ख़ास कलम :: डाॅ. अफ़रोज़ आलम

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ग़ज़ल
क्या अजब लुत्फ़ मुझे सब्र के फल में आए
जैसे नुज़हत कोई रुक-रुक के महल में आए
हाय वो इश्क़ की नैरंग-ए-तमन्ना मत पूछ
मस्त हो-हो के मेरी शोख़ ग़ज़ल में आए
रुह को ताज़गी दे जाए है शबनम की तरह
जब भी वो शोला बदन मेरे बग़ल में आए
जब्र की हद से निकलने की तलब मे कुछलोग
देखते-देखते  सब  दाम-ए-अजल   में   आए
अहल-ए-दुनिया मे कहाँ इतनी बसिरत, देखे
जो नज़र मुझ को तेरे माथे के बल में आए
लफ़्ज़ के हुस्न पे छा जाए है मा’नी का तिल्लिस्म
वो  मेरे  साथ  अगर  बहर-ए-रमल  में  आए
जाने क्या होगा तेरा रद्द-ए-अमल फिर ‘आलम’
उसका जब अक्स-ए-नज़र मेरी ग़ज़ल में आए
 – डाॅ. अफ़रोज़ आलम, जिद्दा, सउदी अरब
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