खिड़की सिखाती हैं मुझे  अंदर रहते हुए कैसे देखा जाता है बाहर :: चित्तरंजन

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खिड़की सिखाती हैं मुझे अंदर रहते हुए कैसे देखा जाता है बाहर
              – चित्तरंजन
प्रगतिशील चेतना को समर्पित यह कविता एक बेचैन मनोभाव की उदगार है। यह बेचैनी सामाजिक असमानता को लेकर है। जब देश में विकास के बड़े बड़े दावे किए जा रहे हैं तब आदिवासी समाज को अपने ही घर से बेदखल कर दिया जा रहा है। उनके जंगलों को काट कर शहर बसाया जा रहा है। जहां अभी भी वे समाज निवास करते हैं वहां सिवाए जंगल के कुछ नहीं है। आदिवासी समाज अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए आज भी संघर्ष ही कर रहा है। कवयित्री कहती हैं:-
 ” पहाड़ पर लोग/ पहाड़ का पानी पीते हैं
 सरकार का पानी वहां तक नहीं पहुंचता
मातृभाषा में कोई स्कूल नहीं पहुंचता
अस्पताल में कोई डाक्टर नहीं पहुंचता
बिजली नहीं पहुंचती/ इंटरनेट नहीं पहुंचती
वहां कुछ भी नहीं पहुंचता
वहां धर्म और गाय के नाम पर
आदमी की हत्या के लिए
इतना जहर कैसे पहुंचता है
        – जहां कुछ नहीं पहुंचता
आदिवासी समाज अपनी लोक-संस्कृति में कई लोक आस्था को जीता है। वे घर से लेकर जंगल तक फिर जंगल से लेकर अपने तक मानवीय संवेदनाओं को सहेजने का काम करते है। आदिवासी समाज प्रेम बाजार में नहीं बल्कि अपने आसपास ढूंढते हैं। उनके लिए प्रेम प्रर्दशन की वस्तु नहीं है। वे प्रेम को जीने के लिए व्यक्ति की आंतरिक अनुभूतियों तक पहुंचते हैं। वे प्रकृति के गोद में प्रेम पाना चाहते हैं। उनका विरोध उनकी मासूमियत की राजनीति करने करनेवालों से है। वे किसी राजनीति में न पड़ कर उन्मुक्त जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। वे किसी चिन्ह,प्रतीक,पार्टी या विशेष प्रकार की विचारधारा में जीवन नहीं जीना चाहते हैं। वे मनुष्य के एकांत पल को मौलिक रूप से जीने की प्रबल इच्छा रखना चाहते हैं। जंसिता इसी यथार्थ की घोषणा करते हुए कहना चाहती हैं
 ‘ और अपने सुंदर होने के बारे चिन्ह
के साथ / ज्यादा मनुष्य होना ही आदिवासी होना है।’
         – मेरा आदिवासी होना
जंसिता केरकेट्टा अपने अर्जित अनुभवों की व्याख्या अपनी कविताओं में करती हैं। वे ईश्वर के नाम पर चल रहे बाजार रूपी रैकेट का पर्दाफाश करती हैं। उनके लिए ईश्वर का वास्तविक अर्थ इंसानियत का विकास करना है। वे ईश्वर के लिए आडम्बर का विरोध करती हैं। उनकी कविता का विरोधी तेवर काफी मौलिक है। ईश्वर प्राप्ति को स्टेट्स सिम्बल
से जोड़कर देखने वाला समाज ढगा जा रहा है और उन्हें इस बात की इल्म नहीं है। सच तो यह है कि ईश्वर को कोई पार्टी या विचारधारा नहीं बचा सकती है बल्कि ईश्वर स्वयं इंसानियत में सन्निहित  हैं। ईश्वर के नाम पर हो रहे व्यापार और वोट बैंक पर प्रहार करती हुई कहती हैं
” उन भव्य प्रार्थना स्थलों के दरवाज़े पर
सिर झुकाए बैठी हैं
आदमी के लिए ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता
बाजार से होकर क्यो जाता है।
       – ईश्वर और बाजार
प्रस्तुत कविता संग्रह समसामयिक सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य पर एक आवश्यक नोट्स की भांति कविता है। संग्रह की ज्यादातर कविताएं आदिवासी समाज के यथार्थ को परिलक्षित करती हैं। संग्रह की कविताओं की  अनुगूंज वंचित आदिवासी समाज के बोल से ओतप्रोत है। भारतीय आज़ादी के सत्तर वर्ष और आदिवासी समाज की यह दशा सामंतों के शासन की पोल खोल देता है। लोक लुभावन वादे में संलिप्त चुनावी माहौल इंसानियत को दरकिनार कर लूटपाट की संस्कृति को बढ़ावा दे रहा है। झारखंड विभाजन भी झारखंड का कल्याण नहीं कर पाया। आज भी पहाड़ों पर और घने जंगलों में महिलाओं के साथ हैवानियत का खेल जारी है। कहीं कहीं तो इस खेल को सरकारी संरक्षण भी प्राप्त है। अनुसूचित जनजाति का सरकारी प्रावधान दिवास्वप्न जैसा ही है क्योंकि विद्यालयी शिक्षा ही दुर्लभ है। कुल मिलाकर जंसिता केरकेट्टा ने भोगे हुए यथार्थ को पुरजोर तरीके से कलम बद्ध करने का काम प्रस्तुत कविता संग्रह में किया है।
             – चित्तरंजन कुमार
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