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पुस्तक समीक्षा : उछालो यूँ नहीं पत्थर

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पुस्तक समीक्षा : उछालो यूँ नहीं पत्थर

  • adminadmin
  • पुस्तक समीक्षा -
  • December 18, 2019
  • 0 Comments
मुंगेर के युवा ग़ज़लकार विकास की गजल संग्रह “उछालो यूँ नहीं पत्थर” से गुजरते हुए
– कुमार कृष्णन
आधुनिक हिन्दी गजल अपने मौलिक चिंतन तथा विशिष्ट कथ्य-प्रतिभा के बल पर चर्चित और प्रशंसित हो रही है। हालांकि कुछ आलोचक हिन्दी गजल को सौंदर्य के प्रेम-प्रसंग के अंतर्गत  ही देखना पसंद करते हैं और अपनी उसी मानसिकता के साथ इसे परिभाषित भी करते हैं। जबकि सच है कि हिन्दी गजल अपने जन्मकाल से ही जीवन यथार्थ से जुड़ी रही है। ऐसी भी बात नहीं है कि इसके भीतर प्रेम और सौंदर्य नहीं है। हॉं भले प्रेम और सौंदर्य का अतिवााद नहीं है। इस संदर्भ में विकास की गजलों को ले सकते हैं, जिनमें आम आदमी की पीड़ा हैं और उस पीड़ा से जूझने के लिए ताकत और साहस की भी अमिट छाप है। विकास की गजलों के संदर्भ में ज्ञान प्रकाश विवेक के इस कथन को रेखांकित कर सकते हैं-‘ विकास  को गजलें लिखते ज्यादा समय नहीं हुआ। कम समय में उन्होंने गजलगोई की जमीन को परिपक्व किया है।शेर कहने की समझ को विकसित किया है। उनकी गजलों में नए समय को व्यक्त करने की जो बेचैनी दिखाई देती है, वे मूल्यवान है। कम स्पेस में सशक्त शेर कहना चुनौतीपूर्ण होता है। विकास इस बात को समझते हैं। इसलिए शब्दों के अपव्यय से बचते हुए वो संजीदगी से गजलें लिखते हैं।’ ‘ उछालो यूॅं नहीं पत्थर’ विकास का नया और पहला गजल संग्रह है, इसे किताबगंज प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। संग्रह में कुल 83 गजलें हैं। संग्रहित गजलों के भाव एवं शिल्पगत विस्तार, तथा अंदाजे-बयां के अनुपम रंग-ढंग ने गजलकार के गजल लेखन को नई जमीन दी है। परिपक्वता तथा अनुभवों -अनुभूतियों की सघनता से ओत-प्रोत संग्रह की गजलें इस बात को प्रमाणित करती है।
वक्त की पुरवाइयों को ढो लिए हम
या कहो  रूसवाइयों को ढो लिए हम
धूप की चादर समेटे शाम की बॉहें
भोर की अंगड़ाइयों को ढो लिए हम
वर्णित दोनों शेरों में गजलकार ने अपने ज्ञानात्मक और भावात्मक संवेदनाओं को प्रकट किया है। जीवन और समाज के यर्थाथ को कल्पना के सहारे नहीं, बल्कि भोगे गए जीवन की प्रमाणिकता के साथ गजलकार ने जिस विश्वास के साथ व्यक्त किया है, वह प्रशंसनीय है। बिना कोई भूमिका के विकास ने प्रत्यक्षदर्शी गवााह की तरह दो शेरों में अपनी वैचारिकता को अभिव्यक्ति दी है, वह आज की मूल की कथ्य भावना के अनुरूप है। इससे जाहिर होता है कि विकास आज के यथार्थ के प्रति जितने संवेदनशील हैं, उतने चैकन्ने भी हैं। अपने पाठकों को यथार्थ की आकुलता का बयान कर सिर्फ निराश ही नहीं करते, हौसला भी देते हैं।
मैं चला तो रास्ता चलता रहा
साथ मेरे हौसला चलता रहा
जिन्दगी की घूप का वो  कारवॉं
बनके जैसे आइना चलता रहा
सामाजिक उत्थान और विकास की प्रतिबद्धताओं के साथ चलनेवाली हिन्दी गजल हिन्दी साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान और जगह बना ली है। दुष्यंत और दुष्यंत के बाद गजलकारों ने हिन्दी गजल की जो नींव रखी थी, वह काफी पुख्ता और महल के रूप में खड़ी हो चुकी है। आनेवाले नए गजलकारों ने भी अपनी जिस प्रतिभा और विश्वास  के बल पर हिन्दी गजल लेखन के प्रति प्रवृत हैं इससे हिन्दी गजल की संभावनाओं और पठनीयता के कई द्वार खुलते हुए नजर आते हैं। विकास के नाम को भी उन चंद नए गजलकारों के नाम में शुमार किया जा सकता है।
विकास की गजलों और शेरों में कहीं-कहीं पर सुफियाना अंदाज भी देखने को मिलता है। मिशाल के तौर पर –
कभी शोला समझते हैं कभी शबनम समझते हैं
मगर ये भी हकीकत है तुम्हें हमदम समझते हैं
हमारे  बीच  दरपण  की जरूरत है नहीं कोई
हमें भी तुम समझते हो तुम्हें भी हम समझते हैं
संग्रह की सारी गजलें भोगे, देखे गए क्षणों के प्रमाणिक उद्गार हैं। गजलकार ने लेखन के पथों पर चलते हुए जिन अपने अनुभवों को बटोरा है, उन अनुभवों को गजलों में ढ़ाल दिया है। गजलकार के सारे अनुभव गहन चिंतन का अभिव्यंजन हम कह सकते हैं जो अकाट्य तो हैं, महत्वपूर्ण भी हैं। भाव- बाहुलता के बावजूद कवि की जनवादी विचारधारा से भी इनकार नहीं कर सकते हैं। भविष्य में ये सारी गजलें हिन्दी गजल के लिए मील का पत्थर साबित होंगी।
समीक्षित कृति –
उछालो यूँ  नहीं पत्थर (गजल संग्रह)
गजलकार – विकास
मूल्य—  195 रूपये
प्रकाशक- किताबगंज प्रकाशन
ICS (रेमण्ड शोरूम) राधाकृष्ण मार्केट
SBI बैंक के पास, गंगापुर सिटी -322201
जिला – सबाई माधोपुर (राजस्थान)
तीसवां संस्करण

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संपादकीय

 

 

संपादकीय –

अर्द्धनारीश्वर शिव से प्रेम और स्त्री की नियति

सावन का महीना चल रहा है। सावन भगवान शिव का प्रिय माह है। भगवान शिव यानी औघड़दानी -जो गरल स्वयं पीते हैं एवं अमृत दुनिया को अर्पित करते हैं। शिव यानी अर्धनारीश्वर। दुनिया की सारी स्त्रियाँ अपने लिए शिव के समान पति की ख्वाहिश रखती हैं। भले ही उन्हें सारी जिंदगी भाँग घोटनी पड़े, मृगछाला पर सोना पड़े अथवा पहाड़ पर अपना निवास रखना पड़े… उन्हें तो पति के रूप में बस शिव ही चाहिए। वह शिव, जिसने पार्वती को अपने आधे अंग में समाहित कर लिया।

स्त्रियाँ पुरुष से बस इतना ही तो चाहती हैं। स्त्रियाँ प्रेम की प्रतिमूर्ति होती हैं और उन्हें बस प्रेम ही चाहिए होता है। प्रेम के वशीभूत होकर वे जीवन में लाखों कष्ट सह लेती हैं। निश्चल और निष्कपट प्रेम की तलाश स्त्रियों की नियति है। परन्तु, यह मुट्ठी-भर स्त्रियों का ही सौभाग्य है।

ज्यादातर स्त्रियों का जीवन आज भी भोग्या की छवि से ऊपर नहीं उठ पाया है। स्त्रियाँ, जो प्रेम और करुणा का केंद्र-बिंदु हैं, उन्हें कोई-न-कोई मछेरा जाल लेकर फाँसने की फिराक में हमेशा ही बैठा मिलता है। कुछ स्त्रियाँ उनकी चाल को पहचानती हैं और अपने रास्ते बदल देती हैं। कुछ उसके जाल में फँस जाती हैं।

मछेरे को क्या! उन्हें तो बस मछली चाहिए। उनके लिए मछली धन और ऐश्वर्य का साधन है। वही स्त्री रूपी मछली पुरुष रूपी मछेरे के लिए वासना की तृप्ति का साधन बन जाती है।

जरूरी है स्त्री को चालाक होना। नहीं तो ये मछेरे उनका उम्र भर शोषण करते रहेंगे और फिर उन्हें बदनाम कर अगली मछली की तलाश में लग जाएँगे। साहित्य-जगत में भी ऐसे मछेरों की कमी नहीं है।

सावन का यह पवित्र माह है। भारत की प्रत्येक स्त्री में माता सीता तथा पार्वती का वास है और पार्वती जी शिव जी के आधे अंग में निवास करती हैं। अगर शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया, तब ऐसे मछेरे का क्या होगा? ईश्वर ही जाने!

वैसे, कुत्सित मछेरे हर युग में रहे हैं। याद कीजिए, इंद्र के पुत्र की क्या दुर्दशा मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने कर दी थी। स्वर्ग के राजा के पुत्र होने के बावजूद जयंत तीनों लोकों में भागता फिर रहा था, मगर राम का बाण उसका पीछा नहीं छोड़ रहा था।

कुत्सित मछेरे की भूमिका में बैठे पुरुष अपने दुर्भाग्य को स्वयं आमंत्रित करते हैं।  माता दुर्गा स्वयं ऐसे कुकर्मियों के लिए पर्याप्त हैं।

अभी-अभी देश ने 80वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाया। आप सभी को हार्दिक बधाई।

– भावना

हमारे बारे में

आंच व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है. इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं. लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है
यह पत्रिका प्रत्येक महीने की एक तारीख को प्रकाशित की जाती है. कृपया रचनाएं इमेल पर भेजें. रचनाओं के मौलिक व किसी अंतरजाल पर प्रकाशित नहीं होने का प्रमाण भी संलग्न करें.
इमेल – bhavna.201120@gmail.com ,vinay.prabhat@gmail.com

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विशिष्ट कवि :: सार्थक कायस्थ
ग़ज़ल - विशिष्ट ग़ज़लकार

विशिष्ट ग़ज़लकार :: अनिरुद्ध सिन्हा

  • admin
  • August 21, 2026
विशिष्ट ग़ज़लकार :: अनिरुद्ध सिन्हा
पुस्तक समीक्षा -

पर्वतों और घाटियों का सम्मोहन वृतांत कौसानी कथा :: डाॅ.भावना

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  • August 21, 2026
पर्वतों और घाटियों का सम्मोहन वृतांत कौसानी कथा :: डाॅ.भावना
पुस्तक समीक्षा -

सच बयानी का नहीं ये चुप्पियों का दौर है :: विजय वेदांत

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  • August 20, 2026
सच बयानी का नहीं ये चुप्पियों का दौर है :: विजय वेदांत
खास कलम -

डाॅ. शांडिल्य रामानुजम की दो हास्य कविताएँ

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  • August 20, 2026
डाॅ. शांडिल्य रामानुजम की दो हास्य कविताएँ
पुस्तक समीक्षा -

देख सको तो देख :: डॉ.अविनाश भारती

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  • August 20, 2026
देख सको तो देख :: डॉ.अविनाश भारती

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