विशिष्ट कवि :: राइडर राकेश

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भादो में भुनेसर

  • राइडर राकेश

अंतिम भादो की इस आधी रात

टिटहरी के द्रुत-मद्धम ताल के बीच

बूंदें उतरने की आवाज़ें आ रही हैं

घास, डिब्बे, पत्ते, टीन, पानी और मिट्टी पर

गिरते बूंदों की ध्वनियों का स्तर

और उसकी तीक्ष्णता के मान

अलग-अलग हैं

इनसे पैदा होने वाले असर भी मुख्तलिफ हैं

भुनेसर की एकमात्र कोठरी में किवाड़ नहीं है

सिमेंट की थैलियों की जोड़ से बना एक पर्दा टंगा है

अमूमन स्थिर रहने वाला वो पर्दा

हवा के झोंके में रह-रहकर फड़फड़ा उठता है

फड़फड़ाते पर्दे पर बरसती बूंदें

शोर और आशंकाएं पैदा करती हैं

 

खिड़की की जगह है

हाल-हाल तक जो ढका था

राम मंदिर निर्माण हेतु चंदा वाले कैलेंडर से

अब कुछ दिनों से एक दूसरे कैलेंडर ने

मंदिर-निर्माण हेतु चंदे वाला कैलेंडर झाँप दिया है

रामचंद्रजी के धनुष-बाण वाली फोटो के ऊपर

जुड़े हाथों वाले किसी रोबीले जवान की फोटो है

किसी चक्रवर्ती सम्राट माफ़िक दीप्यमान है उसका चेहरा

अपनों की सेवा करने का अवसर

और विकास की गंगा बहा देने का रास्ता माँगती वो तस्वीर

पंचायत चुनाव के किसी प्रत्याशी की है

 

बायीं ओर टिका गैस सिलिंडर है

उज्ज्वला की श्मामकहानी बयां करता वो

खाली पेट कुलबुला रहा है

तक रहा है टुकूर-टुकूर

खुराक इतनी महँगी हो गई है

पेट भरना मुश्किल हो रहा है उसका

बस कोने में पड़ा-पड़ा उँघता रहता है

साल भर से यही रुटीन है उसका

कभी कोई गठरी कभी कोई टोकरी

रख दी जाती है उस पर

एकदम निराशा और निरर्थकताबोध में न उतरे

इसलिए बाँस की घिस चुकी

छोटी टोकरी रखी है अभी उस पर

टोकरी में तीन छोटे छेदवाले आलू, दो सूखे मिर्च हैं

और बचे हैं प्याज के कुछ छिलके भी

 

सिलेंडर के दक्षिण पूरब मुँह का चूल्हा

सुस्ता रहा है शाम से

दायीं ओर थोड़े राख हैं

उस पर बुझी हुई दो लकड़ियां रखी हैं

जो रोटी सेंकने के काम आई थीं

सुबह फिर इसी काम आएंगी

उन बुझी अधजली लकड़ियों के ठीक ऊपर

धुँएँ ने जाला गढ लिया है

कच्ची दीवार और खंभे के सहारे

खिड़की से आती हवा के झोंकों में

धुँएँ का वह जाला अकसर झूम उठता है

कभी-कभी सहम भी जाता है

आँधियों में तो बरबस

 

खस्सी-पठरू मचान के नीचे हैं

इस समय उनकी मिमिआहट नहीं आ रही

परबतिया और भुनेसर मचान पर हैं

परबतिया नींद में है

उसका दाहिना हाथ

बायीं बाजू पर लेटे छेदिया की छाती पर है

इत्मिनान की चमक है दोनों के माथे पर

पांच दिन अजोड़िया चढे

तीन महीने का हो जाएगा छेदिया

 

करिसमा छेदिया के बगल में तिरछी लेटी है

मुँह उसका भुनेसर की ओर है

भुनेसर के कलेजे से चिपकी

तीन बरस की करिसमा के दोनों हाथ

भुनेसर के धंसे पेट से चिपटे हैं

 

भुनेसर की आँखें खुल गयी थीं

शुरुआती चंद गिरते बूंदों को सुनकर ही

करिसमा को एक नज़र निहारने के बाद

भुनेसर हथेली के सहारे कमर तक उठा

अधखुली आँखों वाले छेदिया के मासूम चेहरे पर

जा ठहरा क्षण भर के लिए

अब भुनेसर निहार रहा था अपनी भगजोगनी परबतिया को

परबतिया की बंद आँखों के नीचे पसरे बालों के कुछ लट

हौले से सरकाये उसने गर्दन की ओर

और उसके दायीं गाल पर

पलटकर सटा दिया अपना दायाँ पंजा

परबतिया के बंद होठों पर हल्की हरकत हुई

भुनेसर की आँखों में भी चमक आई

दो पल से आगे ठहर न सकी

 

भुनेसर मचान से नीचे उतरा

मोबाइल की रौशनी में उसने

देखा खस्सी-पठरू

आंखें खुली थी उनकी

शायद बूंदें अकान रहे थे वे

पिछले साल की बारिश में

वो मड़ई धँस गयी

जिसमें बकरियाँ बाँधी जाती थीं

बैशाख में ही उसने दोनों बकरियाँ बेच दी थीं

 

बूंद टपकने की किसी आवाज को सुनकर

भुनेसर की नजर उठी

छप्पर से जा सटी

कुछ बूंदे छप्पर के रास्ते रिसकर

उतर रही थीं कोठरी  में

भुनेसर को लगा ये सही वक्त है

खुद को कोस लेने का:

काम इस बार जो बंद न हुआ होता

चौखट-किबाड़ भले लगते रहते

छत तो पक्का करवा ही लिया होता

 

इस बीच कुनमुना पड़ा छेदिया

चिहूंक कर उठी परबतिया

छेदिया की कुनमुनाहट स्विच है परबतिया की नींद का

वह लेटे-लेटे फेरने लगी उसके पेट पर अपनी हथेली

नहीं माना छेदिया छिड़िया गया

झूंझलाई, उठी परबतिया

करिसमा के पैरों को टारकर

पालथी मार बैठ गयी

छेदिया को गोदी में रखकर आँचल से ढक लिया

मिनट भी न हुए होंगे

छेदिया अब इठला रहा है मुट्ठियाँ बाँध कर

आँखों ही आँखों में

माँ-बेटे में वार्तालाप चल रहा है

 

भुनेसर की टकटकी अटकी पड़ी है

अब भी टपकते छप्पर पर

अंदर क्या चल रहा है उसके

भुनेसर ही जानता होगा

बुंदें बौछारों में तब्दील हो गयी हैं फिलहाल।

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संपर्क – बागमती विद्यापीठ
ग्राम + पोस्ट + थाना: तरियानी छपरा, जिला: शिवहर
पिन कोड: 843316

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