अदम्य :बिहार के युवा ग़ज़लकार :: देवयानी झाडे

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अदम्य :बिहार के युवा ग़ज़लकार
‘अदम्य’ ग़ज़ल-संग्रह अपने समय की तमाम दबी कुचली और पीड़ित आवाजों को मुखर बनाने में सफल हुआ है| यह पुस्तक हाल ही में श्वेतवर्णा प्रकाशन से प्रकाशित हुई है, जिसका संपादन युवा ग़ज़लकार श्री अविनाश भारती द्वारा किया गया है| दरअसल ‘ग़ज़ल’ यह अरबी साहित्य की मशहूर विधा है| अपनी भाव प्रवणता और शैली-  वैशिष्ट्य के कारण समय के साथ यह फारसी, उर्दू के अतिरिक्त हिंदी भाषा में भी प्रचलित हुई है| शुरुआत में इश्क- मुहब्बत और रूहानी ख्यालों तक सीमित रहने वाली ग़ज़ल अब हर मुद्दे को अपने में शामिल करने की काबिलीयत रखती है| हिंदी ग़ज़ल के पुरोधा दुष्यंत कुमार ने अपनी ग़ज़लों में यह सिद्ध किया है| कम से कम शब्दों में सटीक और मारक बात कहना गज़ल की सबसे प्रमुख विशेषता है|
‘अदम्य’ के आरंभ में श्री अनिरुद्ध सिन्हा का लेख ‘आधुनिक हिंदी ग़ज़ल : शिल्प और कथ्य’ प्रकाशित हुआ है| इस लेख में सिन्हा जी ने ग़ज़ल की भावनिक तथा तकनिकी बनावट को बहुत सरल तथा सटीक शब्दों में पाठकों के समक्ष रखा है| ग़ज़ल विधा की तकनिकी बारीकियां समझने के लिए यह लेख नवोदित ग़ज़लकारों के लिए गुरुमंत्र के समान है| ‘अदम्य’ की भूमिका देश की सुविख्यात ग़ज़लकारा डॉ. भावना जी द्वारा लिखी गई है, जिसमें उन्होंने इस ग़ज़ल- संग्रह के उद्देश्य तथा महत्ता को बखूबी समझाया है| इसी प्रकार उमाशंकर लोहिया ने अपने लेख ‘समकालीन हिंदी ग़ज़ल: एक क्रांति’ में ग़ज़ल के इतिहास से लेकर वर्तमान पर प्रकाश डाला है तथा ग़ज़ल के व्याकरण पर चर्चा की है| आलेख माला की अंतिम कड़ी में डॉ. जियाउर रहमान जाफ़री का लेख ‘हिंदी में ग़ज़ल की ज़रूरत’ शामिल है| किसी भी जड़ या चेतन का महत्व उसकी उपयोगिता द्वारा तय होता है| डॉ. जाफ़री का लेख इसी बात को सिद्ध करता दिखाई देता है|
इस पुस्तक में भारती जी ने बिहार के 29 नवोदित ग़ज़लकारों की बेहतरीन ग़ज़लों को शामिल किया है| ये सभी ग़ज़लें अलग-अलग भाव को धारण करते हुए विभिन्न बहरों में कही गई है| सचेत रचनाकार उसे ही माना जा सकता है जिसे सामाजिक परिस्थिति का ज्ञान हो और जो समाज में होने वाले हर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत रखता हो| समाज की कुरीतियों पर आघात करता ‘कुंदन आनंद’ का यह शेर हमें सोचने पर मजबूर कर देता है-
एक कुआँरी लड़की को ये डर है कि,
घर को, उसकी शहनाई ले डूबेगी |
इसी कड़ी में उत्कर्ष आनंद ‘भारत’ ने समाज की भयावहता को अत्यंत सटीक शब्दों में कहा है| वे कहते हैं-
मरने वाला मरने से पहले बोला,
जिंदा रहने वालों अपनी खैर करो|
जीवन दर्शन हमेशा से ही  ग़ज़लों का महत्वपूर्ण विषय रहा है| जीवन को नए रूप से परिभाषित करने का सामर्थ्य गज़लकारों में है| जीवन की सार्थकता, निस्सारता, हार-जीत, सुख- दुःख आदि को गज़लों की विषयवस्तु बनाया जाता रहा है| इसी प्रसंग में ‘संतोष सिंह शेखर’ कहते हैं-
क्यूँ परेशां हो रहे हो एक छोटी हार से,
एक मकड़ी लड़ रही थी बारहा दीवार से|
यहाँ डॉ. मनजीत सिंह किनवार का यह एक शेर ही पाठक को जिजीविषा से सराबोर करने के लिए काफी है-
छोड़ दे अब मौत को चल जिंदगी की बात कर,
गम बहुत है जानते हैं पर ख़ुशी की बात कर|
हिंदी ग़ज़ल को जनसामान्य तक पहुँचाने वाले दुष्यंत कुमार ने सत्ता में व्याप्त अनैतिकता और अनाचार को अपनी गज़लों की विषयवस्तु बनाया| राजनीति का मुखौटा उतारने की जो कवायद दुष्यंत जी ने शुरू की थी उसे आगे ले जाने का कार्य ‘अदम्य’ में प्रकाशित कई गज़लकारों ने किया है| कपड़ों की तरह बदलती नेताओं की विचारधारा को दर्शाता चाँदनी समर का यह शेर गौरतलब है-
हर रोज है बदलती सियासत भी रूप को,
मुफलिस है आज कितना परेशान पूछिये|
पक्ष और विपक्ष की आपसी राजनीति में आम आदमी बुरी तरह पिसता है| हर छोटी से छोटी बात पर समाज को अशांति से भर देना आज सियासी दांव पेंच का हिस्सा बन चुका है| पूर्णेंदु चौधरी का यह शेर इस स्थिति को बखूबी समझाता है-
हरी थी ये टमाटर हो गई है लाल आखिर क्यों ?
बहुत गंभीर मसाला है आग लगा दो बस में|
वर्तमान समय में ग़ज़ल की विषयवस्तु में अत्यधिक परिवर्तन आया है| अन्यथा ग़ज़ल का इतिहास प्रेम, विरह और प्रेमिकाओं की प्रवंचनाओं से भरपूर रहा है| प्रेम त्याज्य विषय नहीं है या किसी भी समाज के साहित्य में यह त्याज्य नहीं हो सकता| क्योंकि यह मानव जीवन का अविभाज्य अंग है| ‘अदम्य’ में भी प्रेम के विविध पहलुओं पर ग़ज़लकारों ने अपनी बात रखी है| अमृतेश कुमार मिश्रा का यह शेर अपने भीतर असीम विरह को समाये हुए है-
बिलख कर उर्मिला सा रो पड़ा हूँ,
लखन का वर्षों अब दर्शन नहीं है|
प्रेम की चर्चा की इसी कड़ी में ‘दिवाकर दिव्यंक’ का यह शेर बहुत सटीक है-
कोई भी इसमें आज तलक हो सका न पास,
ये इश्क! हर निसाब से आगे की चीज़ है|
ग़ज़ल अनुशासन के साथ कम से कम शब्दों में बहुत सटीक बात कहने के लिए जानी जाती है| अतः अकसर ग़ज़लकार, पाठकों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए प्रतीकों एवं बिंबों का सहारा लेते हैं| ‘अदम्य’ में छपे लगभग सभी रचनाकारों की ग़ज़लों में प्रतीकों की यथोचित व्यवस्था दिखाई देती है| अमित झा ‘राही’ ने वर्तमान समय के अति व्यस्त मानव को ‘परिंदे’ के प्रतीक के माध्यम से अत्यंत कुशलता के साथ समझाया है-
थक गए हैं परिंदे उड़ते हुए,
अब इन्हें शाम की ज़रूरत है|
दीपशिखा ने अनुभवहीनता को बड़े खूबसूरत प्रतीक के माध्यम से समझाया है| वे कहती हैं-
जिसने देखा नहीं ठीक से गाँव भी’
आसमान में भी घर वो बनाने लगे|
श्री अविनाश भारती ने ‘अदम्य’ के रूप में बिहार के नवोदित ग़ज़लकारों को एक बेहतरीन मंच दिया, जहाँ वे अपनी बात कह पाए| पुस्तक के आरंभ में छपी लेख माला ग़ज़ल विधा को समझने में पाठकों की बहुत सहायता करती है| श्री अविनाश भारती को उनके कुशल संपादन तथा उत्कृष्ट कार्य हेतु बहुत बहुत बधाई| आशा है कि आने वाले समय में भारती जी पाठकों को इसी प्रकार अपनी साहित्य सेवा का पुरस्कार प्रदान करेंगे|
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पुस्तक – अदम्य :बिहार के युवा ग़ज़लकार
संपादक – अविनाश भारती
समीक्षक -देवयानी झाडे
प्रकाशक –  श्वेतवर्णा प्रकाशन
मूल्य – 199/-
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