पुस्तक समीक्षा

हिंदी ग़ज़ल का प्रभुत्व यानी हिंदी ग़ज़ल का नया पक्ष – लेखक – अनिरुद्ध सिन्हा/ समीक्षक  – शहंशाह आलम हिंदी ग़ज़ल की आलोचना मेरे ख़्याल से हिंदी साहित्य में उतनी व्यापक अथवा विकसित नहीं भी दिखाई देती है, तब भी हिंदी ग़ज़ल ने हिंदी साहित्य में अपना उचित स्थान पा लिया है, ऐसा कहने में ग़ज़ल के आलोचकों को परहेज़ नहीं करना चाहिए। यह सच है कि हिंदी ग़ज़ल में अपने समय की ग़ज़ल लिखी जानी बाक़ी है। तब भी उस लिखे जाने के इंतज़ार में हिंदी ग़ज़ल का सारा इतिहास छोड़ देना…

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पुस्तक समीक्षा

भावों के रंगों की भरमार- ‘नीले अक्स’ – समीक्षक – केदारनाथ ‘शब्द मसीहा’ कविता और वो भी जीवन से जो पैदा हो, पढ़ने पर पाठक के मन तक पहुँचती है। नीलू ‘नीलपरी’ एक ऐसी ही साहित्य साधिका है जो निरंतर अपने सृजन के पथ पर अग्रसर हैं। कविता मानव मन के क्षणिक भावों का चित्रण भी है और दीर्घ मंथन का शाब्दिकरण भी है। जिस प्रकार जीवन का प्रवाह सुख–दुख के दो किनारों में रहता है, कविता भी आशा और निराशा में प्रवाहमान होती है। कहीं पर कविता हिम्मत बढ़ाती…

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विशिष्ट गीतकार : उदय शंकर सिंह ‘उदय’

गीत ने समय ने मुझको जहां जब भी सताया गीत ने मुझको वहां तब-तब बचाया ! लड़खड़ाया तो लिया धर हाथ हौले ले गया कुछ दूर अपनी बांह खोले झाड़ दी फिर धूल-सी बैठी उदासी और फिर इक गीत का मुखड़ा सुझाया ! हुआ गिरने को तो फिर इसने संभाला किया अंधियारे में दीपक-सा उजाला टूट कर बिखरा नहीं दुख के क्षणों में बिखरने को जब हुआ इसने सजाया ! दिया झोली भर न जब कुछ पास में था छत्र-चामर से सजाया जब कि रंक-लिबास में था भर गए डब-डब…

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विशिष्ट ग़ज़लकार : नूर मोहम्मद नूर

ग़ज़लें 1 बेवजह, बात बेबात होती, रही तिश्नगी दिल मे सौग़ात होती, रही जिस तरह अजनबी, अजनबी से मिले ज़िंदगी से मुलाक़ात, होती रही इक तरफ जीत के ख़्वाब ज़िंदा रहे इक तरफ मात पे मात होती, रही हाय लफ़्ज़ों के बाहर कोई क़द न था सिर्फ लफ़्ज़ों मे औक़ात होती रही नूर कुछ इस क़दर तीरगीबाज़ था हर क़दम रौशनी, रात होती रही। 2 भूख के और प्यास के मंज़र मुह के बल हैं,, विकास के मंज़र घुंध ही धुंध, अब निगाहों मे दूर लगते है, प्यास के मंज़र…

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खास कलम : विकास

ग़ज़लें 1 प्यार का नाम क्या लिया उसने अपना  दामन सजा लिया उसने गुनगुनाती  हुई  ग़ज़ल  की तरह दर्द  अपना   छुपा   लिया   उसने क्या  ग़रज़  थी   उसे  शरारत  की हाथ  हँसकर  जला  लिया  उसने उसकी   मासूमियत का क्या  कहना रेत  का  घर  बना लिया  उसने फूलों  से   शाखों   से  हवाओं  से तितलियों   का   पता  लिया उसने 2 मेरी आँखों को जगमगा करके छुप गया आईना  दिखा  करके ख़्वाब की छत से वो  गिरा  देगा मेरी बातों  को  अनसुना  करके अब नहीं  लौटकर  वो   आयेगा जो  गया  है  ये  फैसला  करके…

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कहानी

अंगुली में डस ले बिया नगनिया ……. – डॉ भावना सुबह से ही अनमनी थी वह. जेठ का महीना तो जैसे कटता ही नहीं. दिन भी बहुत बड़े होते हैं आजकल. समय तो जैसे पहाड़ हो जाता है. उसे न जाने क्या सूझी, आईने के सामने खड़ी हो गयी. उफ, कितनी सूज गई हैं आंखें. चेहरा कितना निस्तेज हो गया है. जबसे उसका पति किसी दूसरी औरत के प्यार में पड़ा है, उसे नींद कहां आती है. कुछ साल पहले कितनी हसीन थी उसकी दुनिया. वह हमेशा सजी-संवरी, हंसती-खिलखलाती, इधर…

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आलेख : लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता

देखिए, अब जिंदगी की तर्जुमानी है ग़ज़ल –  लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता ‘‘ग़ज़ल कभी भी देशों या मज़हबों की सरहदों में कै़द नहीं हो पाई। इसे ज़बरदस्ती रूहानी या आध्यात्मिक लिबास नहीं पहनाया जा सका। यह हमेशा इंसानी भावनाओं, उसकी सांसारिक सोच की ऊँचाइयों–गहराइयों और दु:ख–सुख का साथ देती रही। ग़ज़ल ने दिल की कुदरती ख़लिश और दर्द को तराश कर और दिमाग़ी सोच की बेचैनियों को अल्फ़ाज का अमली जामा पहनाकर वह तहज़ीब पैदा की जो दिलो–दिमाग़ की सरहदों पर होने वाले हमलों का मुकाबला सदियों से करती रही है…

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विशिष्ट कहानीकार : यासुनारी कावाबाता

मस्सा कथाकार – यासुनारी कावाबाता अनुवाद – सुशांत सुप्रिय कल रात मुझे उस मस्से के बारे में सपना आया। ‘मस्सा’ शब्द के जिक्र मात्र से तुम मेरा मतलब समझ गए होगे। कितनी बार तुमने उस मस्से की वजह से मुझे डाँटा है। वह मेरे दाएँ कंधे पर है या यूँ कहें कि मेरी पीठ पर ऊपर की ओर है। “इसका आकार बड़ा होता जा रहा है। और खेलो इससे। जल्दी ही इसमें से अंकुर निकलने लगेंगे।” तुम मुझे यह कह कर छेड़ते, लेकिन जैसा तुम कहते थे, वह एक बड़े…

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विशिष्ट कवि : संतोष श्रेयांस

पुनरावृति एक दुसरे के एहसासों से लदे हम लौट आते हैं हर बार एक दुसरे के पास पहले से लड़ी बड़ी लडाइयों के बावजूद कई दिनों की मुह फुलाई के अल्प विराम के बाद कुछ समझौता कुछ संधियों में लिए वादे और शांति प्रस्ताव के साथ कई पुनरावृतियों के बाद हालाँकि हम जान जाते हैं हर बार की तरह इस समझौते का भी जल्द ही हम कर जायेंगे अतिक्रमण और अतीत के अनुभवों से समृद्ध लड़ेंगें पहले से कहीं भयानक लड़ाई क्योकि समय के साथ हम जान जाते हैं एक…

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पुस्तक समीक्षा

हिंदी ग़ज़ल का प्रभुत्व यानी हिंदी ग़ज़ल का नया पक्ष – लेखक – अनिरुद्ध सिन्हा/ समीक्षक  – शहंशाह आलम हिंदी ग़ज़ल की आलोचना मेरे ख़्याल से हिंदी साहित्य में उतनी व्यापक अथवा विकसित नहीं भी दिखाई देती है, तब भी हिंदी ग़ज़ल ने हिंदी साहित्य में अपना उचित स्थान पा लिया है, ऐसा कहने में ग़ज़ल के आलोचकों को परहेज़ नहीं करना चाहिए। यह सच है कि हिंदी ग़ज़ल में अपने समय की ग़ज़ल लिखी जानी बाक़ी है। तब भी उस लिखे जाने के इंतज़ार में हिंदी ग़ज़ल का सारा इतिहास छोड़ देना…

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