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Tag: बहत्तरवां अंक

ख़ास कलम :: आकांक्षा कुमारी
खास कलम -

ख़ास कलम :: आकांक्षा कुमारी

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विशिष्ट ग़ज़लकार :: दिनेश तपन
ग़ज़ल - विशिष्ट ग़ज़लकार

विशिष्ट ग़ज़लकार :: दिनेश तपन

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संपादकीय

संपादकीय –

 

 

संपादकीय –

कुदरत के करीब रहकर जीवन का वास्तविक आनंद लें

ठंड अपने चरम पर है। कड़ाके की इस शीत लहर में मनुष्य के साथ-साथ पशु-पक्षी भी ठिठुरते और अपनी ओट में दुबके नजर आ रहे हैं। प्रकृति का मिजाज ऐसा है कि एक ओर खेतों में पीली सरसों मुस्कुरा रही है, तो दूसरी ओर बागों में गेंदे के फूल अपनी सुगंध बिखेर रहे हैं। मन का कोना-कोना इन दृश्यों को निहारना चाहता है, परंतु कड़ाके की ठंड से उत्पन्न शारीरिक और मानसिक जड़ता हमें बिस्तरों से बाहर निकलने और उनके करीब जाने की अनुमति नहीं देती।
वही दूसरी ओर, इस हाड़ कपा देने वाली ठंड में देश का किसान इन सब बाधाओं से बेपरवाह है। वह कभी नंगे पैर खेतों में खाद डालता नजर आता है, तो कभी बर्फीले पानी से अपने खेतों को सींचता है। यह केवल किसान ही है, जिसे विपरीत मौसम को अपने श्रम से अनुकूल बनाने का हुनर मालूम है। जब हम रजाई में दुबककर सरसों के तेल में छनते पकौड़ों और अदरक वाली चाय का आनंद लेते हैं, तब अक्सर उस अन्नदाता को भूल जाते हैं जिसकी तपस्या से हमारी मेज सजती है।
आज का दौर दिखावे और प्रदर्शन का है। हमारी नई पीढ़ी यथार्थ की मिट्टी से दूर होती जा रही है। वे गूगल और इंस्टाग्राम पर फूलों की तस्वीरों को ‘लाइक’ करके खुश हो जाते हैं, लेकिन ओस से भीगी घास पर चलने का साहस नहीं जुटा पाते। कृत्रिम स्क्रीन ने हमें कुदरत के स्पर्श से वंचित कर दिया है। परिणाम स्वरूप, आज की पीढ़ी प्रकृति की उस ऊर्जा से कट रही है जो जीवन का आधार है।
हमें समझना होगा कि कुदरत के करीब रहकर ही हम जीवन का वास्तविक आनंद ले सकते हैं। ठंड में कोहरे की घनी चादर एक अलग ही रूहानी अनुभूति देती है। यदि आप चुपचाप उस धुंध भरी सुबह में बाहर निकलें, तो दृश्यता कम होने के कारण होने वाला ‘स्वयं के गुम हो जाने का अहसास’ मन में एक मीठी गुदगुदी और रोमांच पैदा करता है। प्रकृति हमें सिखाती है कि शांति और धैर्य क्या है। कोहरे के पीछे छिपा सूरज हमें विश्वास दिलाता है कि कठिन समय स्थायी नहीं है। अंततः, हम किस तरह कुदरत के साथ सामंजस्य बिठाकर अपनी जिंदगी को जीवंत बना सकते हैं, यह पूरी तरह हमारे अपने चुनाव पर निर्भर है।
आपको नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं!

  • डॉ भावना

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आंच व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है. इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं. लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है
यह पत्रिका प्रत्येक महीने की एक तारीख को प्रकाशित की जाती है. कृपया रचनाएं इमेल पर भेजें. रचनाओं के मौलिक व किसी अंतरजाल पर प्रकाशित नहीं होने का प्रमाण भी संलग्न करें.
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