी सोई हुई तकदीर से बातें की हैं।

तेरे दीदार की क्या खाक तमन्ना होगी,

जिन्दगी भर तेरी तसवीर से बातें की हैं।”

मतले के शेर में देश भक्ति का भ्रम तो अवश्य पैदा हो रहा है मगर बाद का शेर साफ कर दे रहा है कि रंग साहब गमें जाना के ही शिकार हैं। ग़ज़ल शुरू से अंत तक अपने रुक़्न को सम्हाले हुए है।

रुक़्न –

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने भी ‘रासा’ नाम से कुछ ग़ज़लें लिखीं किन्तु कुछ खास सफलता न मिलने के कारण उन्होंने अपना हाथ खींच लिया। उनकी ग़ज़लें भी रुमान निगारी की परिधि से बाहर न आ सकीं। मैं ये नहीं कहता कि रुमान निगारी या उल्फ़त बुरी चीज है किन्तु इतना जरूर कहूँगा कि भारतेन्दु के समय की माँग कुछ और थी। वो गुलामी का दौर था और भी बहुत से मुद्दे थे। ‘अंधेर नगरी’, ‘भारत दुर्दशा’ और ‘नील देवी’ जैसी कृतियों के कृतिकार को ये ग़ज़ले बिल्कुल शोभा नहीं देतीं।

“गले मुझको लगा ले ऐ दिलदार होली में,

बुझे दिल की लगी भी तो ऐ यार होली में।

नहीं यह है गुलाले-सुर्ख उड़ता हर जगह प्यारे,

ये आशिक की हैं उमड़ी आहें आतिशबार होली में।

गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझको भी जमाने दो,

मनाने दो मुझे भी जानेमन त्योहार होली में।

है रंगत जाफ़रानी रुख़ अबीरी कुमकुमी कुच है,

बने हो ख़ुद ही होली तुम ऐ दिलदार होली में।

‘रसा’ गर जामे-मय गैरों को देते हो तो मुझको भी,

नशीली आँख दिखलाकर करो सरशार होली में।”

ग़ज़ल रुक़्न (मुफ़ाईलुन x4) पर आधारित है अत: रुक़्न के अनुसार देखा जाय तो मतले का शेर ख़ारिज है। चौथा शेर भी बैशाखियों की माँग कर रहा है। स्वयं को बाकी शेरों के समानान्तर खड़ा नहीं कर पा रहा। उपर्युक्त ग़ज़ल में ग़ज़ल का सिन्फ़ तो जरूर है मगर गंभीरता का अभाव साफ दृष्टिगत हो रहा है। ‘कुच’ और ‘जानेमन’ जैसे शब्द अश्लीलता की ओर संकेत कर रहे हैं। एक राजा का विलास पूरी ग़ज़ल में व्याप्त है। अच्छा ही किया भारतेन्दु ने अधिक ग़ज़लें नहीं लिखीं वर्ना उनकी गंभीर रचनाओं पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ता।

बद्री नारायण उपाध्याय ने भी ‘प्रेमघन’ तखल्लुस से ग़ज़लों में हाथ आजमाइस की परन्तु ये भी कुछ खास सफ़ल न हो सके। वही उर्दू का रिवायती अंदाज वही कथ्यों की संकीर्णता। गाल और बाल यहाँ भी लफ़्जों के साथ लिपटे रहे। ग़ज़ल यहाँ भी वास्तविकता की शख्त ज़मीन न पा सकी। कहीं पपीहे की पुरगजब रट तो कहीं आँखों में उबाऊ गमें जाना। समाज यहाँ भी पूरी तरह नदारद रहा –

 

तेरे इश्क में हमने दिल को जलाया,

कसम सर की तेरे मजा कुछ न आया।

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नज़र खार की शक्ल आते हैं सब गुल,

इन आँखों में जब से तू आकर समाया।

x                      x                      x

मचाया है मोरों ने क्या शौरे-मैहशर,

पपीहे ने क्या पुर-गजब रट लगाया।

x                      x                      x

परीशाँ हो क्यों अब्रे-बेखुद भला तुम,

कहो किस सितमगर से है दिल लगाया।

उपर्युक्त शेर यूँ तो ग़ज़ल के शिल्प की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरते हैं, बहरे मुतकारिब की ये ग़ज़ल फऊलुन, फऊलुन फऊलुन फऊलुन के लयखंड का पूरी तरह अनुपालन करती है किन्तु कहीं भी अपने आपको अपने समय से जोड़ती नज़र नहीं आती।

प्रताप नारायण मिश्रा ने बहुत अधिक ग़ज़लें नहीं कहीं पर इनकी ग़ज़लों में समाज की छटपटाहट नज़र आती है। समाज की विडंबनाओं कमियों असंतोष पर उन्होंने प्रहार करने की कोशिश की है। कवि कहता है-

अनुद्योग, आलस्य, संतोष सेवा,

हमारे हैं अब मेहरबाँ कैसे-कैसे।

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अभी देखिए क्या दशा देश की हो,

बदलता है रंग आसमां कैसे-कैसे।

कितना तीखा व्यंग्य है। यहाँ कवि का बुनियादी अनुभव है। शायरी पूरी तरह से ज़दीद हो गई है। तगज्जुल और तखैयुल का एक अलग अंदाज दूसरे शेर में देखने को मिलता है। शायरी में एक मुहाकत और नजाकत है। घर करती अपसंस्कृति पर एक तीखा तंज देखें –

“प्रताप अब तो होटल में निर्लज्जता के,

मजा लूटती है जिनाँ कैसे-कैसे।”

बात करख़्त भले है पर इसमें मुहाकत (यथार्थ) और रवानी है। वज्न है– फऊलुन, फऊलुन, फऊलुन फऊलुन

स्वामी राम तीर्थ और प्यारे लाल शोकी की गजलें एक दूसरे की पुनरावृत्ति करती-सी लगती हैं। एक उदाहरण देखिए –

“जिन प्रेम रस चाख्या नहीं, अमृत पिया तो क्या हुआ,

जिन इश्क में रस न दिया, जुग-जुग जिया तो क्या हुआ।

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जब प्रेम के दरयाब में गरकाब यह होता नहीं।

गंगा जमुन गोदावरी न्हाला फिरा तो क्या हुआ।”

 

लाला भगवान दीन भी प्रेमिका के पैरों के इर्द-गिर्द ही घूमते नज़र आते हैं। फिज़ूल तुकबंदी के अतिरिक्त यहाँ भी कुछ दिखाई नहीं देता। ऐसा लगता है जैसे मस्क करने के लिए लिखी गई कोई मस्किया ग़ज़ल हो –

“तुमने पैरों में लगाई मेंहदी,

मेरी आँखों में समाई मेंहदी।

 

है हरी ऊपर मगर अंतस है लाल,

है ये जादू की जगाई मेंहदी।

 

कल से छूटी कूट कर पीसी गई,

तब मेरे पद छूने पाई मेंहदी।”

 

इस ग़ज़ल में बस बहर निभाई गई है और कुछ भी नहीं। रुक्न – फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

छायावाद के दौर में भी ग़ज़लें काफी मात्रा में लिखी गई। डॉ. सरदार मुजावर लिखते हैं – “हिन्दी की छायावादी ग़ज़लों का विषयगत परिप्रेक्ष्य विविधता पूर्ण रहा है। ये विविधताएँ छायावादी ग़ज़ल को एक विशिष्टता प्रदान करती हैं। छायावादी ग़ज़लों ने जहाँ एक ओर हिन्दी कविता के विकास में योगदान दिया वहीं दूसरी ओर इन ग़ज़लों ने हिन्दी ग़ज़लों के विकास में भी योगदान दिया।” हिन्दी की छायावादी ग़ज़ल, सरदार मुजावर, पृष्ठ 15) छायावादी ग़ज़लों में शृंगारिकता की मात्रा अधिक है। जयशंकर प्रसाद की एक ग़ज़ल देखें –

“अस्थाचल पर युवती संध्या कि खुली अलक घुँघराली है,

लो माणिक मदिरा की धारा अब बहने लगी निराली है।”

ध्रुवस्वामिनी पृ. 35

उपर्युक्त शेर में प्रकृति के मानवीकरण रूप का बड़ा ही सुन्दर चित्रण है। ‘युवती संध्या’ और ‘माणिक-मदिरा’ रूपक बनकर आए हैं। तगज्जुल यहाँ भी आहत हुआ है। एक और शेर देखें –

“अरुण अभ्युदय से हो मुदित मन प्रशान्त सरसी में खिल रहा है,

प्रथम पत्र का प्रसार कर के सरोज आलिंगन से मिल रहा है।”

कानन कुसुम / प्रसाद पृ.42

उपर्युक्त शेर, शेरनुमा भले ही हों किन्तु इनमें क्लिषटत्व दोष है, शेरियत तो बिल्कुल गुम है। ये पंक्तियाँ छायावादी तो अवश्य लग रही हैं किन्तु इनमें शेरों वाली वो गति वो मारक क्षमता, वो रवानी बिल्कुल नहीं है।

ग़ज़ल की बागडोर निराला के हाथों में आकर कुछ परिवर्तित होती है। जैसा कि सभी जानते हैं, निराला की कविताएँ अपने उत्तर काल में प्रगतिवादी हो जाती हैं, निराला की ग़ज़लों पर भी इसका प्रभाव पड़ा। एक उदाहरण –

भेद खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है,

देश को मिल जाए जो पूँजी तुम्हारे मिल में है।

(बेला पृ. 35)

शेर का रुक़्न फ़ाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन है। इस लिहाज से शेर का पहला मिसरा ख़ारिज है, किन्तु फिर भी शेर में पूँजीवाद का विरोध खुलकर किया गया है। कहीं किसी तरह की हिचकिचाहट नहीं। ये कहने में भी मुझे कोई गुरेज़ नहीं कि दुष्यंतकालीन ग़ज़लों की नींव छायावाद के समय में ही रख दी गई थी।

निराला की गजलों में तंज बड़े ही चुटीले होते हैं प्रतीकों का बड़ा ही सुन्दर प्रयोग है।

“मुसीबत में कटे हैं दिन, मुसीबत में कटी रातें,

लगी हैं चाँद सूरज से, निरंतर राहु की घातें।”

(बेला पृ. 69)

‘चाँद’, ‘सूरज’ और ‘राहु’ प्रतीक रूप में आए हैं।

यह सत्य है कि निराला का जीवन कष्टों की एक दुखद कथा रही है। इन परेशानियों ने निराला को अंदर-ही-अंदर बुरी तरह क्षतिग्रस्त किया। एक अभिव्यक्ति देखें –

वह पलने से तेरे छुटा जा रहा है,

इसी सोच से दम घुटा जा रहा है।

 

तेरे दिल की कीमत चुकाने के पहले,

तरह पानी की वो फुटा जा रहा है।

 

उपर्युक्त शेर बहरे मुतकारिब में है, किन्तु पहले शेर का ऊला मिसरा ‘वह’ की वजह से खारिज हो रहा है। तथा दूसरे शेर का सानी मिसरा ‘तरह’ की वजह से शब्द क्रम दोष का शिकार हो गया है। खैर जो भी हो शेरों में उनका दर्द साफ दिख रहा है। वैयक्तिकता के बावजूद भी शेरों में गति है।

त्रिलोचन प्रगतिवाद के बड़े कवियों में से हैं किन्तु साथ-ही-साथ यह भी विदित है कि त्रिलोचन आत्मविश्लेषण के कवि हैं। उन्होंने अपने बारे में कई कविताएँ लिखी हैं। त्रिलोचन की ग़ज़लों में कहीं-कहीं फैंटासी भी देखने को मिल जाती है। एक उदाहरण –

“अंधेरी रात है, मैं हूँ अकेला दीप जलता है,

हवा जग-जग के सोती है पथिक अब कौन चलता है।

(नया ज्ञानोदय गजल विशेषांक, जनवरी 2013)

त्रिलोचन के कुछ और शेर देख सकते हैं –

यह दिल क्या है देखा दिखाया हुआ है,

मगर दर्द कितना समाया हुआ है।

 

निरा दुख सुना, चुप रहे फिर वो बोले,

कि यह राग पहले का गया हुआ है।

 

झलक भर दिखा जाएँ बस उनसे कह दो,

कोई एक दर्शन को आया हुआ है।

वैयक्तिकता से लबरेज इन शेरों में कुछ

 

खास बात नज़र नहीं आती। पहले मिसरे में ‘यह’ की वजह से दोष भी पैदा हो गया है। प्राय: ऐसा देखा जाता है कि जो नई रहगुजर बनाने का खतरा उठाते हैं वही कुछ कर पाते हैं। त्रिलोचन को इसमें कुछ खास सफलता नहीं मिलती। वे न तो हिन्दी ग़ज़ल को कुछ खास दे पाते हैं न तो ग़ज़ल के लिए दुष्यंत जैसा कोई खास डिक्सन तैयार कर पाते हैं।

एहिताम हुसैन ग़ज़ल के अल्फाज़ के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हैं कि “अश्आर में खूबसूरत और बे-ऐब लफ़्जों का तथा दिल की गहराई में उतर जाने वाले भाव, सादगी के साथ बयान होने चाहिए” (ग़ज़ल गरिमा अंक 3 सं. भानुमित्र) मैथिलीशरण गुप्त में प्राय:  इन चीजों का अभाव है इसमें कोई संदेह नहीं कि मैथिलीशरण गुप्त आधुनिक काल के बड़े कवियों में थे। उन्हें सबसे अधिक पाठक भी प्राप्त थे किन्तु उनमें प्रांजलता, शब्दशैली, कोमलता तथा दार्शनिकता का अभाव साफ दृष्टिगत होती है। अभिव्यक्ति की विराटता तथा लोकप्रियता ने उन्हें बड़ा कवि बनाया। इतिवृत्तात्मकता उन पर पूरी तरह हावी है। जहाँ तक मैथिली शरण की ग़ज़लों की बात है मुहाकत, तखैयुल, और मौसिकी का अभाव बहुत अधिक खलता है। उनकी गजलों में तुकबंदी और सपाट बयानी बहुत अधिक देखने को मिलती है। शुरू से अंत तक ये या तो आराध्य के सामने गिड़गिड़ाते हुए या फिर गौरवशाली अतीत की दुहाई देते हुए नज़र आते हैं। एक उदाहरण –

इस देश को हे दीन बन्धो! आप फिर अपनाइये,

भगवान भारतवर्ष को पिर पुण्यभूमि बनाइये।

जड़ तुल्य जीवन आज इसका विघ्न-बाधा पूर्ण है,

हे रम्ब! अब अवलंब देकर विघ्नहर कहलाइये।

यह आर्य भूमि सचेत हो फिर कार्यभूमि बने अहा,

वह प्रीति नीति बढ़े परस्पर नीति भाव भगाइये।

ऊपर के दोनों शेरों में भगवान से प्रार्थना है और अंतिम शेर के माध्यम से आर्यभूमि के अतीत के गौरव की ओर संकेत है। संबोधनों का प्रयोग, जैसे अहा, अहो, रंभ, अरे का भी प्रयोग बड़े धड़ल्ले से करते हैं। इनकी कविता में सलासत (सादगी) तो है मगर तुकबंदी बनकर रह जाती है। संबोधनों (अहा, अहो) आदि के कारण रवानी में बाधा आती है। परन्तु इन तमाम कमियों के बावजूद इन्होंने अतीत को वर्तमान से जोड़ने का जो पुनीत कार्य किया है उसे नकारा नहीं जा सकता। इनके यहाँ सृजन की व्यापकता है।

शमशेर की पृष्ठभूमि तो उर्दू की रही, ग़ज़लों की अच्छी पकड़ और दखल भी रही किन्तु नये मुहावरों की कमी तथा ग़ज़ल के लिए नई काव्य भाषा का अभाव उनकी ग़ज़लों में खलता है। ज्ञान प्रकाश विवेक कहते हैं – “हिन्दी ग़ज़ल में शमशेर और इनसे पूर्व के अनेक कवियों ने देवनागरी लिपि में ग़ज़लें लिखीं किन्तु प्रभाव दुष्यंत की ग़ज़लों ने छोड़ा और ऐसा प्रभाव छोड़ा कि हिन्दी ग़ज़ल एक सशक्त विधा के रूप में उभरी। आखिर ऐसी क्या बात है कि शमशेर की ग़ज़लों ने वो प्रभाव पैदा नहीं किया जो दुष्यंत की ग़ज़लों ने पैदा किया। कारण स्पष्ट है वो जोखिम उठाते हैं। वो ग़ज़ल की लीक तोड़ते हुए नया मुहावरा गढ़ते हैं। शमशेर ऐसा नहीं कर पाते। शमशेर ग़ज़लों में क्लासिकियत जरूर हैं लेकिन वो क्लासिकियत उर्दू ग़ज़ल के मिजाज़, लहजे और स्वर में घुल मिल जाती है। नया डिक्सन तैयार नहीं करती” (गजल दुष्यंत के बाद/ज्ञान प्रकाश विवेक पृष्ठ 210)

कुछ शेर देखें –

मुश्कबू-ए-जुल्फ उसकी, घेर ले जिस जा हमें,

दिल ये कहता है उसी को, अपना काशाना कहें।

अपने ही कद्रे-दुखी की पुरतकल्लुफ लज्जतें,

आप क्या लेते हैं मुझसे और क्या देता हूँ मैं।

इन शेरों को भले ही हम हिन्दी का शेर मान लें किन्तु उर्दू का दबाव इन शेरों पर साफ नजर आ रहा है। शमशेर ने कहीं भी किसी तरह का जोखिम उठने का साहस नहीं किया है।

इन तमाम बातों से एक बात तो साफ हो जाती कि दुष्यंत के पूर्व ग़ज़लकारों की चाहें जितनी तबील फेहरिस्त क्यों न रही हो वे मुकम्मल हिन्दी ग़ज़लकार होने की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। वे या तो उर्दू के बोझ से दबे हुए हैं या फिर ग़ज़ल के शिल्प विधान का पूरी तरह अनुपालन नहीं करते, किन्तु फिर भी वे समान रूप से आदरणीय हैं वे भले ही मुकम्मल हिन्दी ग़ज़लकार न हों मगर हिन्दी ग़ज़ल के बुनियाद में उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता।

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