समय की आवाज़ का प्रतिबिंब ‘अभी दीवार गिरने दो’ :: डॉ पंकज कर्ण

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समय की आवाज़ का प्रतिबिंब ‘अभी दीवार गिरने दो’
                                                     – डॉ पंकज कर्ण 
विकास जी २१ वीं सदी के उन रचनाशील युवा शायरों में शुमार हैं जिन्होंने न सिर्फ़ ग़ज़लें कही हैं बल्कि पूरी शिद्दत से ग़ज़ल को जिया है। उनका सद्यः प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह *अभी दीवार गिरने दो* श्वेतवर्णा प्रकाशन से छपकर आया है। संग्रहित ग़ज़लों में वर्तमान में जो कुछ लिखा या कहा जा रहा है उसे महसूसा जा सकता है। रोमांस के साथ जिंदगी की तड़प और बेबसी को जिस खूबसूरती के साथ उन्होंने अपने ग़ज़ल का विषय बनाया है यह क़ाबिल-ए-तारीफ़ है। बदलते जमाने की पेचीदा परिस्थितियों और राजनीतिक चुनौतियों से उत्पन्न कुंठा को उन्होंने अपनी ग़ज़ल का शक्ल दिया है जिसे ग़ज़ल के इन शेरों में देखा जा सकता है:-
“ख़ुद तो तड़पा था मगर सबको हंसाया हमने
और दिल अपना सलीके से सजाया हमने
प्यार मिलता है नहीं आज ज़माना कैसा
जबकि दुश्मन को भी सीने से लगाया हमने”
आज जो ग़ज़लें कही जा रही है वे यथार्थ के सहज, सरल, आँसू की वेदना तक ही सीमित नहीं है बल्कि परिस्थितियों से मुकाबला करने की भी ताकत रखती है।विकास की गजलें इन सबके बीच इंसानियत की हसीन मुस्कुराहटों को बचाने का प्रयास करती हैं। देखें:-
“वक्त यह खुद में जब संवरता है
आदमी आदमी निखरता है”
अपनी शायरी में मानवता, सूझ बूझ और आशावादिता को मानने वाले विकास की शायरी में समाज, साहित्य, संस्कृति, परंपरा और प्रेम प्रमुखता के साथ व्यक्त है:-
“रहजनों की बस्ती में नेकियाँ नहीं मिलती
प्यार और शराफत की बोलियाँ नहीं मिलती”
उनकी शायरी केवल रूमानी और स्वप्निल ही नही बल्किं वह समय की आवाज को भी प्रतिबिंबित करता है। ग़ज़ल का शेर देखें:-
“सच का दामन थामकर चलने लगे क्या भीड़ में
धीरे धीरे हो गया अपनो से भी रस्ता अलग”
और फिर ये कि:-
“चलें बेख़ौफ़ ठोकर का भरम टूटे
ख़ुदा ऐसा करे डर का भरम टूटे”
भौतिकतावादी संस्कृति एवं विद्रूप होते मानवीय चेहरे के पसारे हुए पाँव के बीच मुहब्बत को बचाने की ज़िद शायर ने इस प्रकार किया है:-
“मोहब्बत ही मोहब्बत हो जमाने में
लहू से लिपटे खंजर का भरम टूटे”
 विकास संबंधों की भावुकता में चिन्तन का तत्त्व सम्मिलित कर ग़ज़ल को प्रभावशाली तौर पर अभिव्यक्त करते हैं:-
“आया कठिन यूँ दौर तो रिश्ते मुकर गए
अपने ही घर के लोग दरीचे मुकर गए”
दौलत के शोर में संबंध किस तरह चुप्पी साध लेता है उसका बयान इस शेर में देखा जा सकता है:-
“रिश्ते तमाम टूट के बिखरे हैं इस जगह
जब-जब दिलों के दरमियाँ दौलत उतर गई”
भूख और बेकारी सदियों से शायरों की कल्पना का मूल रहा है। आज भी अंतिम पायदान के लोग जीवन की मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। समाज का एक वर्ग सुख के सागर में गोते लगा रहा है एवं एक वर्ग रोटी का मोहताज़ है। विकास जी ने इस चिंता को यूँ व्यक्त किया है:-
“उस तरफ समुंदर है दूध और मेवों का
इस तरफ गरीबों को रोटियाँ नहीं मिलती”
पुस्तक की ग़ज़लें राजनीति के गिरते हुए मूल्यों पर करारा प्रहार करती हैं। इस दृष्टि में यह शेर भी ध्यान खींचता हैं:-
“होंठ के लफ्जों के भीतर घात को समझा करें
इस हुक़ूमत की बदलती ज़ात को समझा करें”
सियासत के इस दुष्चरित्र से एक तबका जब प्रभावित होता है तब शायर कहता है कि:-
मेरे घर के छप्परों में छेद है इतने अभी
घर मेरे आई हुई बरसात को समझा करें”
यह भी एक विडम्बना है कि तमाम तरह के आधुनिकता का लिबास ओढ़ने के बावजूद हमारे समाज की कुछ रूढ़ियाँ आज भी बदली नहीं है। दहेज इसी प्रकार का एक ऐसा कोढ़ है जिसने अमीरों को हलकान किया है और ग़रीबों को पल-पल अपमान का घूँट पीने को विवश किया है। विकास जी की चिंता इन पंक्तियों में ज़ाहिर है:-
“इस ग़रीबी ने उसे फिर मांग भरने दी नहीं
लौट कर जाती हुई बारात को समझा करें”
प्रेम और सौन्दर्य की सूक्ष्मताओं को  विकास ने अपनी ग़ज़लों में जिस सजीलेपन से व्यक्त किया है ऐसा कम शायरों में नज़र आता है। परंतु प्रेम के भीतर के भीतरघात की स्थिति शायर को झकझोरता है तब ये शेर फूटता है:-
“कली खिलने से पहले बांकपन को नोच डालेंगे
चमन वाले ही लगता है चमन को नोच डालेंगे”
अपनी सकारात्मक सोंच के दम पर उन्होंने ग़ज़ल को सम्पूर्णता एवं वैभव के साथ धार प्रदान किया है साथ ही साथ अपने प्रयोगधर्मिता के बल पर उन्होंने हिंदी ग़ज़ल को पैनापन भी दिया है। एक कामगार मजदूर के कभी नही थकने देने वाले इरादों को संकलन का यह शेर प्रमाणित करता है:-
“बहेगा और पसीना बदन ये टूटेगा
हमारे सिर पे अभी दोपहर नहीं आई”
वर्तमान समय की उलझनों के बीच आत्मविश्वास से लबरेज विकास की गजलें अपनी अभिव्यक्ति से चुस्त और धारदार है। उन्होंने कहा है:-
“बहुत मुश्किल है थोड़ा वक्त लेगा
किसी पत्थर को शीशा कर रहा हूं”
हिंदी ग़ज़ल के चरम आशावाद के संदर्भ में गहरी पड़ताल करती हुई विकास जी की गजलें संवेदना को स्पर्श करती हैं। इन गजलों से जीवन के प्रति समग्र बोध, मानवीय प्रेम, कल्पना, सुनहरे सपने की सुखद अनुभूति का एहसास होता है तभी तो उन्होंने कहा है:-
“सच का दामन थामिएगा आप भी
पहले अपनी जिंदगी से पूछिए”
विकास की ग़ज़लें ग्राम्य जीवन एवं आम आदमी के जीवन संघर्ष को बड़ी बेबाकी से चित्रित करता है एवं आम जीवन के हर पहलू का निरीक्षण करता है:-
“कई होंगे अचानक दर बदर अब
किसी फुटपाथ का सौदा हुआ है”
वे आगे कहते हैं:-
“हल्ला है गलियारे में आरक्षण का
अपनी अपनी ज़ात समझ कर आते हैं”
शायद यही वजह है कि आज उनकी शायरी और शख्सियत यादगार बनकर किताब के पन्नों में आ गई है जिसे पढ़ कर पाठक ग़ज़ल की रोशनी एवं जज्बात से भर जाएंगे:-
“जिंदगी की है कहानी न कोई मंजर है
इस तरफ कुछ भी निशानी न कोई मंजर है
किसको अपना में कहूँ किसको बेगाना कह दूं
बस मुझे चोट है खानी ना कोई मंजर है”
विकास की गजलें इंसानियत की हसीन मुस्कुराहटों को बचाने का प्रयास करती हैं। उनकी शायरी मानवीयता के पक्ष एवं अमानवीयता के विपक्ष में खड़ी होती है। जीवन की हकीकत से रू-ब-रू होती विकास जी की ग़ज़लों को पढ़ना अच्छा लगता है। पुस्तक की ग़ज़लों में आप इन हक़ीक़त से दो-चार होंगे ऐसा विश्वास है। रदीफ़, क़ाफ़िया, बह्र, वज्न,जैसे ग़ज़ल के अनुशासन का पालन विकास जी ने पूरी ईमानदारी से किया है। बहरहाल! बेहद कम समय में ग़ज़ल के अनुभवों की जो थाती विकास जी ने हमें *अभी दीवार गिरने दो* के रूप में सौंपा है, इसे इस सदी के महत्त्वपूर्ण संग्रह के रूप में सहेजा जा सकता है।
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पुस्तक  : अभी दीवार गिरने दो (ग़ज़ल-संग्रह)
शायर :- विकास
 प्रकाशक:- श्वेतवर्णा प्रकाशन, दिल्ली
 मूल्य:- 125/-
समीक्षक : डॉ पंकज कर्ण 
 व्याख्याता, अंग्रेज़ी विभाग,
डॉ जे एम कॉलेज, मुज़फ़्फ़रपुर
संपर्क : चित्रगुप्त मंदिर लेन
शास्त्री नगर (कन्हौली)
खादी भंडार
मोबाइल नं : 9835018472
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